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आँखें खोलो पथभ्रमितों

आँखें खोलो पथभ्रमितों  सीमाओं पर डटे सिपाही कभी भेदभाव नहीं करते अपना जान जोख़िम में डाल महफूज़ हमें हैं रखते मौसम की परवाह न करते धूप,ताप गलन हैं सहते माँ रज का कण शीश लगा,हमवतन लिए हैं लड़ते जो कश्मीर का सुर अलापे जुबां काट रखें हाथों में कभी ना आना भाई मेरे कैसी भी बहकाई बातों में राम ख़ुदा में बांटा किसने क्यों नहीं समझ में आता क्यूँ नहीं इस माँ के लिए हृदय में कोई भाव जगाता जो माँ आँचल में आत्मसात की सदा तुम्हारा जीवन उस माँ के लिए भरा क्यों मन में बदबू सा है सीलन आँखें खोलो पथभ्रमितों दूजी 'जहाँ' की देखो तस्वीर जहाँ इन्सानों का मोल नहीं खींची हुई देखो शमशीर हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई का देश पुरातन ये भारत यहाँ सब धर्मों का होता पूजन देश सनातन ये भारत मत करो बग़ावत माँ से,नहीं जहाँ में कोई ऐसा देश जहाँ स्वर्ग उतर स्वयं हिन्द का चूमा करता है केश भेदभाव,मतभेद मिटा भाईचारे की अलख़ जगाओ हम हिंदुस्तानी एक कुटुम्ब हैं दहशत मत फैलाओ ।       ...

किसने किस्तों में लूटा है देश सबको है पता

चित्र
           " नमो-नमो को समर्पित " किसने किस्तों में है लूटा देश सबको है पता [ १ ] ऐसा कोहिनूर हीरा कभी ना मिलेगा अरे देश वालों क़दर करना जानों सत्ता की लोलुपता में मसीहा ना नकारो महान इस विभूति की शिखा तो पहचानो अंतर्मन के द्वार खोलो और देखो उजाला क्यों तमस का आँखों पर परदा है डाला जिसने विश्व की जुबान पर हिंदी हिंदुस्तान का फूंक दिया है मन्त्र अपने गीता और पुराण का । [ २ ] सियासत के दांव-पेंच से अब उतर रहा नशा बदल रहा हमारा देश और सुधर रही दशा गा रहीं फिजाएं मुस्करा रही दिशा छंटी मन पर छाई बदरी,दीप्त हो रही निशा बहारों को भी है भा गई खिज़ां की हर अदा नदी,बावड़ी,तालाब हुईं कंवल-कंवल फ़िदा किसने किस्तों में है लूटा देश सबको है पता किसके चमके हुनर पर विश्व भी है दे रहा सदा ।                                    शैल सिंह

नमन तुम्हें नन्हें ज्योतिर्मय दीपक

नमन तुम्हें नन्हें ज्योतिर्मय दीपक                                                                                                                        निर्जन रजनी का तूं पथप्रदीप है अन्तर्मन आलोकित करने वाला जगमगाता दीप तूं पर्व पुनीत है चाहे जितने जुगनूँ तारे चमकें बजता हो आसमां में डंका चाँद का पर दीपक की परिभाषा अभिन्न तमकारा चीर सुख देता आनंद का हरने को तिमिर का हर पीर तुम्हें जलना दीपक तुम्हें निरन्तर लिखा बदा में मालिक ने तेरे नहीं कभी भी सुस्ताना पल भर , तुम द्वैत-अद्वैत के मिलन के दीपक तु...

देशद्रोहियों की मति गई है मारी का

देशद्रोहियों की मति गई है मारी का जहाँ सुबह होती अजान से कान गूंजे हनुमान चालीसा जिस धरती पे राम-रहीम बसते गुरु गोविन्द और ईसा जहाँ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई में भाई-भाई का नाता जहाँ की पवित्र आयतें बाईबिल ग्रन्थ कुरान और गीता , हम करते हैं नाज़ जिस वतन की नीर,समीर माटी पर हम करते हैं नाज़ जिस चमन की खुशबूदार घाटी पर जिसकी आन वास्ते शहीद हुए न जाने कितने नौजवाँ उस मुल्क़ के मुखालफ़त गद्दार हुए बदजात बद्जुबां , पतित पावनी धरा पर भूचाल मचाया उपद्रवी तत्वों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी में पाजी अक़्ल लगी सनकने भारत के टुकड़े होंगे कहते हैं कश्मीर नहीं भारत का बेलगाम नामुराद देशद्रोहियों की मति गई है मारी का ,                                               इक दिन बिखर जायेंगे अभिव्यक्ति की आज़ादी वाले दहर में देखना टूटे हुए जंजीर की कड़ियों की तरह उठेंगी दश्त में घृणा भरी निग़ाहें ब...

