गीत कविता

राह तकते कटे दिन रैन 
तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया

जब भी मेरी बस्ती से गुजरा कोई राही
दौड़ झांकती झरोखा दिखते तुम नाहीं
बीते लमहों को याद कर रोईं बहुत ॳॅंखिया
तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया ।

मुरझा गया मनमोहक जूड़े का गजरा
बह गया ऑंसू़ संग आंखों का कजरा 
गालों की सुर्खी पर खींची रेखा कारी रंगिया
तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया ।

थाल फूलों से सजाया अगवानी को तेरे
मेंहदी हाथों में महावर पांव नाम का तेरे 
पिया किससे कहूं कैसे हिया की गूढ़ बतिया 
तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया ।

पता ना ठिकाना दिये लिखूं कैसे पतिया
आवन को कह गये निकली झूठी बतिया
बीते करवट बदलते रातें भींग जाती तकिया 
तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया ।

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

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