संदेश

ऐ कुदरत

      केदारनाथ घाटी की तबाही पर ऐ कुदरत तेरी क़हर  का मंज़र अज़ीब देखा लहरता तेरी तबाही का समंदर अज़ीब देखा जल प्रलय के  उमड़ते सैलाबों में निग़ाहों ने भयावह तेरी बेदर्दी का बवंडर अज़ीब देखा ।             ऐ कुदरत तेरी तबाही का मंज़र अज़ीब देखा तेरी विनाशलीला का क्रूर क़हर अज़ीब देखा पल में जमींदोज नगर,खण्डहर अज़ीब देखा प्रचण्ड प्रलय का लहर नज़र से करीब देखा। तेरी चंचल क्रीड़ा में समाहित ज़िन्दगानियों का रेला तमाशबीन बना देखा मौत की आशनाईयों का मेला बेघर हुए अनाथ कितने आंकड़े दफ़न तेरी मौज़ों में सब कुछ गँवा कर लौटा घर बिलखता हुआ अकेला ।                     सर्द हवायें,मुसलाधार बारिश का उफ़ ताण्डव नर्तन लाचार खड़ा देखा भंवर में उफ़ रुग्ण करूँण क्रन्दन उफनती जलधार में समाया धरा का वो हसीन जंगल ज़िंदगी मौत के दरमियान विवश उफ़ दर्दनाक रुदन । रौनक भरी वादी,पल में पलीदा शमशान बनते देखा सूखे पत्तों के मानिन्द भरभरा कर...

खतों के मजमून

चित्र
शैल सिंह                                                                                                                                                                समझ में नहीं आता कहाँ से आरम्भ करूँ,आज जब कुछ लिखने बैठी तो बीते हुए समय की तमाम छोटी-छोटी घटनाएँ जेहन में कहानी बनकर उभर आईं। लिखने की प्रवृत्ति बचपन में ही प्रबल हो उठी थीं शायद,तभी तो कक्षा तीन की अबोध सी पगली कही जाने वाली तानी ने अपनी लेखन शैली से बड़े-बड़े काम कर दिखाए। जिस उम्र में अभी बच्चे कलम दावात पकड़ते थे उस समय तानी अड़ोस-पड़ोस के लोगों का भावप्रवण,लच्छेदार चिट्ठियां लिखा करती थी,वह समय य...

''मदर्स डे पर''

              मदर्स डे पर                          [ १ ] माँ के वात्सल्य प्रेम सा दूसरा कोई अहसास नहीं होता माँ के आँचल सा दूजी किसी वस्तु में सुवास नहीं होता माँ के फटकार में दुलार की नीम सी गरमाहट होती है कभी किसी और रिश्ते या प्यार में ये आभास नहीं होता । जिग़र के टुकड़ों के लिए माँ तो तपा खरा सोना होती है उस त्यागमूर्ति जैसा मर्मस्पर्शी कोई बलिदान नहीं होता दुनियां प्यार पे लिख ले चाहे जितने भी उपन्यास क्यूँ ना ममता के भंडार सा कोई भी मार्मिक दास्तान नहीं होता ।                          [२ ] महबूबा के दामन में नहीं  माँ के कदमों में ज़न्नत होती है , अज़ीम ,मुकद्दस है रिश्ता ये इसकी ख़ुश्बू कभी ना हो रुसवा , झंझावात आये चाहे जितनी ज़िंदगी में माँ की मोहब्बत नहीं होती कभी रुसवा , कभी फ़र्ज से ना मुकरना करना ख़िदमत  ये बुनियाद कभी होती नहीं रुसवा।  ...

गज़ल

           ग़ज़ल बंद रखा है दिल का झरोखा  ये पागल पवन  ना उड़ा ले  कहीं यादों का अनमोल तोहफा  ये पागल  ........।  ज़मज़मा लगती ज़िंदगी सनम  एहसास की मीठी-मीठी चुभन  हमसफर साथ हैं परछाईयाँ  महकाती जीवन की तन्हाईयाँ  जाग काटी हैं रातें नयन में भोर सा नींद में ना चुरा ले कोई सपनों का झिलमिल भरोसा  ये पागल ........।  भींचकर ख़्वाब की बांह में  बेश-कीमती साज मन छांह में   ख़त सीने से तेरा लगा रखा है   बीते लम्हों की चीजें छुपा रखा है  ये मनमौजी काली घटायें  उमड़कर बरस ना बहा लें  बेशुमार जलवों का निशां अनोखा  ये पागल ...........।  जमजमा---संगीतमय,मनोरंजक                                               शैल सिंह 

