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नींद पर कविता '' बोझल पलकों को कर-कर ''

नींद पर कविता शब शबाब पर होती अपने नींद क्यूँ रहती ऐसे बेखबर , आती नहीं आँखों में पगली  बोझल पलकों को कर-कर बावरी सी भटकती फिरती जाने कहाँ-कहाँ इधर-उधर , बगल वाले का ख़र्राटा जब चुग़ली करता इन कर्णों में तब इक भभका सा उठता  जलन होती है मेरे वक्षों में , मन्त्रोच्चार करुं मन ही मन या जपूं राम नाम की माला निगोड़ी करे बेहयाई चाहे जप,पड़ जाये जीभ में छाला , मेरी दुर्दशा पर तकिया अंगरे अकड़े करवट दुर्गति पे अपने तड़पाती रात की तन्हाई हाय तल्ख़ हो कुढ़ते भोर के सपने , लिहाफ़ ओढ़ूँ या तानूं,खींचूं कानों के छज्जे पे कर कब्ज़ा भनभनाना मच्छरों का जारी खूँ चूसते रहते हैं कूज़ा-कूज़ा , उपक्रम नींद का करती जब टपक पड़ती भोर की लाली विहंगों का चहकना गूंज उठे  बजा देती घण्टी काम वाली , फिर जुत जाती हल बैलों सी रोज़मर्रा के तमाम कामों में यही होती रोज की दिनचर्या थक जाती इन समस्याओं में। शब्--रात, शबाब--जवानी कूज़ा-कूज़ा--कुल्हड़ या सकोरा भर-भर  ...

कविता '' तृषित अंजलि का अमृत जल पिला के ''

 '' तृषित अंजलि का अमृत जल पिला के '' दूर मंजिल बहुत,हूँ तन्हा सफ़र में         मगर  बांटने  हर-पल  तन्हाईयाँ               साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में। कभी मुख पे डाले घटाओं के घूँघट           कभी बादलों के झरोखों से झांके                 कभी सुख की लाली का आलम लिए                      दर्द की मांग भर जाये चुपके से आके। कभी वैरागि मन की पगडंडियों पर        तृषित अंजलि का अमृत जल पिला के                कभी फायदा भोलेपन का उठाता                   लुका-छिपी कर छलता रहा आते-जाते। कभी सोई अनुभूतियों को जगाता      कभी थम सा जाता पराजय पर आके            कभी झकझोर कर गुदगुदाता हँसाता         ...

चुनौतियों से लड़कर जीना अब तो मैंने स्वीकार लिया

चुनौतियों से लड़कर जीना अब तो मैंने स्वीकार लिया  मुक़द्दर के शहर में भटक रहा है,मेरे जीवन का लक्ष्य मित्र कहाँ से कहाँ पहुँच गए,थे जो कभी मेरे समकक्ष, हैरां हूँ खुदा  के फैसले पे,था जो सबसे श्रेष्ठ सबमें दक्ष उसके साथ अनीति क्यूं ऐसी पूछ रही प्रश्न बनके यक्ष, रही ना ताक़त संघर्षों की मन का विश्वास भी हार गई अखर रहा जीवन भर की ही सारी मेहनत बेकार गई, उम्र के इस ढलान पे आ चाहतों ने भी दम तोड़ दिया चुनौतियों से लड़कर जीना अब तो मैंने स्वीकार लिया  , असफ़लता से हार न मान दुश्मन के चाल से हार गई साथ मेरे ये बार-बार हुआ  जालसाजी का शिकार हुई।  सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

" कब किसके संग कहाँ किया भेदभाव "

कविता " मोदी जी पर " एक के खिलाफ सारे लामबंद हैं जिसके साथ बस आवाम चंद हैं जिसने महका दिया नाम देश का  विश्व के फलक पर फूल की तरह वो इंसान मोदी ससम्मान पसंद हैं ।                            सरसठ वर्षों की चरमराई व्यवस्था है पटरी पर भी लाना वक्त तो जनाब चाहिए । जिसका घर परिवार पूरा देश दोस्तों उसे देशवासियों का सहयोग बेहिसाब चाहिए । अभी तो हुए हैं जुम्मा-जुम्मा चार दिन सारे विरोधियों का जुमला बस हिसाब चाहिए । टमाटर,प्याज,दाल तक हैं सीमित जो वो बताएं उन्हे कैसे भारत का ख़िताब चाहिए । स्वप्न कमरतोड़ मशक्कत का जिसके कि हर क्षेत्र में भारत होना बस आबाद चाहिए । बन्द कर दीं लूटने खाने की खिड़कियाँ बताओ देेश,लुटेरों को देना क्या जवाब चाहिए । कब किसके संग कहाँ किया भेदभाव जिसे बस सबका साथ सबका विकास चाहिए । जाति,द्वेष,धर्म में बांट मत देश तोड़िए प्यारा हिन्दुस्तान आपको भी तो नायाब चाहिए । बढ़ती हैसियत भी जरा देखेें हिन्द की हिन्दुस्तान को मोदी सा कद्दावर अंदाज चाहिए ।  ...

