निस्पंद से पड़े

हे कर्णधार साईं नाव मंझधार पार लगा दो
दीन,हीन,मलीन पे महिमा बरसा अपार दो ।

कितनी कीं याचनायें सरकार तेरे दरबार में 
कभी प्रार्थनाओं का तुझपर असर ना हुआ
क्या कमी थी प्रभु भक्ति,भाव,अर्चनाओं में 
के मेरी वेदनाओं का तुझको खबर ना हुआ ।

दिन रात तेरे अक्स को उतार कल्पनाओं में 
पूजती रही मन ही मन शाश्वत भावनाओं में 
तुम पूजा ना सके साध ज़िन्दगी की एक भी 
क्या कमी रही बताओ ना मेरी साधनाओं में ।

सुधि लोगे कब स्वामी कब बरसाओगे कृपा 
सर्वव्यापी भगवन हरोगे कब पीर,कष्ट,व्यथा
कर दो आभामंडल से अपने संतृप्त मन प्रभु
कब प्रसन्न हो बहाओगे संभावनाओं की दया ।

क्या करूं तुझको अर्पण करें कैसे स्तुति तेरी 
निस्पंद से पड़े ना सुनते क्यों कोई अर्जी मेरी 
तुम्हीं सृष्टि के रचयिता तुम भाग्य के विधाता 
तुम ही सर्वशक्तिमान चाहे जो करो मर्ज़ी तेरी ।

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 


टिप्पणियाँ

  1. जब मन पीड़ा में हो तो दिल से यही अभिव्यक्ति निकलती है।
    मर्मस्पर्शी।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ नवंबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आपका पांच लिंकों का आनन्द पर मेरी रचना को स्थान देने के लिए

      हटाएं
  2. सादर नमन आपको एक संवेदनशील आवेदन पत्र रचने के लिए तथाकथित विधाता के नाम ! परन्तु .. अगर सर्वशक्तिमान की मर्ज़ी ही होती तो यहाँ सरेराह बलात्कार और हत्याओं के सिलसिले ना होते .. शायद ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आपका,
      ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता उसकी मर्जी से ही दुःख सुख दर्द दवा दुवा सब कुछ होता है ।

      हटाएं
    2. बहुत बहुत आभार आपका,
      ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता उसकी मर्जी से ही दुःख सुख दर्द दवा दुवा सब कुछ होता है ।

      हटाएं

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