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क्षणिकाएँ

          क्षणिकाएँ  हर्षित मन से है करना अभिनन्दन  नवल वर्ष पग धर रहा है देहरी पर दो हजार इक्कीस ने खींची रंगोली द्वारे वंदनवार सुमन सजा मही पर।  हृदय में लहरों का नर्तन प्यास हलक तक बनी रही कश्ती खाती रही हिचकोले मौज़ों की माँझी से ठनी रही आस की नैया ले तूफानों से आस्था की वल्गा थाम टकराई क़िस्मत मँझधार ले डूबी कश्ती   प्रभु तुझे तनिक तरस ना आई , जब घर में आग लगानी थी कान सटे थे लगी दीवारों के उस घर की हालत कैसी है कोई थाह न लेता बेचारों के ताक-झाँक ना कोई हलचल अब ना कोई हरक़त गलियारों के बहुत कुछ मिला पर सुकूं ना मिला ख़्वाहिशों की लम्बी कतारों के आगे कब होंगी ख़तम ज़िन्दगी की जरूरतें जिए जी भर उमर कहाँ ख़वाबों के आगे , दर्द घुल बह ना जाये कहीं प्यार का  इसलिए आँखों का पानी ना बहने दिया क़तरा-क़तरा मोहब्बत की निशानी समझ  पलकों की पनाहों में ऐ फ़रामोश रहने दिया नयनों के चंचल चितवन में पढ़ ली,क्या है मन की भाषा अधरों के कम्पन से सुन ली,क्या है अंतर की अभिलाषा क्यूँ पलकें नीची कर जतलाती ...

क्षणिकाएं

           क्षणिकाएं  कहीं तुम भूल ना जाना कमल के फूल का निशां कर्दम में भी  खिलते  देख लौट जाती  है आ ख़िज़ां कमल के जड़,तनें छैले नींव का विस्तार देखो ना फ़ख़्र होता  सुन  नमो नाम  जिसका क़ायल है जहां  । काटनी है सरसठ सालों की कांटों की बाड़ बोई  अर्सों बाद तख़्तो-ताज पर विराजा है खास कोई आटा,दाल,आलू,पेट्रोल की मंहगाई का ग़म नहीं ऊंचा राष्ट्र का हो भाल ये  मन में भाव सबने बोई। हवा है लहर है गदर है शहर में चारों ओर खिलेगा अब कंवल ही यही गली-गली शोर जल रही किसी की है फट रही है किसी की   बदलाव की यही आँधी अब लायेगी नयी भोर। आकांक्षा पूरा भारत रंगे भगवा भगवा लौटकर फिर न आयेगा ये दिन दुबारा ये गुलशन हमारा ये बागवां भी हमारा हर चीज पर है बस हक़ हमारा हमारा । रब करे उनके जीवन में ना आये सवेरा भगवा रंग से जिनको शिकायत बहुत है जिनके ज़ेहन में हिन्द लिए नफ़रत का डेरा वो जाएँ वहाँ जहाँ की करते वकालत बहुत हैं। अभी तो हुए हैं जुम्मा-जुम्मा चार दिन क्यों मोदी से सवाल...

" अम्बेडकर का संविधान बदल देखिए "

        आरक्षण पर कविता           सरकार से निवेदन   हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए जनता की अरज पर भी अमल कीजिए नोटबंदी जीएसटी के  मानिन्द माननीय क़मर कस कर और इक करम कीजिए  आरक्षण के कोढ़ों से हो मुक्त देश मेरा इस दीमक से हो रहा खोखला देश तेरा मेहनतकश नस्लों पर भी रहम कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । आरक्षण के हवनकुंड चढ़तीं प्रतिभायें आर्थिक आधार पर हों चयन प्रक्रियायें इस नई मुहिम को अब सफल कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । तपती योग्यतायें इस मियादी बुखार में झुलसें बुद्धिजीवी आरक्षण के अंगार में महोदय इलाज़ का शीघ्र पहल कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । बढ़ते अपराध क्यों परत तक तो जाईए आरक्षण हटा कर एक बार आजमाईए ऐसी महामारी का अबिलम्ब हल ढूंढिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । प्रतिभावों संग होता ये अत्याचार रोकिए हौसलों का पर ना कतर कर के फेंकिए अंबेडकर क...

