मंगलवार, 15 सितंबर 2020

" मिज़ाज पूछा होता बिमारे दिल का "

भले तुम मिटा दो हर जगह से नाम मेरा
मिटा न पाओगे लिखा दिल पे नाम मेरा ।

ख़फ़ा होने की भी वजह ना बताया
ना आँखों से कहा कुछ न लबों से सुनाया 
इक तेरा चेहरा बसा रखा निग़ाहों में
ना होने देता तनहा सजा रखा ख़यालों में ,

यों मोहब्बत की खुश्बू तन्हाई में भी
कराती तेरा एहसास रूसवाई में भी ।

कहीं रूठकर भी न जाना दूर हमसे
चाहत की ज़िंदगी चार दिन की कसम से
मिज़ाज पूछा होता बिमारे दिल का
पता बहुत आसां था दिल के क़ातिल का ,

देखा ना तरसे नैनों की सदाक़त मेरी
हँसके मुँह फेर लेना देख हालत मेरी ।

व्यथा की ईबारत सूरत से पढ़ लेना
दिखा ना सकूं जिसे अनदेखा न कर देना 
ख़्वाब क्यों दिखाया माहताब जैसा
करके बावला मुहब्बत में आफ़ताब जैसा ।

दर्द दिल का देखकर परेशां ज़िग़र है
सरापा से ग़म के बस तूंही बेख़बर है ।

सरापे--नख-शिख सहित
सदाक़त--सच्चाई,सत्यता
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत आभार आपका दिग्विजय जी जो सांध्य दैनिक मुखरित मौन में मेरी रचना शामिल किया धन्यवाद

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  2. बहुत बहुत आभार आपका दिग्विजय जी सांध्य दैनिक मुखरित मौन में मेरी रचना शामिल करने के लिए ,एक बार पुनः धन्यवाद

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