अमानत मेरी हो न हो चाहे
चला गया दहर में छोड़कर तन्हा मुझे इस तरह कभी ना लौटकर आने वाला वो बेखबर बेतरह कुछ निशां छोड़ गया है पास ऐसा बेतरतीब सा भूला ना पाऊं चाहकर भी वो चीज बेनजीर सा । मेरी सांसों को महका जातीं तेरे प्यार की खु़श्बू तेरी हर बात बहका जातीं मैं तेरे इश्क़ में बहकूं जितनी बार धड़कें धड़कनें जितने श्वांस लेती हूॅं उतनी बार आते याद तुम तेरी यादों में मैं चहकूं । मेरे ख़्वाबों में बसते हो मुक़द्दर में हो न हो चाहे लकीरों में तुझे देखूं अमानत मेरी हो न हो चाहे कश्मक़श में जीती रख तुझे नज़र के समंदर में उल्फ़त है मुझे तुमसे तुझे इक़रार हो न हो चाहे । फा़सले मिटा नहीं पाये मुहब्बत को रूह से मेरी रहती फ़िक्र शिद्दत से मुझे रह के भी दूर से तेरी बेपनाह मोहब्बत है नियति में लिखा जुदा होना पता है बेबसी का क्या कहूॅं है इश्क़ की मजबूरी । बेतरह---असामान्य बेतरतीब---अव्यवस्थित बेनजीर--अनुपम, बेजोड़ शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित