संदेश

" जपूं मैं शिव का नाम "

आज महाशिवरात्रि का पावन दिन उमड़ी भक्तों की भीड़ देवालय में हर-हर महादेव का तुमुल उद्घोष गूंज रहा है सभी शिवालय में , कर में त्रिशूल हैं धारे शिव गले सर्प की माला तन पर भष्म रमाये कण्ठ में विष का प्याला , जटा में गंगा की धारा नंदी की करें सवारी बड़े कृपालु शिव भोले कहलाते त्रिनेत्र त्रिपुरारी , मन बसे शिव शंकर भोला मन ही मेरा शिवाला भक्ति में उनके लीन सदा वही जीवन में भरें उजाला , क्षीर,बेर,बेलपत्र,धतूरा आह्लादित पी भंग की हाला कैलाश गिरि पे डाले बसेरा ताण्डव करें पेन्ह मृगछाला , घोर हलाहल विष पीकर शिव नीलकंठ कहलाए  सोहे गले मुण्ड की माला   शिव औघड़दानी कहलाए , जब-जब संकट मंडराए घेरें बुरी बला के साये कालों के काल महाकाल पल में सारे कष्ट मिटायें , बसे रोम-रोम में शिव मेरे जपूं मैं शिव का नाम स्तुति करने से ही मात्र बन जाते सब बिगड़े काम । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह

" वसंत पंचमी " पर कविता

" वसंत पंचमी " पर कविता आओ वसंत पंचमी पर्व मनायें प्रकृति ने ली अंगड़ाई है  वासंती परिधान का जलवा चहुं ओर खिली तरुणाई है।   मन रंगा वसंती रंग में  और रंग गई सगरी जहनियां झूर-झूर बहे मलयज का झोंका ऋतुराज करें अगुवनियां ,मन रंगा  .... | चन्दा लुक-छुप करे शरारत  ओट से चकोर निहारे चंदनियां मधुऋतु की शुभ्र सुहावन बेला   बेली,पल्लव ताने पुष्प कमनियां ,मन रंगा  ... | पपिहा,कोयल,बुलबुल चहकें  रून-झून नाचे मोर-मोरनियां नवल सिंगार कर प्रकृति विहँसे  वन भरें कुलाँचे हिरनियां ,मन रंगा  ….|  महुवा मद में रस से लथपथ  अमुवा मऊर बऊरनियां  निमिया फूल के गहबर झहरे  हरियर पात झकोरे जमुनियां ,मन रंगा  ....| हरषें बेला,चमेली,चंपा  भ्रमरे गुन-गुन गायें रागिनियां  पीत वसन पेन्हि ग़दर मचाये  सरसों चढ़ी बिंदास जवनियां ,मन रंगा  ....|  ठसक से आये वसंती पाहुन  सतरंगी ओढ़ी ओढ़नियां  पतझर सावन सा मुस्काया  पिक बोले पुलकित कू-कू वनियां ,मन रंगा  ....|  टेसू,केसू,ढाक पल्लवित पलास  रूप...

" कब होगा आँगना में आगमन तुम्हारा "

कुम्हला गए ताजे पुहुपों के वंदनवार पथरा गये नैना खंजन करके इंतज़ार बीते दिवस कित बीति जाये कित रैन चली गईं जाने कित आ आकर बहार , मुरझा गया कुन्तल केश सजा गजरा विरक्त लगे चन्द्रमुखी चक्षु का कजरा लुप्त हो गई लाली रक्तिम कपोल की अविरल वर्षे नेत्र भींजे कंचुकी अंचरा , संभाला ना जाये धड़कनों का आवेग आएगी मिलन की कब रुत का उद्वेग कब होगा आँगना में आगमन तुम्हारा   सहा जाये ना भावाकुल उर का संवेग , पलकों पे छाई रहती याद की ख़ुमारी छवि अंत:करण बसी अनुपम तुम्हारी गुनगुनाते,मंडराते अलि जैसे रात-दिन ताड़ प्रीत की ख़ूब उत्कंठा तुम हमारी , अनकहे भाव अलंकृत शब्दों से करके  रचनाओं में सृजित करूं मर्म विरह के अन्तर्मन की पीर संग्रह गीतों में करके गुनगुनाया करती नीर दो दृगों में भरके , करती स्वर रागिनी से कलह असावरी अवसादों से भरी काटूं विरह विभावरी कर ख़ुद से हुज्जत जुन्हाई भरी रैन में अपलक निहारूँ चाँद,जैसे कोई बावरी , अविलंब हरषा जा उतप्त हृदय आकर  सर्दी के घाम सी नेहवृष्टि कर आस पर सन्निपात व्याधि जैसी रूग्ण काया हुई कल्पना के उड़ती उन्मुक्त आकाश पर । आसावरी-...

