संदेश

दिल्ली,बाम्बे के रेप काण्ड और हालात पर 

दिल्ली,बाम्बे के रेप काण्ड और हालात पर           नारी जागृति के लिए  कर इतनी बुलंद आवाज कि घूंट अपमान का अंगार बरसाये सहनशक्ति सीमा तोड़ दे दुर्गा का विकराल अवतार अपनाये डरा बगावती मुहिम से, विभत्स व्यभिचार  वाकया ना दुहराये दूषित सोच का मिटे तमस,अस्तित्व की आ हम ज्योति जलायें  ऐसे कामान्ध पुरुषत्व पर धिक्कार जो काबू में ना रखा जाये किसी रक्षक का ऐसा हश्र हो दुबारा कभी सोचा ना ये जाये इतना क्षत-विक्षत करो अंग कि दुस्साहस तार-तार हो जाये बेमिसाल तस्वीर करो पेश ऐसी जग सारा शर्मसार हो जाये दिखा अंतर्द्वंद की वहशत ताकि दरिंदों को आगाज़ हो जाये  कि क्या हस्ती हमारी भी संसार में  अजूबा अन्दाज़ छा जाये, क्यूँ अग्नि परीक्षा दें हमीं क्यों चीरहरण हमारा हो सरे राह में हम अल्पवसना हों या पर्दानशीं या चलती अकेली हों राह में युवती,किशोरी,बालिका या प्रौढ़ा कहीं हों तनहा रात स्याह में कोई भी कौन होते है सीमाएं खींचने वाले हमारे हसीं चाह में ऐसा करो कि पाबन्द मीनारों की टूट...

भौतिकता की आँधी

भौतिकता की आँधी  हँसी अनमोल तोहफ़ा कुदरत का  हर शख्श हँसना,हँसाना भूल गया है  मौजूदा दौर ले जा रहा रसातल                        मशरूफ़ ज़िंदगी में हर कोई   कहकहा लगाना भूल गया है।  रफ़्तार ज़िन्दगी की तेज हो गई  दिल्लगी लब्ज ही भूल गए सब  जिंदादिल लोग नहीं मिलते अब  प्रेम,नेह की ऊष्मा उजास में भी  अजीब सा कुम्हलापन आ गया है।  हाथ -हाथ की शान बनी अब  हर हाथ में खेल रही मोबाईल  कर से कलम जुदा कर दी है  हर कान के पट इठला ठाठ से नाच-नाच कर झूल रही स्टाईल।   ख़त के सुन्दर भाव हजम कर  हर हर्फ़ निगल करती स्माईल  शह मात का खेल , खेल रही  कंप्यूटर की फटाफट अब तो  धड़ाधड़ देखो फाईल फर्टाईल।  भौतिकता की चकाचौंध में क्या  जीवन का फ़लसफा मालूम नहीं  दुरुस्त सेहत ,कामयाब राह की  मुकम्मल हमराज,ठहाका क्यों आज हर तबका ही भूल गय...

कृष्ण जन्माष्टमी पर मेरे द्वारा रचित भजन

          ''कृष्ण जन्माष्टमी पर मेरे द्वारा रचित कृष्ण भजन'' नन्द के दुलारे कबसे  खड़ी हूँ तिहारे दर पे , दर्शन को प्यासी अँखिया  तेरी मैं पुजारन रसिया--२  मीरा की भक्ति भर दो राधा की प्रेम पूजा , तुझमें रमा दूँ जीवन  भर दो ऐसा भाव भींगा ,  तम् सा अँधेरा मन में  ज्ञान का सवेरा भर दो , धनवान तुम तो लखिया  दर की मैं भिखारन रसिया --२ नन्द के दुलारे कबसे खड़ी हूँ तिहारे पे , दर्शन को प्यासी अँखिया तेरी मैं पुजारन रसिया--२ रास के रचईया स्वामी  तुम  अन्तर्यामी , भटकी हूँ पथ से अपने मैं हूँ खल कामी , मोह ,दंभ ,लोभ मिटा दो करुणा ,अनुराग जगा दो , पालनहार तुम तो लखिया  दर की मैं भिखारन रसिया --२  नन्द के दुलारे कबसे खड़ी हूँ तिहारे पे , दर्शन को प्यासी अँखिया तेरी मैं पुजारन रसिया--२                                           शैल सिंह ...

