रविवार, 5 मार्च 2023

फागुन और वसन्त --कपोल गुलाबी करवा गोरी और हुई छबीली

" कपोल गुलाबी करवा गोरी हुई और छबीली "

मन के धुलें मलाल,अबीर गुलाल से प्यार में
मुबारक सबको होली,भींगें रंगों के फुहार में ।

आया फाल्गुन का महीना बहे फगुनी बयार 
साँसों में घुला चंदन मौसम हो गया गुलज़ार 
दिल हुआ बावरा मिश्री घोले प्राणों में पूरवा 
मधुऋतु का उल्लास लगे खिली-खिली दुर्वा ।

कुसुमित हो गईं कलियां महक उठा उपवन 
रूनझुन बाजी पायल पाँवों में उठा थिरकन 
पत्रविहीन टहनियों पर फूटी फिर से कोंपल
बरस वसंती वर्षा भींगा गई धरा का आँचल ।

हुरियारे हुड़दंग मचाकर पनघट चौपालों पर
थिरकें गागा फगुआ,ढोल,मृदंग के थापों पर
यौवन से गदराये वृक्ष,मंजर सुगंध बिखराया
शोख़ हुईं कलियों पर भ्रमरा उन्मत्त मंडराया ।

कुंकुम,केसर सजा थाल,ऋतुराज पाहुन का
पपीहे,कोयल करें चहक सत्कार फागुन का
इन्द्रधनुषी हुआ अनन्त,छटा बिखरी रंगों की 
झूमकर आई होली,चूनर भींगो गई अंगों की ।

प्रकृति की छवि न्यारी साफ-स्वच्छ आकाश
करें विहार विहंग व्योम में उर में भर उल्लास 
प्रकृति कर आबन्ध फागुन से,दी ढेरों सौगात 
सुर्ख रंगो में चरम पे यौवन टहकें टेसू पलाश ।

बौराया हर नटखट मन,मस्ती भरे त्यौहार में
बदला मिज़ाज बूढ़वों का होली के ख़ुमार में
कपोल गुलाबी करवा गोरी और हुई छबीली
कवियों की कविताएं भी करने लगीं ठिठोली ।

दुर्वा--दूब
सर्वाधिकार सुरक्षित 
शैल सिंह 


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