" वसन्त ऋतु पर कविता "

'' वसन्त ऋतु पर कविता " शरद ऋतु  की कर विदाई  ऋतुराज अतिथि गृह आये पतझड़  को  नवजीवन  दे मुरझाये प्रकृति संग हर्षाये , ऋतुपति हैं ऋतुओं के राजा  इनकी शोभा अतीव निराली अनुपम सौंदर्य  से परिपूरित बिखेरें दिग्-दिगन्त् हरियाली , मधुमाती  गंध  से वातावरण  मह-मह माधव  ने  महकाया  वसुन्धरा  पर  मुक्त पाणि से अगणित अपूर्व नेह बरसाया , अम्बर ने  मादक  रंग बिखेरा छवि विभावरी करे सम्मोहित  कली  जूही  की  प्रियतम  के बंध आलिंगन  हुई आलोड़ित , मधुमासी नेह कलश में भींग  महक उठी प्रमुदित अमराई लद बौराया  अमुवा मंजर से  कोयल चहक कुहुक इतराई , क्यारी-क्यारी बिछी हरीतिमा बाग़ सोलह सिंगार कर हुलसे प्रदीप्त सौंदर्य से दसों दिशायें  अलौकिक आह्लाद उर विहँसे , महुआ नख-शिख रस में मात टप-टपा-टप   चूवे  जमीं  पर श्वेत सुमन से छतर-छतर नीम कौमार्य से झरे इठला मही पर , सुआ, सारिका,सारंग, शिखी पा वासन्ती वात्सल्य हैं हर्षित मातंग, मरा...

" एक दीवाना ऐसा भी "

" एक दीवाना ऐसा भी " हटा दो लाज का  पहरा      सबर आँखों का जाता है            मेरी बेचैन चाहत को                अदा नायाब भाता है ।  काली घटा सी जुल्फें     क्या बिजली गिराती हो         मैं मदहोश हुआ जाता           ग़जब चिलमन गिराती हो ।  चुराकर चैन सोती तुम       सपन की मीठी बाँहों में          मेरी पल भर कटी ना रातें              मगन बोझल निगाहों में ।  अगर तुम ला नहीं सकतीं    जुबां पर दिल की वो बातें        निगाहों से बयां कर देतीं          जुबां और दिल की वो बातें । तेरे खंजर नयन नशीले     कहीं जान ना मेरी ले लें        सुर्ख लबालब होंठ रसीले               सरेआम मोहब्बत ना पीले ।   आँखें मदभरी ...

" कविता का विकृत श्रृंगार ना हो "

" कविता का विकृत श्रृंगार ना हो " ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे हृदय के भाव प्रवण छांव तले जिसके गहन सिन्धु में लहर लहर अनुभूतियों के सुघड़ सलोने भाव पले तिलमिलाती अभिव्यक्तियाँ जहाँ भावों के सागर में कौंधतीं हिलोरें जहाँ प्रेम का सागर उमगता जहाँ संवेदना की उमड़तीं रसधारें जिसकी हर बूंद में हो तूफां सी रवानी  भरी हो जिसमें जीवन के अनुभवों की कहानी जो अन्तर के क्रंदन को सृजित करे  उर के कोलाहल को जगविदित करे । ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे जहाँ शब्दों का अपव्यय ना हो और जबरन शब्दों के आभूषण से कविता का विकृत श्रृंगार ना हो ऐसे भाव उकेरूं जैसे हरसिंगार के फूल झरे  सीपी के मोती सा उद्गार व्यक्त हो काव्य प्रेमियों को भाव विभोर कर सकूं वितृष्णा,उकताहट का ना सार व्याप्त हो  चाह नहीं प्रशंसा के मिथक चन्द शब्दों की जिससे चन्दन सी शीतलता का बोध प्राप्त हो ऐसे प्रवाह का मेरी कविता में भरो उद्बोधन  जिसे पढ़कर मन को ठंडक का आभास हो ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे जहाँ कवि मन के अन्तर्द्वन्द का विलाप हो ना अनर्गल ना निकृष्ट प्रलाप हो जहाँ ...

याद पर कविता " महका जातीं सांसों को अनुराग से "

 " महका जातीं सांसों को अनुराग से " जब-जब दूधिया  किरण छितराई बजी सुधियों वाली मृदुल शहनाई टंगी तस्वीर देख मन की भीत पर सीने में हूक उठी आँख डबडबाई , जो ख़ुश्बू समाई अबतक सांसों में रोक लूँ सांसें लेना  ये सम्भव नहीं पृथक कर दिए उसूलों ने राहेें मगर दिन बिन याद गुजरे ये सम्भव नहीं , यादें प्राय: बिखेरतीं इन्द्रधनुषी रंग  आ पलकों की  चौखट अन्दाज़ से  नेेह से चूम अंतस् के अहसास को महका जातीं सांसों को अनुराग से , रखीं अनमोल ख़तों की निशानियां जिन शब्दों में बसी सुगंध प्यार की उम्र भर रखा चस्पा कलेजे से उन्हें थकीं आँखें न कम्बख़्त इंतज़ार की , हर डगर पर करतीं  यादें परिक्रमा  पग-पग चलें साथ परछाईं की तरह स्तम्भ सम खड़ी स्मृति आत्मा में वो जो दमकतीं सूर्ख अरुनाई की तरह । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह