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निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी

तुम्हें हमदर्द समझे मगर ख़ुदग़र्ज़ निकले तुम  मेरे एतबार से छल कर बड़े बेदर्द निकले तुम । क्यूं दिल के दुर्ग के द्वार पे डट संतरी बनकर  खड़े रहते हो तुम दिन रात सिपाही की तरह  करते रहते हो प्रतिदिन नासूरों को तरोताजा  गरज क्या तनहाई में सेंध लगाने की बेवजह । तन्हाई की बस्ती में ख़ामोशी से लगा दरबार  एकाकी सीख ली मैंने जीने की कलाएँ सारी  ख़्यालों के रंगमंच पे सजा हर रोज़ महफ़िल  निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी । कितनी मिन्नतें की कितनी दी दुहाई वफ़ा की  कौन ज़िन्दगी में आ गया जो मुझपे जफ़ा की  गिला है यही दूर चले जाते रोकती नहीं मैं पर  किसी खलनायिका लिए कहना मैं बेवफ़ा थी । एकाकी—अकेले  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे

दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को  ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे  कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुम्हीं को  सिरफिरा इस क़दर याद में बनाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । भले ही रह गयी हो अधूरी मेरी चाहत मगर  तूं दूर रह कर भी है पास मेरे हर वक़्त मगर  अधूरा रह कर भी रिश्ता ये खतम हुआ नहीं दिल को देते सुकूं ढेरों यादों के दरख़्त मगर  मन के मुँडेरों पर चाँद बन के आया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । कितना समझाते हैं दिल को भूल जाये तुझे तुम मेरी क़िस्मत में थे नहीं बतलाये भी उसे उसने नई दुनिया बसा ली कहा कितनी बार  कहता बढ़ती जाये याद कैसे भूल जायें उसे  अतीत की वादियों में मन भटकाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने

इस क़दर जिसको चाहा उसकी मुस्कान की खातिर । हर दर्द ख़ुशी से अपना ली उसकी ख़ुशी की खातिर ।। खोई रही सदा जिसके ख़यालों में ख़ुद को भुलाकर । बदल गया वो गुजरते वक्त के साथ मुझको भुलाकर ।। ना अपना बनाया न रहने दिया किसी के क़ाबिल ही । नफ़रत भी नहीं न रखा हासिल करने के क़ाबिल ही ।। जाने कितना लगेगा वक्त उसे भुलाने की कोशिश में । गंवा रही ज़िन्दगी व्यर्थ दिल बहलाने की कोशिश में ।। हम हम ना रहे दर्द इतना सहा मसखरी में ज़िंदगी ने । जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने ।। बहुत रोये थे बिछड़ते वक़्त फैसला आसान नहीं था । फासले का ग़म बहुत जुदाई ऐसे होगी भान नहीं था ।। गज़ब का कलाकार निकला वो अपनापन दिखाकर । बर्बाद किया जिन्दगी ख़्वाबों के सब्ज़बाग दिखाकर ।। ज़िंदगी भर की चुभन खुशी को तरसती रही उम्रभर । आखिरी सांस तक किया इंतज़ार आंखों में अब्र भर ।। अब्र-- बादल,घटा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं

इतनी चुप और ख़ामोश क्यों हूँ कैसे बताऊं  दिल के टूटने की आवाज़ किसको दिखाऊं  हंसी की वजह जो थे हो गए किसी और के  वो खुश है भींगी ऑंखें मेरी क्यों कैसे बताऊं निज को खो दिया जिसको पाने की खातिर  वही निकला बेवफ़ा दिल को कैसे समझाऊं । खुली ऑंखों में पले ख़्वाब परिहास करते हैं  होंठों पर मुस्कान का लिबास डाले फिरते हैं  कौन समझे मुस्कुराहटों में छिपे दर्द का मर्म  तुम नहीं साथ मगर एहसास  लिए फिरते हैं  बेइंतहा दीवानगी की मिली ये सजा वफ़ा में  जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं । कितने बेखबर तुम हो मेरे दिल के तूफ़ान से  फासले कर लिये मिल के किसी अनजान से  किस दौलतमंद ने खरीद लिया है ज़मीर तेरा  नासमझ जान भी न पाई मैं क्या तदबीर तेरा जबसे तेरी याद में मैंने भी तड़पना क्या छोड़ा तबसे इस बेवकूफ़ दिल ने धड़कना ही छोड़ा । तदबीर--योजना, युक्ति  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं

मेरा दर्द नज़र ना आए किसी को  मुस्कान अधरों पे बिछाये रखती हूॅं । दिल रोये असर ना दिखे किसी को  आनन पर सिंगार सजाये रखती हूॅं । जो आंखों में भरा है पानी लबालब   कहीं छलक पड़े ना दबाये रखती हूं । शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं   ख़ुद को दृढ़ सशक्त बनाये रखती हूॅं । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

लब पे हर वक्त नाम तेरा दिल में बसी तस्वीर तेरी

जो बिन बोले कीं गुफ्त़गू ऑंखों से ऑंखों ने सनम और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है । जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम  आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गए सनम जमाना कहता दीवानों सा मेरा अंदाज़ हो गया है । लग जायेगी नज़र होगी जब ख़बर जहां को सनम  अब तो दिल भी तेरे इश्क़ का मोहताज हो गया है  इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम  मचल उठी लब पे ग़ज़ल मस्ताना साज़ हो गया है । तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम  बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है  दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम  उड़ने लगी हवा में मैं जबसे तूं सरताज हो गया है । जबसे मिले तुम संवर गई दुनिया निखर गये दिन  लगे धड़कनों की आवाज भी अल्फाज़ हो गया है  हर वक्त लब पे तेरा नाम दिल में बसी तस्वीर तेरी  लगन तुमसे जो लगाई ख़ुदा भी नाराज़ हो गया है । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित 

कुछ शेर

जब भी कुछ छिपाती हूँ लोग कयास लगा लेते हैं  मुस्कुराहट की वजह क्या है अन्दाज़ लगा लेते हैं  काश तुम भी समझ लेते जज़्बात लोगों की तरह  लोग तो अनायास ख़्वाबों की बारात सजा देते हैं ।  शैल सिंह  मुझे कहना नहीं आया समझना तुम नहीं चाहे  कहीं कश्मक़श में दिल धड़कना भूल ना जाए  ना जाने कैसा रिश्ता जुड़ बैठा तुमसे अटूट सा  डर जग से कहीं ना उल्फ़त का राज खुल जाए ‌। शैल सिंह  जबसे ऑंखों में तेरा ख़्वाब सजाने लगी हूँ  जमाना पूछे किसे ऑंखों में बसाने लगी हूँ  ऑंखों में रहते तुम नज़र न लग जाये कहीं  आजकल ऑंखों में काजल लगाने लगी हूँ । शैल सिंह  तुम्हारे ऑंखों की खूबसूरती ने इश्क़ का पाठ पढ़ा दिया  मैं तो वाक़िफ भी ना थी मुहब्बत क्या अल्फ़ाज होता है  ख़ामोशी से अफ़साना तूने धड़कनों को बेधड़क सुनाया  दिल हर लिया इल्म़ नहीं क्या,ऑंखों में जज़्बात होता है । शैल सिंह  किस क़दर बेवफ़ा तूने वार किया दिल पर मुस्कुरा कर  कुचल डाले सारे अरमां किसी गैर की बांहों में समाकर  मैंने तो सब कुछ समर्पित कर दिया वफ़ा की उम्म...