सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का
नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर,
छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा 
हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर ।

वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर 
मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से,
जिस उर के उद्गार को कर सकी ना उजागर 
उसे कर ली आभास धड़कन की आवाज़ से ।

तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे 
प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से,
समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये 
तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।

रहे वीराना सा मन का गलियारा गवारा नहीं 
गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं,
तरस रहे तेरी आवाज़ को मुद्दत से कान मेरे 
किसी ने मुझे मेरी प्रिये कह भी पुकारा नहीं ।

 इमदाद---मदद 

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित


टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 23 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

    आमंत्रण की सूचना में देरी के लिये क्षमा।

    जवाब देंहटाएं
  2. हृदयस्पर्शी रचना।
    सादर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. विरह के रस में भीगी सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं

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