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गजल रूपी कविता

ऐ मेरे ख़ुदा-- जब-जब दस्तक दीं उम्मीदों पर आहटें वज्र आकर गिरे तब-तब उन आहटों पर , घात बहुत सहीं मेरी मासूम चाहतें मग़र   दुआ दे मुहर लगा दी तूने मेरी चाहतों पर , अति विश्वासों ने छल मुझे आहत किया कृपा कर मरहम लगा दी तूने आहतों पर , हो गईं नाक़ाम साज़िशें मेरे क़ातिलों की  रब ना करना रहम इन ग़द्दार क़ातिलों पर , मुद्दतों बाद मिली आज मुझसे है मन्जिल  ऐ ख़ुदा करना करम बस मेरी इबादतों पर ।                                                             शैल सिंह

ग़ज़ल। " कैसे मच गई गदर हवाओं में "

कैसे  मच गई ग़ दर  हवाओं में   कैसे  मच गई ग़ दर  हवाओं में   महकी ख़ुश्बू जो थी चमन के लिए।  बिस्तर की सलवटों से  पूछिए गुजारी है रात किस  तरह शब-ए-हिज्राँ क्यूँ टपके शबनम जो तकिया नम हुआ है इस तरह, इक बार देख जाईए दिलक़श तन्हाईयों का मंज़र  बेआबरू सा कर दिये हैं उमड़ के यादों का समंदर, कैसे बहलाने छत पर जाऊं  ले ख़्वाबों का बवण्डर  कर देगी  और दिल को छलनी चाँदनी की गहनाईयों का खंजर,  बेक़रार  सब्र,अब्र सी आँखें  तमन्ना  बस दीदार की है अक्स उभरते हैं ख़यालों  में  सहना बेरूखी ना प्यार की है, कशमकश में  ढल ना जाए उम्र   छोड़िए नाराजगी है किस लिए    खाई कसम वफ़ा की क्यूँ हाथ थाम हर जनम के लिए, पट  खोला घूँघट का ज्यों कली ने मिले नयन  क्यूँ दो  इक वदन  के लिए  दिल में गाड़ बीज प्रीत का  छोड़ा तन्हा दहर में क्यूँ ग़म के लिए  कैसे  मच गई ग़दर  हवाओं में   महकी ख़ुश्बू जो...

" कमर कस लो कोई बाकी कसर ना रहे "

आँधियों का चट्टानों  पर असर नहीं होता हवाओं का जड़-तनों पर सफ़र नहीं होता चाहे जितनी चाल चल लें ये बागी दिशाएं हर एक टहनियां कहर  से हिला लें बलाएं सुगंध फैली ख़िज़ाँ में भी है जिस फूल की उस महक पर बलाओं का बसर नहीं होता । तपाकर अग्नि में निखारे हुए स्वर्ण जैसा गिन्नी,गिलट में असली चमक नहीं होता जौहरी होते ग़र सभी हीरे की परख लिए तो लहरों पर तूफ़ानों का डगर नहीं होता कमर कस लेना कोई बाकी कसर ना रहे भटके मुसाफ़िर का कोई शहर नहीं होता । ठोकरों ने जब स्वर्णिम अवसर है दिया तो बांट रहे हो ज़हन को क्यों हिस्सों में चमन सर्वोपरि बन्धु हमारे, तुम्हारे लिए सोचो कि हरदम सुन्दर पहर नहीं होता चलो,गूनें,मथें लें संकल्प सदा के लिए गद्दारों से घातक कोई जहर नहीं होता ।                                  शैल सिंह

महिला दिवस पर मेरी रचना

सदियों पुरानी तोड़ रूढ़ियां आजाद किया है खुद को, परम्पराओं की तोड़ बेड़ियां, कुशल सफर क्षितिज तक का दिखा दिया है जग को, देखो हमको अबला कहने वालों, सबल,सशक्त बना लिया है खुद को, रोक नहीं सकतीं हमको अब श्रृंगार की जंजीरें, देखो हर कालम में नारी की उभरती हुई सफल तस्वीरें आंचल में हमारे जन्नत है हम ममता की मूरत हैं हमसे ही है सृष्टि सारी रची हमने ये दुनिया खूबसूरत है।                 शैल सिंह

