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" एक वेश्या का दर्द "

मैं जिस्म बेचती हूँ चन्द नोटों की खातिर नाचती कोठों पर हूँ चन्द नोटों की खातिर रातें रंगीन करने वाली मैं इक बेबस नायिका हँसके दर्द सहती वेश्या बन चन्द नोटों की खातिर । करती संगीन जुर्म चन्द नोटों की खातिर बदलती हर रात शौहर चन्द नोटों की खातिर नित नये ग्राहकों संग खेलती जिस्म निलाम कर   पोषती हूँ धंधा विरासत का चन्द नोटों की खातिर । घर टूटता है किसी का ग़र वजह से  मेरी जग लानत न दे नहीं होता सब गरज से मेरी रूह की भी सजाती शैय्या हाय जिस्म के बगल सफेदपोश कहते बदचलन खेल कर जहन से मेरी । जब्त अधरों की लाली में मुस्कुरा कर छलकते आँसूओं को पलकों तले ढाँपकर  मन की पावन वेदी पर करती जमीर का हवन पालती आजीविका कसबिन,पतुरिया के नाम पर । न कोई हमदर्द मेरा ना हमसफ़र कोई भूखे भेडियों के शौक की लजीज स्वाद हूँ सुलगते अरमानों पर हवश के जुटाती संसाधन  वहशत के बिस्तर पर लेटी जिन्दा सजीव लाश हूँ । मैं हूँ गम का ईलाज मैं ही दर्द की दवा कहते लोग अय्याशी का अड्डा कोठा मेरा बन  समाज का मुखौटा नाची पांव बाँध घुँघरू महफिलों के महानायक रखते नाम तवायफ म...

" संस्कारी पिता के दर्द को बयां करती रचना "

अंतर्जातीय विवाह करने वाली बेटी पर  संस्कारी पिता के दर्द को बयां करती रचना  नेह इक बाप का यूं ठुकरा कर तुम घर बसा ली  किसी बेग़ैरत  के संग तूं भी मेरी तरह हर-पल तड़पती रहे जी रहा जिस तरह मैं ज़िल्लत के संग । जिस बाग़ की थी नाज़ुक़ कली तूं कभी  फूल बनने तलक जिस आँचल में थी उसी आँचल का ईक-ईक रेशा उघाड़ कर गई नग्न खेली जिस आँगन में थी । डग भरने से लेकर  यौनावस्था तलक घर की इज्जत बनाकर रखा किस तरह तुम तो शोहरत की भूखी थीं पा वो गईं तोड़ सोने का पिंजरा उड़ीं किस तरह । ताक पर रख मर्यादाएं बड़बोली तुम   सहानुभूति की जो निबौरियां चुन रही धम्म से इक दिन गिरोगी महा ग़र्त में श्राप देती कलपती माँ सीना धुन रही । क्यूं लगीं अंकुशों की पांव में बेड़ियां तुम भी जानती तुम्हें सब बखूबी पता बैठ मंचों पर तूं घड़ियाली आँसू बहा सोच बदलो पापा,कहती करके ख़ता । आसमान भी जमीं से मिला क्या कभी चाँद सूरज को मिलते क्या देखा कभी पत्थरों पर कभी दूब  उगते देखा क्या कृत्य पे ऐसे जश्न मनते क्या ...

" भीषण जलावृष्टि पर कविता "

         भीषण जलावृष्टि पर कविता  अब तो लेले सन्यास कुढ़-कुढ़ इस क़दर बरस ना हिलस गये बूढ़े वरगद भी कुछ तो खाले तरस ना । बड़ी मुंहजोर हुई बरखा तटबन्ध तोड़ कर अपना जल आप्लावन चहुँओर विध्वंस हुआ सारा सपना सभी जलाशय उफन रहे हैं दरिया में उठा सैलाब बरबाद बुने ताने-बाने घटा अब तो छोड़ बिफरना । टूटे चौपायों के छप्पर घर हुए ज़र्जर ढहे धराशाई कुपोषण को दे गई न्योता प्रलयंकारी बाढ़ कसाई जिस मचान पे करते मस्ती उड़ाये सुग्गे औ बगुले तेरे विनाश में उजड़े घरौंदे लाड़ तेरा बड़ दुखदाई । घुसा चौहद्दी में पानी दूभर कीं किच-किच दालानें अनुष्ठान हुए थे वृष्टि लिए अब नभ से ओरहन ताने औषधि खालो घटाओं अजीर्ण की बवाल ना काटो कर दिया नगर-डगर जलमग्न छोड़ो कहर बरपाने । जाने किये कहाँ पंछी पलायन घुसा बसेरों में पानी उखड़ गईं शाखें वृक्षों की खोई अमराई की रवानी बाज आओ ना करो दुःखी ना करो ऐसी बदगुमानी सुनो भला नहीं भौकाल तेरा ना अति की मनमानी । नेस्तनाबूद हुए पुस्तैनी घर मरघट सी लगती बस्ती कहीं अतिव...

