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हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की

हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की कहां आया भटकता हुआ तूं अजनबी  हूर का दीदार करने हीर की इस गली । तेरी निग़ाहों ने ऐसा क़तल क्यों किया कि ज़िबह होते गए दिल के रुतबे मेरे हाथ खड़े कर दिए रसूखी प्रहरी सभी  टूटते गए इख़्तियार के सभी क़ब्ज़े मेरे । तुमने दीदा से दिल का हरफ़ पढ़ लिया नाम अपने वसीयत ज़िगर की लिखाई जादूई रंग भर दिया खाली कैनवास में कि हाथ मैंने मोहब्बत की मेंहदी रचाई । कोई अक़्स देखे न चश्म में महबूब की दुनिया से कटकर फ़र्लांग भरने लगी हूँ जमीं पर चांद गगन से उत्तर आया लगे तांत हसरतों के दिन-रात बुनने लगी हूँ । चुपके आके पवन कान कुछ कह गई हरी लगने लगी मुरझाई लता द्वार की भर लिया फाग का रंग ओढनी में सब छू रहा अम्बर चरन पूछ पता प्यार की । ज़माने की परवाह पीछा ना करती रहे तोड़ आई रिश्ते सभी पाषाणी नगर से किस्मत की लकीरों पे  दास्ताँ छोड़कर  अस्त सूरज के पहले चली आई घर से । चोरी के अब तक पड़े हैं जालिम निशां नकब  सीने में आँखों से तूने लगवाई जो देख वदन की उधे...

माँ लौट आऊँगा जब भी दोगी सन्देश

माँ लौट आऊँगा जब भी दोगी सन्देश संग ले गया वह घर की रौनक़ें सारी बुढ़ापा संग सांय-सांय करे फूलवारी, सावन भादों सी झर-झर बरसें आँखें जबकि बरसात का मौसम बीत गया सरहद पार बसे किसी और मुल्क़ जा उन औलादों के विषय में क्या कहना , किस मोहपाश में बांध रखी फिरंगन कि भूला गाँव,गली शहर अपना देश आँखों में सपने भर जो कह गया था   माँ आ जाऊंगा जब भी दोगी सन्देश , बूढ़ी हो गईं आँखें अब तो इंतजार कर शिथिल पड़े उमड़ता ममता का सागर जाने कब बाती गुल हो जाये दोनों की हृदय के ख़्वाब सुनहरे रह जाएँ क़ातर  पहले यदा कदा पाती भी आ जाती थी अब तो वह कड़ी भी धीरे-धीरे टूट गई जाने कब आएंगे परदेश को जाने वाले सांसों की डोर शनैः-शनैः अब छूट रही अपनी मंज़िल छोड़ मंज़िल तलाशने निकला था घर से अपनों से दूर बहुत माँ-बापू का कांधा भूल खो गया कहाँ कभी न मुड़कर देखा हृदय शूल बहुत , जमीन,ज़ायदाद,मकान जिनके लिए, किये,यत्न से तृण-तृण पाई-पाई जोड़ उस घर का देखो...

नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे

अभी-अभी बेटी की शादी करके लौटी हूँ बेटी विदा करने का उद्वेलन क्या होता है बेटी वाला ही जान सकता है ,मैं भी अपने बाबूजी की बेटी थी ,अपने प्रियजनों से जुदा होते समय बेटी के मन में क्या आन्दोलन होता है ,वही हृदयस्पर्शी भाव मेरी कविता में व्यक्त है ,यह  हर बेटी की पीड़ा का असह्य व्याख्यान है । पिता ने लाड़ की नदी बहाई माँ ने ममता का सागर भैया के स्नेहिल बाँहों  की बड़ी हुई ओढ़कर चादर , परम्परा के निर्वहन में, मैं रीति की भेंट चढ़ा दी जाऊँगी कोई घोड़ी चढ़कर आएगा डोली में बिठा दी जाऊँगी , गाजे-बाजे साथ बाराती वर आया धूमधाम मेरे द्वारे चुटकी भर सिंदूर मांग भर नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे, फूट-फूट रोई माँ मेरी पिता ने रुँधे गले दी ढाढ़स भैया विलख दिए कांधा सौंप दी अपनी पूँजी पारस , आँसुओं की छछनी बाढ़ भी जुदा करने से रोक नहीं पाई सर पे डाल ओहार चूनर की कर दी गई मेरी विदाई , जब से जनम लिया है सुनती आई पराई धन हूँ ये कैसी है विडम्बना ,मैं तुलसी और किसी आँगन हूँ , स्वयं लहू से सींचा माँ ने पिता ने धन दौलत था समझा भैया ने न...

कुछ पंक्तियाँ बिखरी-निखरी

चित्र
१-- कभी काजल के मानिन्द बसे हम उनकी बेजार निगाहों में अब नौबत कि नजरें चुराकर बगल से गुजरा करती उनकी , २-- मेरे ख़्वाबों में दबे पांव आता है कोई आकर मुझे  नींदों से जगाता है कोई , ३-- कम्बख़्त नज़र एक सी आग लगाई दोनों तरफ वहाँ करार उन्हें नहीं इधर चैन बेक़रारी को नहीं , ४-- जल कर मोहब्बत में दिन-रात दिल खाक़ कर लाए न बहारों का लुत्फ़ ले पाये न ख़िज़ाँ के साथ रह पाए , ५-- वायदों का अलाव जलाकर इन्तज़ार किया बहुत ऐतबार ने मगर क़त्ल किया है क़यामत की तरह , ६-- पाठ मोहब्बत का क्या पढ़ाया सबको भूला दिया तूने तो मासूम दिल पर  ऐसा कब्ज़ा जमा लिया पिला कर मय  निग़ाहों की दिखा  अदा के जलवे दूर ज़माने से किया  नकारा निकम्मा बना दिया , ७-- वहाँ घर उनके आई डोली इधर सर मैंने भी सेहरा बाँधा कितनी मजबूर मोहब्बत दुनिया से कर ना पाये साझा घर दोनों के रखना आबाद खुदा इतना तो रहम  करना जैसे राधा संग कांधा, इक दूजे के दिल में बसाये रखना । 8-- सूना कदम्ब सूना जमुना किनार...
हम सबकी परी नन्हीं परी कितनी प्यारी-प्यारी है माँ-पिता की राजकुमारी दादी-दादा घर पधारी है नानी-नाना की दुलारी नर्म फूलों सी सुकुमारी है मह-मह महकी फुलवारी सूने घर में ये अवतारी है बाँहें पालना नाना ने नन्हीं के लिए संवारी है नानी की सुन-सुन लोरी परी करती किलकारी है दीदी,भैया,मामी-मामा ने अंक भर नेह से पुचकारी है ताई-ताऊ सभी मौसियों ने परी की आरती उतारी है ।                           शैल सिंह

गले लग प्रेम का सूता सुलझाओ तो जानें

गले लग प्रेम का सूता सुलझाओ तो जानें ओ भारत के युवा प्रहरी जाबांज़  सिपाही कभी ना होना गुमराह बेतर्कों के झांसों में , बो कर नफ़रत का बीज भीड़ जुटाने वालों प्रेम मोहब्बत की ख़ुश्बू बिखराओ तो जानें क्यूँ निस्प्रयोजन तुम उलझाते हो आपस में गले लगा प्रेम का धागा सुलझाओ तो जानें , जन-मन की पूछ रही हैं सवालिया निग़ाहें  कहाँ गयी पहले वाली रौनक़ त्योहारों की सहमे भय,आतंक से बच्चे,बूढ़े,जवां पूछते  कहाँ गयी पहले वाली धूमधाम बाज़ारों की , कैसे ग्रहण लगा जीवन के मुस्काते रंगों को  कहाँ गया सम्मोहन हरे खेत खलिहानों का  खुद जीओ देश ,समाज ,पड़ोस को जीने दो होली जला,उपद्रवी कुंठित सोच विचारों का  , सपनों का महल बनेगा सजेगा,संवरेगा तब जब रक्षा करना सीखोगे दर औ दीवारों की अनेकता में एकता क्या होती  दिखलाना है    आवश्यकता है बेहतर जीवन में सौहर्द्रों की , प्रेम मोहब्बत इतना प्रगाढ़ बलवान बनायें सामाजिक समरसता के लिए आह्वान करें इंसान,दोस्ती की तस्वीर उजागर कर देखें मिलकर नफ़रत की खाई को शर्मसार करें...

वाह रे मिडिया वाले

वाह रे मिडिया वाले ,तेरी अच्छाई और बुराई दोनों ही चरम पर हैं ,सच्ची बातों के लिए आवाज़ बुलंद करते हो और कभी-कभी तिल का ताड़ बनाने में भी माहिर ,आजाद भारत में व्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति भी स्वछंद और स्वतन्त्र रूप में व्यक्त करने की आजादी नहीं है ।किसी के मुँह से वकार क्या निकली कि तोड़-मरोड़कर  गलत तरीके से गुमराह करने और मतलब निकालने का महारत भी पास रख लेते हो । खैर बुद्धिजीवियों और समझदारों पर तो इसका कुप्रभाव नहीं पड़ता । एक बात तो सत्य है की मोदी की लोकप्रियता और प्रसिद्धि विरोधियों के गले की हड्डी बन गई है ,वरोधी पार्टियां तिलमिला-तिलमिला कर जल भून रही हैं । इसीलिए अनाप-शनाप गुद्दी में गुद्दी निकालती रहती हैं ,लालू इतना घटिया स्तर का भाषण देता है किसी पर जूं तक नहीं रेंगता और कोई सही बात भी बोले तो बवाल हो जाता है राबड़ी जैसे लोग विहार की वागडोर थाम सकते है , बोलने के लिए बहुत कुछ है पर बवाल और टीका टिप्पड़ी सहने की क्षमता नहीं है उददंड और उजड्ढ लोगों की की बेसिर पैर बातें सुनने के लिए ।             ...