'' अभिनन्दन तेरा साल नवागत ''

    '' अभिनन्दन तेरा साल नवागत '' नई ऊर्जा लेकर नव वर्ष की आई है नई सुबह मन है पुलकित नई नेमतें ले आई है नई सुबह । नई उमंगें नई तरंगें लेकर आया साल नया नई हिलोरें लें मन में अंगड़ाई आया साल नया कर के इक युग का अन्त आया साल नया बीते साल ने की मेहरबानी भेज कर साल नया । फांस जो कुछ भी है बीते युग की दिल में  सूनें,सुनाएँ दिलों की सुलझाएं आया साल नया इक दूजे को दिल में बसाएँ और बसें हम करें भूले विसरों को याद चलो आया साल नया । चाहे जैसे गुजरा पर गुजरा पिछला वर्ष  फिर ना देहरी दहशत लांघे आया साल नया नए उछाह से नवल वर्ष में हो नव उत्कर्ष  धवल प्रवाह से नव पर्व मनाएं आया साल नया । अनसुलझी सुलझााएं पहेली नई पहल से   हर्ष आह्लाद से करें अभिनंदन आया साल नया नव वर्ष के शुभागमन में हो नव आयोजन हो नव वर्ष का मंगल सूर्योदय आया साल नया । बीते वर्ष के अवसान तले करें दफ़न हम क्रोध,अहं,द्वेष नई भावना भरें आया साल नया नव वर्ष में फूटे नेह से नव प्रेम का अंकु...

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा सबके साथ सबके विकास का सुर में सुर मिला साथ चलने का न खाऊँगा न किसी को खाने दूँगा इसी तर्ज़ पर आगे बढ़ते रहने का , इक देशभक़्त ने वीणा उठा लिया है  समूचा भारतवर्ष बदलने का जन-जन से आह्वान किया है संग-संग क़दम मिलाकर चलने का , दृढ़ संकल्प है उसने ठान लिया घर-घर नया सवेरा लाने को मन को ज़िद पर अड़ा लिया है घना अँधियारा दूर भगाने को  , वर्षों से कोने-कोने विष जो वातावरण में घुला हुआ था जिन संग हवाओं का दल भी खूब आकण्ठों डूबा हुआ था , इक देशभक्त फ़कीर दीवाना इन विषधरों से चला है टकराने इरादों में परिवर्तन का निश्चय ले देशद्रोही,गद्दारों को समूल मिटाने उलझा चल रहा काँटों से दामन काँटे भी पग उसके चूमने लगे हैं सत्तर सालों का मंज़र देखे नयन नये भारत का सपने बुनने लगे हैं , क़द्रदान अनेकों इस सच्चे हीरे के बड़े-बड़े धुरंधर हाथ मिलाने लगे हैं उसके हर फ़ैसले की कर सराहना देश के हर नागरिक मुस्काने लगे हैं , इक स्वप्न है उसने दृढ़ता से दुहराया  जड़ से समूल भ्रष्टाचार मिटाने क...

नज़्म ' जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का '

जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का याद कभी आये ना वो मेरे सपनों में भी सख्ती से दरबान पलकों को   ताक़ीद  कर दी कसम से लौटा दी   नफ़रत की  सूद सहित  पाई-पाई उसे भी ज़िक्र कभी छेड़ें हवाएं भी ना ताकीद कर दी कसम से जब से तोड़ा हर रिश्ता उससे ताल्लुक का खुद को  तन्हाई, गम ,उदासी से फ़ारिग कर ली कसम से मुद्दतों बाद मिला सुकून मेरी रूह को दिल की विरां महफ़िल फिर गुलजार कर ली कसम से कहांँ थी काबिल ही वो मेरे मिज़ाज़ के सच में   किस सांचे में ढाला था उसको ख़ुदा ने कसम से ।                                                            अगर ठान लो लक्ष्य हासिल है करना घूंट इंतजार का होता कड़वा बहुत है इंतजार इक दिन दिखाएगी मंजिल तुम्हारी । माना सफ़र इतना आसां नहीं है मगर राह तकती है मंजिल तुम्हारी अगर ठान लो लक्ष्य हासिल है करना मिलके रहेगी हर सूरत में मंजिल तुम्हारी कर्म और श्रम पे अपने ग़र है विश्वास इ...

समंदर पर कविता , ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके

समंदर पर कविता  ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके साहिल से टकरा मुड़ जाना शगल बस तेरा ऐ समंदर ये शरारत तुम्हारी अच्छी नहीं । रेत पर जो बनाए थे सपनों के घरौंदे चल दिए लीलकर तुम बदी की तरह ऊँची लहरों का रखो पास अपने गुमां बह सकते नहीं तुम जब नदी की तरह। कंठ तर कर सकते नहीं जब तुम नीर से जल के महानद में डूबे आकंठ किस काम के स्वाती की इक बूंद को सीप तरसा करे इतने विशाल होकर भी तुम किस काम के। आचमन भी जिस जल का दुष्कर लगे जिससे अभिषेक शिवालय का हो ना सके तेरी बादशाहत बस कायम लवण के लिए ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके । राज क्या है तुम्हारे विस्तृत साम्राज्य का जब-तब मचाती हलचल तेरी तह सूनामी है क्यूँ दुनिया की कड़वाहटें समेट तूं आक्रोशित होता या तट पर देख सैलानियों को होता बेकाबू है तूँ । तेरी गहराईयों में इतनी गहन ख़ामोशी क्यों तेरी उत्ताल तरंगों से जी है बहलता सभी का  तूं तो खुद के प्यास की तलब बुझा पाता नहीं पर शेर,ग़ज़ल,कविता तुझी से संवरता सभी का । देखा उगते सूरज...