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जब-तब यादों का सोता उमड़ कर

जब-तब यादों का सोता उमड़ कर कहावत है तन बूढ़ा तो हो जाता है पर सच ,मन कभी बूढ़ा नहीं होता , पछुवा,पूरवा,भाटा,तूफान,बवण्डर आँधियाँ ना जाने कैसी-कैसी आईं फिर भी हृदय में जलता स्मृति का कभी अड़ियल दीया बुझा ना पायीं  , हिफ़ाज़त से अतीत को तस्वीरों में घर की दरों-दीवारों सजाये रखा है मैंने बचपन की यादों के हरेक पन्ने  ह्रदय के तलागार में दबाये रखा है , जब-तब उमड़कर यादों का सोता एकान्त में आर्द्र नयन कर जाता है खोल झरोखा दिखा परछाईयों को   खुशियों से सूना कोना भर जाता है , जीवन में जाने कितने आये गए पन पर सबसे सुन्दर अपना बचपन था यौवनपन की कुछ मीठी यादें साथ  संग इस पन में केवल चिन्तन आह, दिल बहका जी देख पुरानी तस्वीरें दिखा करते कैसे जवानी में हम भी पर सामने खड़ा यह हठात आईना  बता गया सच कहाँ आ गए हम भी , कैसा-कैसा विभिन्न रूप और रंगत  धारा है जीवन में यह माटी का तन पर परिस्थितियों के हर कैनवास पे  ख़ुद को सजा निख़ार कर रखा मन  , च...

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा जब दूर होगी हमसे,हिंदुस्तान से हिंदी फिर अंग्रेज़ी के साथ हमारा क्या होगा गंगा,जमुनी तहज़ीब संस्कृति,सभ्यता हमारे सनातन,धर्म का आगे क्या होगा , चन्द हिमायती अंग्रेजी को आबाद कर राष्ट्रभाषा का अनादर करते हैं कितना हमारी सांस्कृतिक विरासतों के गढ़ से  इसी मुई लिये लापरवाह रहते हैं इतना, अंग्रेजों को तो इस मुल्क से दिया खदेड़  ये अंग्रेजी यहाँ ठाठ से पोषित होती रही ग़फ़लत में हमारी इस सौतन भाषा संग   सनातनी धर्म पग-पग शोषित होती रही, अंग्रेजी की वक़ालत करने वालों की बस      मुश्किल से भारत में  मुट्ठी भर तादात  हिंदी करोड़ों भारतीयों के जुबां की रानी   भला कैसे करें पराई भाषा यहाँ बरदाश्त, न रंग-ढंग चाल-चलन रत्ती तहजीब ही   आदर-सम्मान छोटे-बड़ों का भाव नहीं ख़ाक़ करेगी बेअदब मुकाबला हिंदी का जिसमें देशप्रेमी रखते रंच भी चाव नहीं , मानते है...
'' हिंदी की महत्ता ''                                          जय हिंदी ,जय भारत ,       हिंदी पर लेख लिखने में अपार हर्ष और आनंद की अनुभूति हो रही है । हिंदी का सम्यक ज्ञान यदि मैं अपने लेख द्वारा थोड़ा भी जन मानस को दे सकूँ तो यह मेरे प्रयास की थोड़ी सी उपलब्धि होगी और अपनी लेखनी की कुशल शैली पर संतोष  और प्रसन्नता की अनुभूति भी होगी ।             बताते चलें कि विश्व में ८० करोड़ लोग हैं जो हिंदी को अच्छी तरह समझते हैं ,और ६० करोड़ विश्व में हिंदी बोलने वाले लोग हैं ।१४ सितम्बर १९४९ को वैधानिक रूप से हिंदी को राजभाषा का दर्ज दिया गया । संबिधान में अनुच्छेद ३४३ में यह प्रावधान किया गया है कि देवनागरी के साथ हिंदी भारत की राजभाषा होगी । हिंदी के माध्यम से आज रोजगार तथा कारोबार व्यवसाय के बड़े बाजार भी तमाम सम्भावनाओं के लिए दस्तक दे रहे...

बह गए रेत से सपने सारे

    बह गए रेत से सपने सारे  सोंधी ख़ुश्बू वातायन में बिखरा तो दी हो बरखा रानी टूटही छान से रिस-रिस कर घर में टपक रहा है पानी महलों के बाशिंदों को देती रिमझिम सावन की फुहार हम गरीबन पर गाज गिराती भसकी छप्पर हुए उघार जगह-जगह दरकाती धरती बेकाबू बरखा मूसलाधार बंगलों की बगिया महका के गमलों में फूल खिलाई हो यहाँ गुरबत की बखिया उधेड़ जंगल की बाड़ लगाई हो बजबजा रही हो घाव मनमाने उद्दंड बारिश की बूंदों से टीसों में भर दी हो सिहरन, तेज हवा साथ इन झींसों से डगमग मंझधार में जीवन नैया नहीं यहाँ कोई खेवनहार हम ही सहते हैं मार सूखा की हमें ही करती बाढ़ बेजार कर्ज़ों में धँसी है हड्डी पसली घुन सा शरीर में लगा बुखार , आग उदर की भड़काती झोंपड़ी के चूल्हे की ठंडी राख आँखें आसमान टकटकी लगा काटीं जाग के कारी रात महलों के सब दिन लगें गुलाबी हमारे सब फीके त्यौहार कजरी,विरहा भूल गए,आल्हा,उदल बिसरा गीत मल्हार चाँदनी फिसलती रही रैन में बंगलों,मेहराबों,गलियारों से छलक रही आँखें असहायों की टकराकर ढही दीवारों से दूधिया ...

