संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है ।

इक दिन होगी जीत मेरी, पढ़ना ख़बर अखबार में 
हारे,टूटे,बिखरे अभी तक है असर का ख़ार मन में 
भले गुजर गई उम्र इस जंग में करना सफ़र बाकी 
वक़्त भले ख़ामोश यकीं है आयेगी बहार चमन में ।

कभी तो मुड़ेगी हवा की रूख मेरी भी ओर देखना 
सियासत ने छला जो ज़िद है जुनून हैं विकल्प मेरे 
कभी दुश्मनों में भी होगी मेरी ही शोहरत की चर्चा 
बुलंदी की इबारत लिखेंगे आस्मान पर संकल्प मेरे ।

मेरी काबिलियत शिकस्त खाई कूटनीतिक चाल में 
संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है 
कितनी भी मुश्किलों के पहरे हों मंजिल की राह में 
हठ लक्ष्य को है बेधना परवाज़ों को आस्मां छूना है ।

ठोकरों के सबक ही करते मार्गदर्शन कामयाबी का 
हार से खेल की शुरुआत होती प्रतिज्ञा की कुंजी से 
बदलेंगे दृष्टिकोण प्रश्नवाचक चिह्न लगाने वालों का 
देंगे हर बाजी को मात विलक्षण दक्षता की पूंजी से ।

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

टिप्पणियाँ

  1. जब कोई अपने दर्द को अपनी ताकत बना ले उसे कोई हरा नहीं सकता।
    बेहतरीन अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपका बहुत बहुत आभार श्वेता जी, ऐसे ही प्रोत्साहित करते रहिए।

      हटाएं

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