आतंक की घृणित विभीषिका पर मेरा अंतर्द्वंद

आतंक की घृणित विभीषिका पर मेरा अंतर्द्वंद  नित देख जगत का आहत दर्पण पन्नों पर मन का दर्द उगलतीं हूँ अब जाने कब होगा जग प्रफुल्ल  सोच कविता में मर्म विलखती हूँ , काश करतीं व्यथित शोहदों को आतंक की चरम घृणित क्रीड़ाएं कोई मुक्तिदूत बनकर आ जाता हर लेता जग की क्रन्दित पीड़ाएँ , कभी ग़र घोर निराशा के क्षण में कहीं से छुप झांक पुरनिमा जाती पुनः अगले पल कुछ घट जाता रे जैसे ही सुख भर पलकें झपकाती , जब-जब हँस उषा की लाली देखा कलह की सुख पर चल गई आरी फिर काली निशा हो गई डरावनी सुनकर कुत्सित षड्यंत्र की क्यारी , भाटे जैसी उठती हिलोर हृदय में व्यूह तोड़  लहरों में बह जाने को जग का दुर्दिन हश्र देख मचलता विवश कंगन कटार बन जाने को , रुख रहेगा अलग-थलग भावों का  ग़र आपस में ही लड़ते रह जायेंगे जो भी आदि बची जी दीन दशा में विष सुधा विद्वेष कलुष कर जायेंगे , सुरभित जीवन में मची कोलाहल सर्वत्र चीत्कार रहीं गलियाँ-गलियाँ भय ...

'' बहुत प्यारी हमको अपनी सरज़मीं ''

'' बहुत प्यारी हमको अपनी सरज़मीं  '' जाविदाँ ,जहाँ आफरीं हिन्द मेरा वतन जहाँगीर जाविदाँ मेरा ज़न्नत सा चमन नहीं ऐसा जहाँपनाह कहीं भी जहाँ में सारा जहाँआरा बाअदब करता नमन , जाके देखो जहांगिर्द नहीं कहीं पाओगे ऐसा जमील अौ जमाल है गुलशन मेरा ज़फ़ा जालसाजी छोड़ो ना गद्दारी करो जवान स्वालिह बनो मत किताली करो , आँखें दिखाने की जुर्रत ,जसारत करो ना वतन से मेरे जुलसाजी,गद्दारी करो पल में करेंगे जिलावतन सुनो काफिरों हम जाँनिसार वतन  पर सुनों जाहिलों , हम जाविरों को कभी माफ़ करते नहीं हम हैं कितने जलाली ये जरा जान लो हम हैं जाबांज जब्बार करने लेने वाले छोड़ो  जब्र जबरन कहा जरा मान लो , जम्हूरी सल्तनत नहीं हिन्द जैसी कहीं मेरे भारत माँ की जन्नत सी है सरजमीं जवाँ दौलत,जवाहरों का मेरा ये देश है जवांसाल,जवाँमर्दों का यहाँ समावेश है , जाविदाँ --शाश्वत ,अविनाशी जहाँआफरीं --संसार को रचने वाला जहाँगीर--चक्रवर्ती ,विश्वविजयी जहाँपनाह--संसार की सुरक्षा करने वा...

'' वर्तमान परिदृश्य पर मेरे विचार ''

                             '' वर्तमान परिदृश्य पर मेरे विचार ''              एक इंदिरागांधी थीं कि अपनी दूरदर्शिता से पाकिस्तान का विभाजन कर दो राष्ट्रों का निर्माण कर भारत को अक्षुण्ण बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ीं , मुझे तरस आता है राहुल गांधी की बुद्धि और विवेक पर जो इस देश को इस देश के लोगों को अभी तक नहीं समझ पाये और समझने का प्रयास भी नहीं कर रहे अपनी दादी का नाम तो भुनाते हैं पर उनके उसूलों,आदर्शों ,सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करते ,जिस देश को हमारी महान नेता श्रीमती इंदिरागाँधी ने अपने खून पसीने से सींचा हो उसी दूरदर्शी महिला का अपना नाती इतना घृणित और राजनैतिक गुंडेपन का परिचय दे रहा हो और उस बहरूपिये का समर्थन कर रहा है जो ये कहता है कि रोहित वेमुला मेरा आदर्श है मैं उस मंदबुद्धि से ये पूछना चाहती हूँ कि हमारे संविधान में आत्महत्या का क्या स्थान है हमारे संविधान में आत्महत्या को एक जघन्य अपराध माना गया है अरे आत्महत्या ...