संदेश

अमानत मेरी हो न हो चाहे

चला गया दहर में छोड़कर तन्हा मुझे इस तरह  कभी ना लौटकर आने वाला वो बेखबर बेतरह  कुछ निशां छोड़ गया है पास ऐसा बेतरतीब सा  भूला ना पाऊं चाहकर भी वो चीज बेनजीर सा । मेरी सांसों को महका जातीं तेरे प्यार की खु़श्बू  तेरी हर बात बहका जातीं मैं तेरे इश्क़ में बहकूं  जितनी बार धड़कें धड़कनें जितने श्वांस लेती हूॅं  उतनी बार आते याद तुम तेरी यादों में मैं चहकूं । मेरे ख़्वाबों में बसते हो मुक़द्दर में हो न हो चाहे  लकीरों में तुझे देखूं अमानत मेरी हो न हो चाहे  कश्मक़श में जीती रख तुझे नज़र के समंदर में  उल्फ़त है मुझे तुमसे तुझे इक़रार हो न हो चाहे । फा़सले मिटा नहीं पाये मुहब्बत को रूह से मेरी   रहती फ़िक्र शिद्दत से मुझे रह के भी दूर से तेरी बेपनाह मोहब्बत है नियति में लिखा जुदा होना  पता है बेबसी का क्या कहूॅं है इश्क़ की मजबूरी । बेतरह---असामान्य बेतरतीब---अव्यवस्थित बेनजीर--अनुपम, बेजोड़  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे

करती भला किससे मैं जुदाई का शिकवा  दिखाई अंजुमन में फिर रूबाई का जलवा । लिखने को थी तो बहुत सारी दास्तां मगर  चन्द लफ़्ज़ों की एक ग़ज़ल लिखकर मैंने  सुनाई जो महफ़िल में जोश भरे अंदाज़ में उनका अलहेदा ग़ज़ल पे लहज़ा देखा मैंने । नज़्मों का पैमाना छलकना था बाकी अभी  हो गये बज़्म से ओझल झट नजरें चुराकर  हिज़्र की रात का दर्द था शायरी में पिरोया बिन सुने हुये रुख़्सत सारी फ़िक्रें भुलाकर । सदियों की जुदाई तो दिया उन्हीं ने आखिर  वक्त तन्हा गुजारते क्यों मयखाने में‌ जाकर  गुजर रही ज़िन्दगी बिना उन एक-एक दिन  करते परेशां क्यों मुझे मेरे ख़्वाबों में आकर । बिछड़ने का तहज़ीब भी तो ना आया उन्हें  जुदाई का दर्द बयां करती चेहरे की उदासी ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे,यकीन तोड़ा उन्होंने सुकुन छीना मैंने दिन-रात की । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी

    छंटे मन की उदासी सजे मधुर कल्पना      नव वर्ष में हों साकार कुल मनोकामना      गूंजे दिशाओं में मस्त अमन की बांसुरी      स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी । स्वर्णिम,उज्वल,सुखद हो हम सबका भविष्य  उमंग तरंग भरा नये वर्ष का अनोखा हो दृश्य  मन के मतभेद मिटा भाईचारा सद्भाव बढ़ाना  नव संवत्सर उम्मीदों की नवकिरण बिखराना । नई ताज़गी के साथ शुरुआत हो नये साल की‌   खूबसूरत हो ज़िंदगी का हर पल नये साल की  न कोई मायूस रहे ना चेहरे पे किसी के उदासी  गुजरे वर्ष तुझे अलविदा मुबारक नये साल की । दुआ है सफ़र हो सुहाना सलामत रहें सब लोग  प्रेम सौहार्द बांटते हॅंसते मुस्कुराते रहें सब लोग  हर ख़्वाहिशें हों पूरी मिले कामयाबी हर क्षेत्र में  खुशियां ही खुशियां हो नमी ना हो किसी नेत्र में । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

