संदेश

“ हम हैं विश्वगुरु “

भारत फिर से विश्व के मानस पटल पर एक अलग पहचान बना रहा है ।                                                        ' हम हैं विश्व गुरु '     हो चाँद हमारी मुट्ठी में हमें करना सूरज भी बस में      उत्तुंग शिखर से सागर तक हम चमकें सारे जग में । शांति,अमन के हम प्रहरी तुझे पाक उत्पात मचाना आता  जब ख़ुश्बू होगी आम हमारी करनी पर होगा तूं पछताता । हम बेजा वक़्त नहीें गंवाते तुझ सा असभ्य हरकतें कर के  करना मुकाबला तो आओ ना पथ विकास के चल कर के ।   भगवान हमारे मस्जिद में रमते ख़ुदा रहता मन्दिर में तेरा हम सुनें अज़ान मस्जिद की सुने तूं स्त्रोत मन्दिर का मेरा । हम मलयज सा महक फ़िज़ा में बिखरा रहे दिन-प्रतिदिन  ग़र देते लोबान का तुम सोंधापन आकंठ लगाते निशदिन । चाँद पर होगा घर अपना करेगा सूरज भी मेहमाननवाजी  बिछाओ चौपड़ की कोई भी बिसात हम जीतेंगे हर बाजी । जल,वायु,अवनि,अंबर ...

लॉकडाउन की तन्हाई पर कविता

गुमसुम सी है सुबह,सुनसान शाम आजकल  ख़बरदार मेरी तन्हाई में न डाले कोई ख़लल । करीब मेरे बेहिसाब ख़यालों के आशियाने हैं  दिल के बन्द कक्षों में कई यादों के ख़ज़ाने हैं इसीलिए तन्हाईयां मुझे तनहा होने नहीं देतीं जगाकर रखतीं रात भर कभी सोने नहीं देतीं । मुझे भी हो गई अकेलेपन से मुहब्बत इतनी भाईं नहीं किसी की भी नजदीकियां जितनी ख़ुशी ना उदासी बैठे हैं ख़ामोश सुबहो-शाम लगने लगीं सुखदायिनी भी तन्हाईयां कितनी । फिर पुराने मौसम आ गये लौट के तन्हाई में  अपनों से बिछड़ना दर्द,ग़म जख़म जुदाई में जो बीता,गुजरा लिखा मन बहला लिया मैंने और तन्हाई में तन्हा ही जश्न मना लिया मैंने । विरां वक़्त मग़र हैं बिचरते माज़ी के कारवां  मुद्दतों बाद भी महसूती आज भी वही समां अतीत के सुरंगों में संजो रखी जो असबाब मेरी तन्हाईयां उनसे ही गुलजार औ आबाद । असबाब--सामान,वस्तु सर्वाधिकार सुरक्षित                 शैल सिंह

" बस चितवन से पलभर निहारा उन्हें "

वो जो आए तो आई चमन में बहार सुप्त कलियाँ भी अंगड़ाई लेने लगीं चूस मकरंद गुलों के मस्त भ्रमरे हुए कूक कोयल की अमराई गूंजने लगीं । फिर हृदय में अभिप्सा उमगने लगीं नयन में चित्र फिर संजीवित हो उठे           मृदु स्पन्दन अंग की उन्मुक्त सिहरनें  पा आलिंगन पुन: पुनर्जीवित हो उठे । स्वप्न पलकों के आज इन्द्रधनुषी हुए निशा नवगीत सप्तस्वर में गाने लगी हृदय के द्वारे मज़मा आह्लाद के लगे चाँदनी और शोख़ हो मुस्कराने लगीं । अधर प्यासे वो सींचे अधर सोम से  मन के अंगनाई शहनाई बजने लगी बस चितवन से पलभर निहारा उन्हें भोर की तत्क्षण अरुणाई उगने लगी । फिर से बेनूर ज़िन्दगी महकने लगी  जब से ख़ुश्बू उनकी घुली साथ है हरसू लगने लगीं अब तन्हाईयाँ भी उर घुला  मधुर मखमली  एहसास है फासले हुए ऐसे नदारद ज़िन्दगी से  खुशनुमा-खुशनुमा हर पल आज है जब से आए हैं वो वीरां ज़िन्दगी में तब से सारा शहर लगता आबाद है, भयभीत होती नहीं हो  घनेरा तिमिर चाँद सा हसीं महबूब...

इन्तज़ार और याद पर कविता " आँखों के आँगने उतर ना देतीं जागने की सज़ा "

" आँखों के आँगने उतर ना देतीं जागने की सज़ा " सूरज की तप्ती दोपहरी चाँदनी सी शीतल रात  बीतीं जाने कितनी भोर संध्याएँ बीते कित मास । अब तो हो गई है इंतिहा आँखों के इन्तज़ार की लगता बिना तेरे मैंने कितनी शताब्दी गुजार दी हर साँझ जला रखते दृग,पथ उम्मीदों का दीया बुझा अश्क़ों की वर्षात से मिज़ाज को क़रार दी । निश-दिन भींगती तेरी यादों में बरसात की तरह वह कशिश कहाँ बरसात में तेरी यादों की तरह  यादें भी क्या बला  रखतीं बैर आँखों की नींद से तोड़ देतीं दिला यादें निर्दयी यादों को उम्मीद से । मुहब्बत में बिछड़ने का ग़म बस मुझे होता क्यूँ दर्द अनुभूतियों का मुझ सा नहीं तुझे होता क्यूँ जैसे बिताती बेचैन रातें बिन तेरे तन्हाईयों में मैं वैसी ही बेचैनी का अहसास नहीं तुझे होता क्यूँ । कभी बोये थे मेरी आँखों में तुम्हीं ख़्वाब सुनहरे कभी मंडराए थे भ्रमरे सा कैसे भूले साँझ सवेरे  अपने ज़ुल्फ़ के पेंचों में कर गिरफ़्तार बाज़ीगर कैसे किया देख हाल आके डाल आँखों में बसेरे । कभी बन पवन का झोंका  खेल जाते गेसुओं से   कभी कर जाते पलकें नम बरस नैन के मेघों ...

कविता " यादें बचपन की "

                   " यादें बचपन की " अभी तक है घुली नथुनों में सोंधी ख़ुश्बू गांव की    याद छत पे सोना कथरी बिछा धूल भरे पांव की । बारिशों में भींगी मस्ती क़श्ती कागज की बहाना  गर्मियों की चाँदनी रातें बिछी खाटें खुला आँगना शरारतें,नदानियां,रुठना,मनाना खिल्ली ठिठोली याद बालेपन का घरौंदा साथ सखियों का सुहाना । खांटी दूध,दही,छाछ,अहरे की दाल चोखा भउरी ज़ायके घुघुनी रस के रसदार तरकारी में अदउरी लुत्फ़ खीरा ककड़ी का मकई के खेतों का मचान  भूली नहीं मेलों की चोटही जलेबी,लक्ठा,फुलउरी । कारे मेघा पानी दे घटा से बरस जाने की मनुहार  माटी में लोट कहना,साथियों के संग की तकरार  आलाप आल्हा-ऊदल का रासलीला,मदारी खेल कहाँ गईं वो चीजें  बाइस्कोप,नौटंकी की झन्कार । दूसरों के बाग़ों से टिकोरा तोड़ना भरी दुपहरी में  झगड़े कुट्टी,मिट्ठी करना उंगलियों की कचहरी में अब क्यों बचपन जैसी सुबह और शाम नहीं होती मस्ती,हुड़दंग,होंठों पर अल्हड़ मुस्कान नहीं होती । हमजोली संग मिल गुड्डे-गुड़ियों का व...

" विश्वव्यापी व्याधि पर कविता पर कविता "

" विश्वव्यापी व्याधि पर कविता " ऐसी विभीषिका से  वबाल मचाई हो कॅरोना कैसी विश्वव्यापी व्याधि तूँ दुसाध्य सांस लेना । किन गुनाहों की मिल रही सज़ा ज़िन्दगी को कि अब ज़िन्दगी ही दे रही दग़ा ज़िन्दगी को हवाएं भी खफ़ा हो ज़ुल्म ढा रहीं हैं सांसों पर  एवं ख़तरनाक हो क़हर ढा रहीं हैं आँखों पर । जाने कब तक चलेगा मौत का ये सिलसिला तुम्हारी बेग़ैरत करतूत से ज़िन्दगी को गिला दुनिया सहम गई है देख जनाज़ों का कारवां  शंकित शवों की संख्या से मरघट भी पशेमाँ । हो वैरी का जैविक वार या प्रकृति हुई ख़फ़ा कि महाप्रलय पे तुले धर्मराज कर रहे ज़फ़ा विस्मित हूँ सांसों के ,अकस्मात् थम जाने से सृष्टि बेबस निरूपाय उचित उपचार पाने से । जो किया कल के लिये संचय न काम आया कांपें स्वजन भी छूने से ऐसी अस्वस्थ काया कांधे भी मुनासिब नहीं बेसहारा सी मृत देह थरथराती देख रूह औषधालयों पे भी संदेह । लिपट कर भी ना रो पाएं ऐसे छटपटाते प्राण बेअसर उपाय सारे जो भी सभी ने किये त्राण चाँदी हो गई हरामख़ोरों की इस महामारी में ज़िन्दगी,धन से गये...

कोरोना की तीसरी लहर

कोरोना की तीसरी लहर  और कितना प्रकोप ढाओगी  कितनी वर्जनाएं लगाओगी कोहराम मचा है चारों ओर  तीसरी लहर का और है शोर , कितने घोंसले उजड़ गये  कितनों के सपने बिखर गये कितनों का संबल छीन लिया  कितनों को अदृश्य हो लील लिया , सारी कायनात लग रही है विरां  छेद रही मर्मभेदी करूणा है सीना उन्मुक्त हँसी अधरों से गायब  सब कुछ जैसे लग रहा अजायब , किस अमोघ अस्त्र से होगी पस्त  सारी दुनिया हो गई है तुमसे त्रस्त कौन सा दिव्यास्त्र चलाया जाये आतंकित,भयभीत सभी दिशाएं , फ़जाओं में पसरा गहरा सन्नाटा  थमा-थमा कोलाहल दे झन्नाटा आवागमन पर छाया घोर कुहासा भाग रहे सब जब कोई खांसा , निस्तेज हुई है कांति मुखों की ऐसा वज्र गिरा दु:खों की प्रगति पर विराम लगा दी सबका प्रवेश वर्जित करा दी , कितना बरतें एहतियात हम कितना सतर्क रहें बता हम किसकी कितनी सुनें सलाह क्या हालत हो गई या अल्लाह , जी मिचले कड़वा काढ़ा पी भाई नहीं होती कारगर कोई दवाई किसके सम्पर्क से रहें अछूत लगे ज़िन्दे इंसान भी कोई भूत , कैसा अज़ाब ढाई हो कोरोना ऊफनवा रही हो जाबा पहना दहशत से डरा-डरा है मन कि...