''गोल्डन पेन''

                              ''गोल्डन पेन''  होली का पर्व अब चार-पांच दिन ही रह गया है , इधर बेटे की बोर्ड परीक्षाएं भी चल रही हैं ,अति व्यस्तता के बावजूद भी सोचा होली के उपलक्ष्य में बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा ही करके घर की साफ सफाई शुरू कर दूँ ,इन पर्वों के चलते ही अन्दर तक की वार्षिक सफाई हो पाती है ,अन्यथा दैनिक दिनचर्या में तो इतना समय ही नहीं मिल पाता कि लीक से हटकर कुछ और किया जा सके ,और फिर गुझिया ,मठरी ,नमकीन भी तो बनाने हैं जिनको तैयार करने में अच्छी खासी कसरत और मशक्कत करनी पड़ती है। बच्चों की पढ़ाई ,स्कूल के झमेलों से कई बार बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती कि कोने अंतरों तक पहुँचा जा सके.       काफी सोच विचार के बाद सोचा क्यूँ ना आज का अभियान आलमारी से ही शुरू करूँ ,इधर बहुत दिनों से बाहर कहीं आना जाना नहीं हुआ था ,इसलिए आलमारी भी अधिकतर बन्द ही रही। आज जब सफाई के उद्देश्य से अस्त-व्यस्त पड़ी आलमारी को करीने से सुव्यवस...

''शरारती चाँद''

                  ''शरारती चाँद''         मुखड़ा  दिखावे  चाँद  बदरा की ओट से  लुका-छिपी करे ओढ़ी घटा की चदरिया ,      हमें कांहें तड़पावे तरसावे मुस्काई के       रही -रही टीस उठे जांईं जब सेजरिया , हमका रिझाई करे चन्द्रिका से  बतिया  अंखिया मिलावे कभी फेरी ले नज़रिया ,       देखि ई निराला प्रेम करवट कटे रतिया        लोचन से लोर ढुरे जईसे बरसे बदरिया , बलमा अनाड़ी नाहीं बूझे मोरे मन की  निंदिया बेसुध  सोवे तानी के चदरिया ,       हियरा के गूंढ़ बात अब कहीं  केकरा से       तनी अस केहू होत लेत हमरो ख़बरिया।  

एक निवेदन

''एक निवेदन'' ओ माटी के लाल  सात समुन्दर पार ना जाना   दूर देश परदेश में  ढेरों भरा ख़जाना अपनी  बोली भाषा वेश में।  चंद सुखों की खातिर छूटे  ये कुटुम्ब परिवार  शहर पराया अनजान नगर  छोड़ के ना जा ये घर बार।  हमजोली संग मनी रंगरेलियाँ  याद करो बचपन की गलियाँ  गाँव का मेला घर,चौबारा  दीया दीवाली फुलझड़ियाँ।  थाल सजा चन्दन औ रोली  हाथ बंधी रेशम की डोरी  नटखट बहना की प्यारी राखी  कहाँ मृदुल ममता की छाती।  कहाँ बजेगी पायल की रुनझुन  कहाँ सुनोगे चूड़ी की खनखन  चुनर में लिपटी लाज की लाली  कहाँ मिलेगी अनुपम दुल्हन।  होली का हुड़दंग ना होगा  ना झुला सावन की कजरी  रीति रिवाज त्यौहार ना कोई  ना व्यंजन पकवान कढ़ी।  ओ माटी के लाल  सात समुन्दर पार ना जाना दूर देश परदेश में ढेरों भरा ख़जाना अपनी बोली भाषा वेश में।           ...

ये नक़ाब

    ये नक़ाब चलती थी सडकों पे बेनक़ाब     हुस्न ने परदा गिरा दिया        जब याद जमाने ने मुझे           उम्र का दरजा दिला दिया। कैद कर लो हिज़ाब में     शोख अदाएं ये मस्त जवानी        कह -कह कर बुजुर्गों ने मेरे            जिस्म का जर्रा जला दिया। मुड़-मुड़ के देखते थे लोग      जिस गली से कूच करती थी          मेरी बेबसी का ऐ खुदा तूने              अंजाम ये कैसा सिला दिया। इस नालाकश में बताईये ज़नाब      मुस्कुराएँ तो भला हम कैसे          कहाँ से आई ये पागल शवाब             जो हमें परदानशीं बना दिया। रुख पे कैसा लगा ये रुव़ाब    किन अल्फ़ाज़ में कहूँ लोगों        इस बेकसूर हूर को बस           तसब्बुर का आईना बन...