संदेश

बेटियों की महत्ता पर कविता

बेटियों की महत्ता पर कविता '' '' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम '' हम वो फूल हैं जो महका दें अकेले पूरे चमन को ,हम वो दीप हैं जो रोशनी से भर दें अकेले पूरे भवन को, हम वो समंदर हैं जो तृप्त कर दें सारे संसार को, और समेट भी लें अपने आगोश में सारी कायनात को, हम चाहें तो स्वर्ग उतार लाएं आसमान से । गर हम बेटियां ना होतीं विपुल संसार नहीं होता गर ये बेटियां ना होतीं ललित घर-बार नहीं होता गर बेटियां ना होतीं भुवन पर अवतार नहीं होता गर हम बेटियां ना होतीं रिश्ते-परिवार नहीं होता । हमने तोड़ के सारे बन्धन अपनी जमीं तलाशा है दृढ़ इरादों के पैनी धार से अपना हुनर तराशा है हमने फहरा दिया अंतरिक्ष में अस्तित्व का झंडा सूरज के शहर डालें बसेरा मन की अभिलाषा है । झिझक,संकोच शर्म के बेड़ियों की तोड़ सीमाएं हौसले को पंख लगा निडर उड़ने को मिल जाएं सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम बदल जग सोच का पर्दा हमारी शक्ति आजमाए । मूर्ख से कालिदास बने ...

" कोहिनूरों से भी कीमती अनमोल हैं यादें "

" कोहिनूरों से भी कीमती अनमोल हैं यादें " शबनम हुई है शोला दिल में छुपाऊं कैसे चन्द लफ़्ज़ों में दास्तां इतनी सुनाऊं कैसे हो गये पुराने ग़म जवां देख उसे बज़्म में  ग़ज़ल सामने उस बुत के गुनगुनाऊं कैसे । ये इक आईना है जो लिखी है मैंने ग़ज़ल हो गईं आँखें सुनने वालों की ऐसे सजल शिकवा,गिला करना मुनासिब ना समझा  पिरो दर्द दिल का  गुनगुना दी मैंने ग़ज़ल । कुछ अल्फ़ाजों में बयां कर पाती हूँ सुकूं कुछ क़ागजों पर लिख कर पाती हूँ सुकूं कुछ परछाईयां रखी बसा दिल,आँखों में  कुछ धड़कन,सांसों में छुपा पाती हूँ सुकूं । कैसे कर दूं आजाद यादों को आगोश से बंद मन की तिजोरी में हैं जो ख़ामोश से कोहिनूरों से भी कीमती अनमोल हैं यादें क्यूँ हर्फ़ों तुम भड़क जाते हो आक्रोश से । सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह

" सारी-सारी शब अपनी याद में जगाते रहे "

सारी-सारी शब अपनी याद में जगाते रहे आती हर बात याद डंसती बैरिन सी रात प्यासे रह गये जज़्बात ऐसी हुई हिमपात । मेरे आँसुओं का कतरा वो दरिया जानके    प्यास बुझा चला गया  मुशाफिर की तरह न परखा उदासी न समझा दर्द अश्क़ का बेपरवाह दिल-ए-ग़म से राहग़ीर की तरह । सोचती क्यूं बहे देख उसे अश्रु ये फ़िज़ूल   ढले अनमोल अश्क़ क्यूं इश्क़ में फ़िज़ूल भान होता न था वो कभी मुझ पर निशार  बहने ना देती सब्र तोड़ आँखों से फ़िज़ूल । वो आँखों को हसीं ख़्वाब बस दिखाते रहे सारी-सारी शब अपनी याद में जगाते रहे जो काजल लगाती आँखों में बड़े शौक से वे चित्र आरिज़ों पे स्याह रंग के बनाते रहे । लब से छेड़ती तरन्नुम है भर आती आँख लब पर खेलती तबस्सुम ढल जाती आँस तरन्नुम और तबस्सुम करें  बज़्में गुलज़ार  नादां ख़ुद को बेज़ार किये गातीं एहसास । आरिज़--गाल

" बड़े जिद्दी ख़्वाब तेरे "