कविता '' हो गए तुम अपरिचित से प्रीति की लत लगा ''

'' हो गए तुम अपरिचित से प्रीति की लत लगा '' हर रात स्वप्नों की गठरी मेरी पलकों पे रख, सुबह रश्मियों का उपहार दे जगाते हो क्यूं शहद मिश्रित परिन्दों के कलरव निनाद सा गुनगुना,मुझे सुबोध परों से सहलाते हो क्यूँ , प्यास अधरों की जगा सरगम श्वसनों में भर   छेड़ उन्मुक्त सिहरनें गुद-गुदा जाते हो क्यूँ हौले स्पर्श से मन की कुमुदनी का शतदल कर मधु सा मौन संवाद,खिला जाते हो क्यूँ , तेरी दक्ष दग़ाबाज़ी में जली हूँ मैं परवाने सी   करूँ कोशिशें बहुत तुझे भूल जाने की रोज मगर दृग में स्वप्नों का जलता दीया ढीठ सा रख जाता लौ आश्वासनों का मुहाने पर रोज , माना कि होतीं हैं नब्ज़ें स्पन्दित तुम्हारे लिए पर अब मौसम भी धैर्य के मानो ठूंठ हो गए मेरी आवाज़ें भी लौट आतीं क्षुब्ध दर से तेरी         हर आहटें,दस्तक़ें भी अब मानो झूठ हो गए , कितनी रातें काटीं पट झरोखों का थामे हुए  नयन निरखते रहे रा...

ग़ज़ल '' शमन कर दे तपन दिल की वो सावन नहीं आता ''

 '' शमन कर दे तपन दिल की वो सावन नहीं आता '' दीप आशाओं के पलकों पर जो हमने जलाए हैं जिनकी राह में दरीचों के ना कभी पर्दे गिराए हैं हवा की ज़द में जलती रहती निर्धूम लौ नैनों की आईना पूछता तस्वीर किसकी दीद में बसाए हैं , रही ग़फ़लत में कि वह रूह से हमको भुलाए हैैं पर दिल के तहख़ाने में मौज़ूद वो डेरा जमाए हैं  उम्र भर जिसकी सुध में कसकी रैन सुलगी भोर   वो दिल के दरों-दीवारों पे अक्सर मेला लगाए हैं , क़बीले के सभी सोते हम रातों की नींद गंवाए हैं वो गुजरेंगे गली-कूचे से ख़्वाब बेनज़ीर सजाए हैं वो ढलती सांझ के इन्तज़ार में ग़र बेज़ार रहते हैं हम भी   चंद्रिका   की आस में दिन बेढब बिताए हैं , जज़्बातों औ हालातों को समझाकर यह बताये हैं अज़ीज हो तुम्हीं मेरे दिल के यही यक़ीं दिलाए हैं जाने क्या करिश्मा था तुम्हारी काफ़िर निगाहों में वफ़ा की चाहत में तेरी यादों में ख़ुद को डुबाए हैं , कहा करते थे तुम हरदम मेरी नाज़नीन अदाएं हैं ...

ग़ज़ल '' मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब ''

वो मेरे दिल की धड़कन हैं मैं उनके दिलो जां की धड़कन हूँ अगर आँखों में नहीं आतीं मेरे चैन की नींदें तो उनके भी ख़्यालों की मैं मीठी-मीठी तड़पन हूँ।   वो मेरे हर जिक़्रों में हरदम मैं उनके हर जज़्बातों में हरदम क़रन वो भोर की मैं उनकी शाम शीतल सी मैं उनकी दीवानगी में तो वो मेरे ख़्वाबों में हरदम। जब से दीदार हुआ उनका हर वक्त ऑंखें बेक़रार रहती हैं यकीं इतना मुझे ऐसे ही वो भी बेज़ार रहते हैं  वो मेरे लिए हैं खास मेरी भी उन्हें परवाह रहती है। दिल की बेबसी का आलम दिल समझता नैन हैरान रहते हैं अहसासों को समझने को बिछड़ना जरुरी है   मिठास दर्दों में भी होती भले हम परेशान रहते हैं। मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब किस्मत से ख़फा ग़र ख़ुदा न हो   ज़रा सी ज़िन्दगी में बेहिसाब मेला मुरादों का हर लम्हा हो ख़ियाबां सा हसीं मुहब्बत जुदा न हो। क़रन--किरण    ख़ियाबां--पुष्पवाटिका सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह