ख़ुद बेहिसाब रोते अकेले में

कितना हंसाया लोगों को मैंने ख़ुद की हंसी के ठहाकों से 
क्या मालूम लोगों को तकिया तर किया अश्क़ से रातों में 
जिसकी राजदां हैं बे-ज़बान ख़ुद की तन्हाईयां,परछाईयां 
कभी ग़म किया नहीं ज़ाहिर मस्त रही हंसी के ठहाकों में,

जो बेहिसाब हंसाते लोगों को ख़ुद बेशुमार रोते अकेले में 
जो हंस मिटाते ग़म औरों का ख़ुद का ग़म पीते अकेले में 
काश कोई पढ़े मस्तमौलों के दिल की उदासी का द्वंद भी 
जो ग़म का सैलाब छुपा हंसी के नक़ाब में रोते अकेले में,

जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का
ग़ज़ल,अंजुमन, हुजूम ही लगती दवा उसे अपने मर्ज़ का
कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से
जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे ग़ज़ल बज़्म में मर्म का,

हुजूम---भीड़ या जन समूह,   बज़्म-- महफ़िल,
शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

टिप्पणियाँ



  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 7 अक्टूबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आपका पम्मी जी मेरी रचना पॉंच लिंकों का आनन्द में शामिल करने के लिए

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