अफ़सोस ये भारत देश के वासी हैं

अफ़सोस ये भारत देश के वासी हैं  हमारा देश ' कृषि प्रधान देश ' के नाम से सबको मालूम,विश्व विख्यात है इसी देश के नौनिहाल अन्न उत्पाद कैसे होता अज्ञात हैं , अहाते की छोटी सी फुलवारी में पिछवाड़े की छोटी सी क्यारी में तड़ी पड़ी थी धान की बेटी सयानी पूछी मम्मा ये कैसी घासें हरी-हरी परिधान की मैंने बोला जरई है ये बोल रही क्या होता है ये  मैंने बोला रोपनी होगी बोली रोपनी क्या होता है मैंने बोला धान की रोपाई होगी बोली धान रोपाई क्या होता है मैंने बोला शर्म करो तुम राईस ब्रीडर की बेटी हो इसी घास को खाकर सब मटियामेट कर देती हो कृषि प्रधान देश में रहती हो केवल खाती पीती सोती हो रोपाई का मौसम है निहुर-निहुर रोप रही थीं मूल्यानी खेत ले जाकर उसे दिखाया देख ले खेती होती कैसे अज्ञानी जिन्होंने पढ़ते-लिखते कॅरियर बुनते गाँवों को कोसों पीछे छोड़ दिया क्या जानेंगे नवयुग के आज के बच्चे जिनने सब रिश्तों से मुँह मोड़ लिया जिनने खोली शहर में ऑंखें सुख वैभव की जिन्हें मिली विरासत उत्पादन कितने चरणों से होके गुजरता  क्या जाने ये लोग इनकी ऐसी नफ़ासत बेटी की सहेली औ...

खुद को सेंक दीए की लौ में ,

सींकती रही दीए की लौ में  अम्मा क्यूँ नहीं मुझको भी तूने  भैया सा घर में अधिकार दिया  हक़ मेरे हिस्से का काट-कपट  भैया को ही केवल प्यार दिया , मुझको भी गर ' पर ' मिलता  उड़ती-फिरती मुक़्त गगन में  माँ डाल सूरज के शहर बसेरा  सुर्ख़  सी उगती नील गगन में , स्वप्न सुनहरे ऊँचे-ऊँचे बूनती लिखती नित नई-नई इबारत दुनिया को दिखलाती क्या हूँ  किसमें हासिल मुझे महारत , मुक़्त पखेरू सी फ़िजां-फ़िजां माँ विचरण करती जी भरकर साँझ,भोर का डर,भय ना होता  चलती बेख़ौफ़ राह पर डटकर , चील,कौओं की घूरतीं निग़ाहें  शीशे से वदन को बेंधती ऑंखें कंचन तन ढाला कांच में क्यों  कुतर दी गईं उड़ानों की पाँखें , बाबुल के घर जन्मी पली बढ़ी ससुराल पिया का घर कहती  है कौन सा घर मेरा बतलाओ माँ कहाँ बता मेरी निज धरती , कोई  भी मोल ना जाना मेरा  तोली गई जाने कित रूपों में जली दीया सी सबके लिए मैं खुद को सेंक दीए की लौ में , फरियाद करूँ किस...

हौसलों का दीप ना बुझने पाये

हौसलों का दीप ना बुझने पाये  भारत माँ के वीर जवानों तेरी जननी आज ललकारे बहा दो खून की होली जला दो जगमग दीप सितारे , रंग-रंग में तेरी जमा है इस धरती का खून पसीना स्वराज्य करो सपूतों खड़ी रहूँ मैं गर्व से ताने सीना सर झुके न बैरी के आगे मेरी अभिलाषा वीरों प्यारे बहा दो …… । इस पावन धरती पर गैरों का पदचाप न पड़ने पाये ओ वीर सिपाही तेरी धरती माँ न कभी तड़पने पाये ऋण अदा करना गौरव से भर आँचल माँ का दुलारे बहा दो  .......। कभी ना मानना हार पुत्रों ना पग पीछे कभी हटाना स्वतन्त्र रहे ये भारत भूमि दुश्मन के छक्के छुड़ाना जलता रहे निरन्तर हौसलों का दीया ना बुझने पाये बहा दो  ….…।                     शैल सिंह