एक सिरफिरा

     एक सिरफ़िरा  लड़का --- जुल्फ़ों के घुँघर पेंच ना रुख़ पर गिराइए गेसुओं तले ना चाँद सा मुखड़ा छिपाइए  लत लगी नज़र को क्या नज़र है आपकी  बला की इस अदा से ना बिजली गिराइए ।  छुप-छुप के मेरे ख़्वाब ना दिल के चुराइए  ना बन के खुश्बू ख़्वाब के सिरहाने आइए  क्या हुश्न का जलवा क्या शक़ल है आपकी  ऐ अज़ीज ना इस फ़न का दीवाना बनाइए ।  लड़की -- कसम ख़ुदा की आपके जज़्बात को सलाम  होश फ़ाख़ता हो जाये न सुन मेरा ये कलाम नज़ीर बेमिसाल रब की हूँ होगा बुरा अंज़ाम   हुज़ूर दिल के इस हरिना को लगाइये लगाम । निग़ाहों की तीखी बरछी ना मुझपर चलाइये    इल्तज़ा है ज़नाब हनक से घर पर आ जाइये  गुरू ख़िदमत से होगी खूब हज़ामत आपकी   आकर पापा से आशिक़ी का भूत उतरवाइये। 

होली के लिए विशेष

            होली के लिए विशेष  होलिका दहन में मन का अहंकार दहन कीजिए मिल-बैठ बांटिये अग़र हो सके दुःख-दर्द आपसी इर्ष्या,द्वेष भाव,सन्ताप और विकार शमन कीजिए । सच्ची प्रीति की बरसातों का फुहार चलन कीजिए फाग गाते ढोल,तासे और मजीरे झूमकर बजाइए रंगों की होली धूम-धाम से जाकर घर-घर मनाईये खिलखिलाईए  खुलकर   मिटाकर  मन की तल्ख़ियाँ  ठण्डई, भांग  में  मिसरी  प्यार की घोल कर  पिलाइए । हमसे शांति औ अमन जाने ख़फ़ा-ख़फ़ा सा  है  क्यूँ   हम  गले से   लगाते जिनको  करते  जाने   जफ़ा  हैं  क्यूँ   उन्मादी हो  गए कुछ  लोग  जो  करते  ख़ता  बार-बार  उनको भी  जरा   मुहब्बत से अर्क प्यार का चखाईये ।      

मेरी पहचान 'शैल शिखर' सा

मेरी पहचान 'शैल शिखर' सा ग़र दे न सको कभी मान तो अपमान ना करो कभी ख़ुद के सस्ते नाम पर अभिमान ना करो ।  मैं कोई   नामचीन  हस्ती  की आवाज नहीं हूँ फिर भी  किसी परिचय का  मोहताज़ नहीं हूँ गीत,ग़जल  बस  शगल  मेरा अन्दाज़  यही हूँ 'शैल शिखर' सी हूँ  शैल  बस आगाज़ यही हूँ । दर्द-ए-ग़म ढाल गीतों,ग़ज़लों में मैंने गा लिया इस तरह नई  दुनिया मैंने ख़ुद की बना लिया जब-जब  किसी ने भेंट की तौहीन की सौग़ात  दिल में ज़ज्ब कर  उसे मैंने ग़ज़ल बना लिया ।  क्यों चश्में-नम हुई,का राज क्यों हैं आप पूछते आप की ही दी सौग़ात फिर क्यों  हैं  बात पूछते पूछना ही ग़र तो रख कर दिल पर हाथ पूछिए क्यूँ  आप  ऐसे हँसते हुए दुखते हैं लम्हात पूछते । जलाकर दिल का दीप घर में रौशनी कर लिया सब पूछते क्यों सारी रात 'शैल' जलता  है दीया जिस तरह   शमा  ये  रात भर जल कर जलायी है जानती हूँ  साथ  मेरे   सारी रात  जल रोया है दीया । क्यों बार-बा...