अधुरा प्रेम

तुम संग रेखाओं में परिणय लिखा या नहीं  ये पता तो नहीं था मन से मन के मिलन में  कितने सपने सलोने संजोए हमारे नयन थे  संबंध स्वाहा हुआ ग्रह कुण्डली के हवन में ।  पीकर अश्रुओं को रश्मों के दस्तूर निभाना  मेंहदी किसी के नाम की मौन साधे रचाना  निर्जीव देह की भीत हल्दी चंदन लगवाना  कितनी त्रासदी से गुजरी किसी ने न जाना । कहीं रूसवा ना हो प्रेम पावन मेरा तुम्हारा  प्रतिष्ठा मान की दुहाई हृदय असहाय हारा  श्रृंगार तन पे सजा मन की देहरी सूनी रही  बेगाना आलम ना जाना तड़पती रोती रही ।  मजबूरियों की शिला पर लिख रही दास्तां  विवशताओं की बेड़ियां जकड़ी रहीं रास्ता  रो उठा आईना भी देख नैनों में चेहरा तेरा  कैद पिंजड़े में फड़फड़ाता रहा परिंदा तेरा । की हजारों जतन कोई युक्ति आई ना काम  तमन्ना थी मिलन की पर वह आई ना शाम  कितने संदेश भेजे पाती लिख भेजी तमाम  पाती आई तो बहुत कोई मेरे आई ना नाम । एक अजनबी के संग बंधी डोर ज़िंदगी की  ना ही तेरी ना मुक़म्मल हो सकी किसी की  कर सकी अवज्ञा न लड़ सकी चुनौतियों से  ...

नव वर्ष पर शुभकामनाएं

मह-मह महके फूलों सी जीवन की बाग सर्वदा  खुशियों का अनमोल उपहार नव वर्ष ले आना  रहें हम सब जीवन भर सुखमय खुशहाल सदा  सौगातों का अंबार नव वर्ष आंजुरी भर लुटाना । गुजरा साल पुराना,नूतन साल तेरा अभिनन्दन  खट्टी-मीठी यादों संग करें गुजरे साल को वंदन  नई किरण नये उम्मीदों संग करते सत्कार तेरा  जोशो,उल्लास से स्वागत करते नया साल तेरा । किस्मत के ताले खोल गुलशन में फूल खिलाना नई चेतना नई स्फूर्ति भर दशों दिशाएं महकाना मन में संजोए सपने अंतर में छिपी अभिलाषाएं  तेरे मार्गदर्शन में फलीभूत हों देना शुभकामनाएं । नव वर्ष का ऐसा हो शुभारंभ देश का हो उत्थान  मानवता का कल्याण हो पूर्ण सबके हों अरमान  निर्भयता का चमन रहे हर्षित हो सबका अंतर्मन  कण-कण मुस्काए बसुधा चतुर्दिक शान्ति अमन । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

गीत कविता

राह तकते कटे दिन रैन  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया जब भी मेरी बस्ती से गुजरा कोई राही दौड़ झांकती झरोखा दिखते तुम नाहीं बीते लमहों को याद कर रोईं बहुत ॳॅंखिया तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । मुरझा गया मनमोहक जूड़े का गजरा बह गया ऑंसू़ संग आंखों का कजरा  गालों की सुर्खी पर खींची रेखा कारी रंगिया तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । थाल फूलों से सजाया अगवानी को तेरे मेंहदी हाथों में महावर पांव नाम का तेरे  पिया किससे कहूं कैसे हिया की गूढ़ बतिया  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । पता ना ठिकाना दिये लिखूं कैसे पतिया आवन को कह गये निकली झूठी बतिया बीते करवट बदलते रातें भींग जाती तकिया  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

निस्पंद से पड़े

हे कर्णधार साईं नाव मंझधार पार लगा दो दीन,हीन,मलीन पे महिमा बरसा अपार दो । कितनी कीं याचनायें सरकार तेरे दरबार में  कभी प्रार्थनाओं का तुझपर असर ना हुआ क्या कमी थी प्रभु भक्ति,भाव,अर्चनाओं में  के मेरी वेदनाओं का तुझको खबर ना हुआ । दिन रात तेरे अक्स को उतार कल्पनाओं में  पूजती रही मन ही मन शाश्वत भावनाओं में  तुम पूजा ना सके साध ज़िन्दगी की एक भी  क्या कमी रही बताओ ना मेरी साधनाओं में । सुधि लोगे कब स्वामी कब बरसाओगे कृपा  सर्वव्यापी भगवन हरोगे कब पीर,कष्ट,व्यथा कर दो प्रभामंडल से अपने संतृप्त चित्त प्रभु कब प्रसन्न हो बहाओगे संभावनाओं की दया । क्या करें तुझको अर्पण करूं कैसे स्तुति तेरी  निस्पंद से पड़े ना सुनते क्यों कोई अर्जी मेरी  तुम्हीं सृष्टि के रचयिता तुम भाग्य के विधाता  तुम ही सर्वशक्तिमान चाहे जो करो मर्ज़ी तेरी । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित