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पतझड़ और वसंत ऋतु

पतझड़ और वसंत ऋतु झर गये पात सब,हुईं ठूंठ डालियाँ उजड़े नीड़ पंछियों के हुईं सूनी टहनियाँ   मुहब्बत ख़िज़ाँ को हो गई सनकी हवाओं से तो कर बैठा दग़ाबाज़ी ख़िज़ाँ गुमां में बहारों से, निर्वस्त्र हुए शाख़ उद्दंड हवा के झोंकों से  विरान हुए सारे बाग बिन खगों के क़स्बों के  धन्य केलि तेरी कुदरत मनमौजी अठखेलियाँ कभी सर्द हवाएँ कभी गर्म हवाओं की शोखियाँ, दृश्य होगा मनोहारी द्वारे आयेंगे ऋतुराज स्वागत में भू पर पीले,भूरे सजायेंगे वृक्ष पात पतझड़ ने किया अवशोषण प्रत्येक पदार्थ का होगा सब्ज़ा का संचार रूत आयेगा मधुमास का, फिर से होगा कायाकल्प खिलेंगे बहार में झरे पत्ते ख़िज़ाँ में नई कोंपलों के इन्तज़ार में उन्मत्त हवा के रूख में जो दरख़्त थे सहक गये पा सौग़ात सजल नैनों से मधुमास के महक गये, कलियों ने खोला घूँघट मंडराने लगे भृंग मधुमक्खियों,तितलियों के उड़ने लगे झुण्ड  लहलहा उठी सरसों छा गई हरियाली चहुँओर कोकिल ने छेड़ी मधुर तान लद गये आम्रों पे बौर । सब्ज़ा—-हरियाली  ,  सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

ढल रही है ज़िन्दगी की उमर धीरे-धीरे

                                                 अब तलक उस लमहे को रोके खडी हूँ  जिसे छोड़ा अधूरा था उसने जिस हाल में कई अरसे गुजर गये आयेगा वो इन्तज़ार में कशमकश में जीती रही ज़िन्दगी भरी बहार में । मिट ना जाएं कहीं उसके पग के निशां किसी बटोही को उस पथ ना जाने दिया  खुला रख छोड़ा है दरीचे का पट आज तक इक दीदार लिए ही कभी पर्दा ना गिराने दिया राह शिद्दत से आज भी निहारतीं आँखें उसी का आस में किसी ग़ैर का नाम अधरों पर ना आने दिया । नींद भी उसी की तरह बेवफ़ा हो गई है सपने पलकों पर बिछाकर दगा दे रही है मुद्दत से खड़ी हूँ उसी मोड़ पे मैं इन्तज़ार में मुझको मेरी ही मोहब्बत कैसी सजा दे रही है कैसे भूल जाऊँ धड़कता दिल ख़यालों में उसके लगे रूह उसकी मेरे साये से प्रकट हो सदा दे रही है । ढल रही है ज़िन्दगी की उमर धीरे-धीरे  रोज रेत की भाँति मुट्ठी से फिसलती हुई चंद हसरतों की ख़ातिर चल रहीं साँसें मगर जीना दूभर लगे चले साथ मौत भी छलती हुई  कब तक बहलाती दिल दिल...

हम बस यही अब चाहते हैं

हम बस यही अब चाहते हैं सिकुड़कर अब सुरक्षा के कवच में सारी ज़िन्दगी हम नहीं रहना चाहते नजरिये सोच फ़ितरत में सभी के अबसे बदलाव हैं हम देखना चाहते । कड़ा भाई का ना हो हमपर पहरा  परिजन सभी के चिंतामुक्त हों ना पति बच्चों को हो फ़िकर कोई अकेले हों कहीं भी पर भयमुक्त हों । ना किसी अपराध का हो डर कहीं ना अश्लीलता,भद्दगी का घर कहीं दिन हो या रात हो या गली रिक्त हो नुक्कड़,राह निर्भय,निडर,उन्मुक्त हो । ना हो हावी किसी पर असभ्यता लोक लाज हो,हो हया में मर्यादिता  दिखे हर मर्द की आँखों में निपट निज माँ,बहन,बेटियों सी आदर्शिता  ना दरिंदों,दनुज की ग्रास बनें बेटियां ना निर्मम दहेज की बलि चढ़ें बेटियां ना कहीं दुष्कर्म,पाप का हो जलजला ऐसा अमन हो देश में सबका हो भला । ना आतंक,जिहाद का हो डर,भय कहीं सफ़र बेफिक्र हो दुर्गम भले हो पथ कहीं असुरक्षा के भाव से ना हो भयभीत कोई  साथ किसी मज़हब का हो मनमीत कोई ।

कुछ शेर

                   कुछ शेर  1-- मेरे सुकून भरे लमहों में क्यों आते हैं ख़याल तेरे  मेरी सोई हुई तड़प को क्यों जगा जाते हैं याद तेरे जैसे सारी रात परेशाँ रहती मैं,रहतीं पलकें बोझल  वैसे तेरे भी ख़्वाबों में शब भर करें तफ़रीह याद मेरे । 2-- हर रात ख़्वाबों में आते हों क्यों,बेहिसाब सताते हो क्यों  सताने का तरीक़ा भी लाजवाब,सामने नहीं आते हो क्यों  जागती तो दिखाई देते नहीं,सोने में दीदार कराते हो क्यों  तेरे शौक़ भी अजीब हैं यार,जगाकर याद दिलाते हो क्यों । 3-- जिन अल्फाज़ों में पिरोई थी मैंने सिसकियाँ मेरी सबने लफ्ज़ों के मर्म को समझा बस शायरी मेरी कोई भी ना समझा अश्क़ों में भींगे हुए मेरे दर्द को  खोल रख दी लिखी काजल से ज़िन्दगी डायरी मेरी । 4--- ग़र चल ना सको साथ मेरे तुम ज़िन्दगी भर तो दे देना सारी ज़िन्दगी तूं अपनी मुझे उम्र भर न कभी याद आओ तुम मुझे ना आऊँ याद मैं तुझे  चाहें टूट कर इस तरह कि हो जायें पागल इस क़दर । 5-- बेखटके ना आया करो यादों मेरी दहलीज़ पर तुझे कब का लटका चुकी हूँ  मैं तो सली...

बड़ी कातिल है मुस्कुराहट मेरी

बड़ी कातिल है मुस्कुराहट मेरी जबसे ख़्वाब तेरा सजाने लगी हूँ नाम का तेरे काजल लगाने लगी हूँ लोग कहते बड़ी खूबसूरत हैं आँखें मेरी चिलमन और भी अदा से उठाने गिराने लगी हूँ । जबसे अलकें गिराने लगी माथ पर इठलाती बलखाती चलने लगी राह पर लोग कहते बड़ी शोख़ है नज़ाकत मेरी कटि नागन सी और भी मटकाने लगी मार्ग पर । जबसे जिक्र पर तेरे मुस्कराने लगी हूँ हाल दिल का निग़ाहों से बताने लगी हूँ  लोग कहते बड़ी कातिल है मुस्कुराहट मेरी खिलखिला और भी बिजलियाँ गिराने लगी हूँ । जबसे जाम पी है नशीली आँखों का गुदगुदाता रहता है पल चाँदनी रातों का  लोग कहते बड़ी नाज़ों सी है नफ़ासत मेरी ढाती और भी क़यामत हूँ होता असर बातों का । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

कितनी शान से इतराता है तूं

ऐ चाँद उतर आ जरा जमीं पर  ये दुनिया तुझको भी नहीं बख़्शेगी  ग़र हटा दो मुख से घूँघट बदली का देख नज़ारा दुनिया यूँ ही सहकेगी , कभी बन ईद का चाँद ठसक से कितनी शान से इतराता है तूं कभी सुहागिनों के करवाचौथ का  बन चाँद छुप मनुहार करवाता है तूं चाँद सा मुखड़ा से नवाजते तुझे लोग छतों की मुंडेरों से निहारते तुझे लोग जब लगता तुम पर ग्रहण ऐ चाँद  क्यों इसी चाँद से आँख भी चुराते लोग   कभी तुम ग़ज़लों का सरताज बन महफ़िलों को कर देते हो गुलज़ार  कभी शेरो,शायरी,नज़्म में सज तुम सूने बज़्म को भी कर देते हो आबाद  कभी तुम चौदहवीं का चाँद बन कहलाते हो बड़े ही हो लाज़वाब  कभी तुम तनहा बादलों के पीछे छुप-छुपकर कर देते हो नाशाद कभी ईश्क़ की दौलत बन तुम सज जाते हो आँखों में बन ख़्वाब  कभी जेहन में,कुरेदकर जख़्मों को, दोस्तों का अक़्स उतार देते हो जनाब कभी उपमानों की कतार का बन जाते हो चन्दा सा उजियार  कभी उतरकर समंदर,दरिया में  सुरमई चाँद बन जाते हो यार किसी के होते पलकों के चाँद तुम  किसी के इन्तज़ार के महबूब तुम  किसी के हमसफ़र होते तुम चा...

नव वर्ष पर कविता " समरसता की गागर छलके "

समरसता की गागर छलके नव वर्ष लाये ऐसा उपहार  हम सबके सपने हों साकार  खुशियों की दे अनमोल सौगात  कर दे राहों में फूलों की बरसात , महकी हुई मधुमासी हवाएं हों सहकी हुई फिजाएं हों परिन्दे चहकें बगिया गमके  उल्लसित सभी दिशाएं हो , आत्मीयता से भरा हो मन  सुखमय हो हर घर उपवन  रिश्तों में हो मधुर मिठास  नव वर्ष में हो अतिरिक्त खास , सर्वत्र उत्कर्ष,उल्लास,हर्ष हो  ऐसा हम सभी का नया वर्ष हो मर्यादा का कभी ना हो उलंघन  हम सबके भावों में हो समर्पण , बीते वर्ष की खटास,वैमनस्यता भूलें अनबन,उदासी,असफलता लक्ष्यों को साकार करने हेतु  करें संघर्ष हम मिले सफलता , ऊँच-नीच,भेदभाव मिटायें  मन में कोमलता का भाव जगायें नव वर्ष में नये कार्य सम्पन्न हों नहीं कोई भूखा,गरीब विपन्न हो  कोशिशों,हौसलों के पंख लगाकर अपने अरमानों के उड़ान को, उतार लाएं मेहनत,श्रम से हम फलक से जमीं पर आसमान को , अतीत की अच्छी स्मृतियों से  वर्तमान को बनायें सुन्दर और समरसता की गागर छलके  आये वर्ष भर अनेक अवसर और , दुख,दर्द,मुसीबत,बिमारी हेतु करें प्रार्थना जड़ से हो ...