इस तरह ना हर रात मेरे ख़्वाबों में आया करो कि बिखर जायें आँखें खुलते किरचों की तरह । सोचों की डगर पर मेरी तुम बन कर हमसफर आ जाते जाती जहाँ कहीं मुस्कुराते हुए नज़र बेहिसाब सलीके से  सताने का नायाब तरीका जाने सीखते कहाँ से आँखों में समाने का हुनर । महज खूबसूरत ख़्वाब बन न पलकों पे छाओ थम जातीं धड़कनें न शोर सिरहानों पे मचाओ सोने की करूं कोशिशें जब करें करवटें बखेड़ा बड़े जिद्दी ख़्वाब तेरे रतजगा में हो जाये सवेरा । दीदार की ख़्वाहिशों का भी है अजीब सा नशा मिले फुर्सत कभी तो देख जाना आ कैसी दशा क्या तेरी आँखों में मेरे ख़्वाब आ पूछते सवाल तुम्हें भी हैं याद क्या वो शामें सलोनी कहकशाँ ।      नज़रों का मिलना और मुस्कुराना ज़ुर्म हो गया कशिश नज़रों में गजब ईश़्क का इल़्म हो गया इक अजनवी चेहरा ने किया हृदय ऐसा घायल कि भ्रमजाल में नज़रों के ख़ुद पे ज़ुल्म हो गया । कहकशाँ--आकाश में तारों का समूह सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह

" मिज़ाज पूछा होता बिमारे दिल का "

भले तुम मिटा दो हर जगह से नाम मेरा मिटा न पाओगे लिखा दिल पे नाम मेरा । ख़फ़ा होने की भी वजह ना बताया ना आँखों से कहा कुछ न लबों से सुनाया  इक तेरा चेहरा बसा रखा निग़ाहों में ना होने देता तनहा सजा रखा ख़यालों में , यों मोहब्बत की खुश्बू तन्हाई में भी कराती तेरा एहसास रूसवाई में भी । कहीं रूठकर भी न जाना दूर हमसे चाहत की ज़िंदगी चार दिन की कसम से मिज़ाज पूछा होता बिमारे दिल का पता बहुत आसां था दिल के क़ातिल का , देखा ना तरसे नैनों की सदाक़त मेरी हँसके मुँह फेर लेना देख हालत मेरी । व्यथा की ईबारत सूरत से पढ़ लेना दिखा ना सकूं जिसे अनदेखा न कर देना  ख़्वाब क्यों दिखाया माहताब जैसा करके बावला मुहब्बत में आफ़ताब जैसा । दर्द दिल का देखकर परेशां ज़िग़र है सरापा से ग़म के बस तूंही बेख़बर है । सरापे--नख-शिख सहित सदाक़त--सच्चाई,सत्यता सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह

" खड़ी तूफां से लड़कर साहिल पे योद्वा की तरह "

बड़े गुमान से उड़ान मेरी,विद्वेषी लोग आंके थे ढहा सके ना शतरंज के बिसात बुलंद से ईरादे  ध्येय ने बदल दिया मुक़द्दर संघर्ष की स्याही से कद अंबर का झुका दिया मैंने हौसलों के आगे । प्रयास दोहराने में हो लीं साहस विफलतायें भी    विस्तृत भरोसों ने खींचीं कल्पनाओं की रंगोली असम्भव सी मिली जागीर जो है आज हाथों में बन्द अप्रत्याशित प्रतिफल से निंदकों की बोली । कंटीली झाड़ियों,वीहड़ रास्तों पे चलकर अथक बाधाओं को पराजित कर जीता जड़कर शतक खड़ी तूफां से लड़कर साहिल पे योद्वा की तरह ग़र लहरें करतीं अस्थिर कैसे पाते डरकर सदफ़ । पड़ाव ज़िंदगी में आया कितना उतार,चढ़ाव का  खा-खा कर ठोकरें भी हम नायाब हीरा बन गये बहुत लोगों को परखी ज़िंदगी दे देकर इम्तिहान लोग समझे दौर खत्म मेरा देखो माहिरा बन गये । सदफ़--मोती ,  माहिरा--प्रतिभाशाली  सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह

" सफलता पर कविता "

सफलता पर कविता मेरे अपनों ने की ना कभी कद्र हुनर की  सब समझते रहे कतरा मैंने इसके वास्ते विस्तार समंदर सा था जबकि मुझमें भी  बह दरिया की तरह बना लिए मैंने रास्ते । आसमान छूना इतना आसां ना था मग़र दिशा गंतव्य को देना शिद्दत से अड़ गये जूझा संघर्षों से अकेले कोई ना साथ था सार्थकता में जाने कितने रिश्ते जुड़ गये । मंजर जो हौसलों का तरकश दिखाया है ऐ परिहास करने वालों देखो अंत हमारा  कोशिशों के तीर से मैदान में उम्मीदों के बाँधे जीत का सेहरा रच वृतान्त सुनहरा । भटकती अभिलाषाएं भी उत्साह बढ़ाईं मन का विश्वास,साहस फौलादी हो गया  दीयों की तरह जल-जल हर रात तपी मैं हर्ष दहलीज मेरी चूमा जज्बाती हो गया । कतरा--बूंद,  सार्थकता--सफलता, वृतान्त--इतिहास,   हर्ष--खुशी सर्वाधिकार सुरक्षित शैल सिंह