छोड़ दे रूठना बरस झमाझम

छोड़ दे रूठना बरस झमाझम  श्यामल-श्यामल मेघराज जरा शुभग श्याम पताका फहराओ मेघ लगाकर सूरमा मंडरा कर जिद्दी धूप पर नैना बान चलाओ । आग बबूला  हो उग्र प्रभाकर   हौले-हौले  आसमान से उतरे प्रचण्ड ताप  संग तप्त  हवाएं भरी दोपहरी  व्योम से बिफरे । बरसा कर  ज्वाला वर्चस्व का धमक चक्रवात का दिखलाए स्वेद निथारे आर्द्रता शरीर की जगती का कण-कण तड़पाए । आकुल धरती का मर्म ना जाने करती बिजली गिराकर घायल गर्मी का प्रकोप उत्पात मचाये छले पर्वत से टकराकर बादल । छप-छप कर के लुत्फ़  उठाएं कागज की नाव चला कर हर्षें चाय की चुस्की  गरम पकौड़ी खायें खूब झूम  घटा ग़र बरसे । किस विरह में डूबी कारी घटा क्यूं न रिमझिम फुहार बरसाए छोड़ दे रूठना बरस झमाझम नथुनों में सोंधी  ख़ुश्बू भर जाए । शुभग--सुन्दर                   शैल सिंह

" वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मेरी कलम से "

लहर-लहर लहराया है परचम भगवा का हिन्दुस्तान में हर्ष रहा चहुँओर केसरिया कंवल खिला है रेगिस्तान में हो मोदी,की चर्चा है सारे जहान में । सबका विकास साथ सबका है नारा इसी विश्व...

नई बहू का आगमन पर मेरी कविता

         नई बहू का आगमन  छोड़ी दहलीज़ बाबुल का आई घर मेरे बिठा पलकों पर रखूँगी तुझे अरमां मेरे । तुम्हारा अभिनंदन घर के इस चौबारे में फूल बन कर महकना भवन ओसारे में आँगन उजियारा हो चाँदनी जैसा तुमसे  पंछियों सा चहकना घर कानन हो जैसे । लो ये चाभी के गुच्छे संवारो घर अपना बस ये ही गुजारिश सबका मान रखना नया परिवार,परिवेश  नया  घर  यह सही रखना सामंजस्य यहाँ कुछ पराया नहीं । सबसे सौभाग्यशाली समझना खुद को तुम भी मूल्यमान हो है जताना मुझको पुत्रवधू कह पुकारूं तुुझे अन्याय होगा जोडूं माँ-बेटी सा रिश्ता   तो साम्य होगा । न कोई बंधन यहाँ न कुछ थोपना तुझपे करना इज्ज़त सबका बस कहना तुझसे  पल्लवित,पुष्पित हो चहचहाना तूं आँगने ताकि बाँट सकूं सुख-दुःख   मैं तेरे सामने । अक़्स देखना तुम मुझमें अपनी मातु का दूंगी खुशियां दुगुनी आँचल की छांंव का   कुछ सिखलाऊं,समझाऊं दूं मैं नसीहतें खुशी से स्वीकारना अनुभव की ये नेमतें । शताब्दी से प्रचलित नकार...

कहीं चाहत न खता बन जाए

कहीं चाहत न खता बन जाए   अँधेरे पूछते कौतूहल से   शमा  किसने जलाई है  पूनम के चाँद सा रौशन  कर रही मेरी तन्हाई हैं । शय्या के हर सलवट में  सुगन्ध   तेरी  समाई है अन्तर्मन जड़ चेतन में  जीवन्त तेरी परछाई है । हृदय के अनंत सागर में लहराते तुम लहरों सा दमकते कुमकुम जैसे हो दिवाकर  के किरणों सा । घायल हुई दीदार से तेरे  मन रहता मेरा अवश सा इंद्रजाल रूपी झील में तेरे खिला रहता रूप कंवल सा । जब भी करती हूँ कोशिश   लिख तेरा नाम मिटाने की लगती पेंग मारने प्रीत तेरी जब करूँ हठ तुझे भुलाने की । मन ही मन हूँ लगी पूजने चेष्टा की जबभी ये बताने की कहीं चाहत ख़ता न बन जाए डरा दीं आँखें जमाने की । मादक सी आँखों में मेरे  माज़ी बादल बन घुमड़ता है बेमौसम बारिश की तरह  टपाटप अनायास बरसता है । कैसे बहलाऊँ पगले मन को बावरा मन नहीं बहलता है इस क़दर बसा है तूं सांसों में  धड़कन बन धड़कता है । बेबस बहुत  मोहब्बत है  ...