होली पर कविता--रोम-रोम हुए टेसू पलाश

होली पर कविता--रोम-रोम हुए टेसू पलाश  आया होली का त्यौहार बरसे रंगों की फुहार बहे ठगिनी बयार बड़े शान से फागुन बरसाए गुलाल आसमान से , ग्वालबाल संग सांवरे मधुर बांसुरी बजावें नाचे ग्वालिनें अलमस्त राधा बावरी हो गावें लेकर ढोलक,झांझ,मंजीरे चले पीकर भंग जमुना के तीरे करें विश्राम कदम  की छईंया जहाँ रंभाती गोकुल  की गईंया , अल्हड़ सी करते मौज मस्ती मचाते हुड़दंग हुरियारों की चली बस्ती-बस्ती,गली-गली  टोली रसिया गाते हुए यारों की , बैर,भाव,द्वेष भूला कर सब दूर मन के कर मलाल रंग-बिरंग प्रीत के रंगों से गालों मलें अबीर गुलाल , करें हास-परिहास सब  सखियां  गहि-गहि मारें ऊपर पिचकारी उन्मत्त,उमंगों में डूब भिगोतीं  चोली,अंगिया,अंग मतवारी , हुआ नगर-डगर सतरंगी गढ़-गढ़ का आलम   रक्ताभ मस्ती,रोमांच और उत्साह अभिभूत करे अल्हड़ अंदाज , बहका  मन  वैरागी फागुन  में  संयम के टूटे सारे प्रतिबन्ध रोम-रोम हुए टेसू पलाश जोड़ वसन्ती हवा संग अनुबंध  , कहें बुरा न मानो होली है बुढ़वे...

गुलजार हुआ है आंँगन

गुलजार हुआ है आंँगन  मेरी रौशन हुई है देहरी गुलजार हुआ है आंँगन खिला नन्हा सुकुमार सुकोमल इक फूल है घर के प्रांगण। कितना सुखद ये पल है लगे बेटी का लौटा शैशव है महके नवागंतुक से फुलवारी मिली सौगात हृदय को प्यारी। कानों में मिश्री घोलें  नन्हें की किलकारी मासूम से भोले मुखड़े की मुस्कान लगे अति न्यारी भींच लूं भर के अंक में अपने भरि-भरि नैन निहारी । मेरी रौशन हुई है देहरी गुलजार हुआ है आंँगन खिला नन्हा सुकुमार सुकोमल इक फूल है घर के प्रांगण।  नाना लेते मुन्ने की बलैंयां बलि-बलि जाऊं  मैं बलिहारी मामा मगन हो मंगल गाएं गूंज रही सोहर  से ओसारी नानी  बटुवा खोल उड़ावें गावें गोतिनें  मंगलचारी । मेरी रौशन हुई है देहरी गुलजार हुआ है आंँगन खिला नन्हा सुकुमार सुकोमल इक फूल है घर के प्रांगण । फूले न समाएं दादाजी झूमें अति प्रसन्न हो दादी  ताऊ-ताई बजवाएं बधाई झुलावें झूलना दोनों भाई नेग लुटायें फूफा पाहुने बुआ हुलसें कजरा  लगाई । मेरी रौशन हुई है देहरी गुलजार हुआ है आंँगन खिला नन्...

कविता--शहीद की विधवा की होली

शहीद की विधवा की होली देश लिए प्राण न्यौछावर कर  पिया खून की होली खेल गये , घाव लगी गम्भीर हृदय पर  कुदरत ने दी ऐसी पीर है कैसे सजे तन रंग फागुन का  हरे ताजे नयन के नीर हैं , चाव नहीं कोई भाव नहीं ना कोई खुशी रंगोत्सव की अभी सूखे नहीं आंचल गीले फाग फीके होली महोत्सव की , कैसे भाये साज होरी का बुझी नहीं राख अभी सजन की सबकी शुभ-शुभ होली होगी  मैं भई दुखिया जनम-जनम की , मांग हुई सूनी रोली बिन किन संग खेलूं होली उन बिन धूप अनुराग की चली गई ख़ुशी जीवन की छली गईं , किनके गाल गुलाल मलूं मैं  सुनसान लगे विरान घर हँसि,ठिठोली वो संग ले गये   दे वेदनाओं का दुःखान्त प्रहर।                         शैल सिंह