रविवार, 4 जून 2017

गर्मी पर कविता '' हे सूरजदेव तरस खाओ ''

हे सूरजदेव तरस खाओ


अकड़ इतनी नहीं अच्छी
जरा तेवर को वश में रखो
भीषण ताप से झुलसाना
दिनकर कलेवर पास में रखो ,

भाती भोर की शीतलता
उजाला दिन का,सूरज जी
बनकर अग्निपिण्ड का गोला 
मचाते क्यूँ हड़कम्प लपट से जी,

कड़कड़ाती धूप का क़हर
वदन है आग सी झुलसे
हे सूरजदेव तरस खाओ
घटा अम्बर से अवनि बरसे ,

इस मनमौजी प्रकोप से कब 
बताओ निज़ात दिलाओगे
कब बारिस की फुहारों से
दहक तन की मिटाओगे

पौधों को मार गया लकवा
खड़े निर्जीव क्यारी में
पांखी उन्मुक्त पड़े दुबके
नीड़ों की चारदीवारी में ,

लगता जान ले लेगी
असहनीय ऊफ्फ़ ये गर्मी
बताओ लाओगे कब मानसून
चिलचिलाती धूप में नरमी

जीना हो गया दूभर
लिसलिसाता तन पसीने से
मिले चन्दन सी शीतलता  
चढ़े तन वस्त्र झीने से ,

तेरे लू के थपेड़ों की
तीखी मार से बेहाल
तमतमाना छोड़ बिछाओ ना
घुमड़ते घन का महाजाल

तेरी ऊष्मा से सैर-सपाटे
चौपट अवकाश गर्मी की
सुबह अलसाई बड़ी होती
कड़ी दोपहरी गर्मी की ,

हे इन्द्रदेव निमन्त्रण देते
तुझे बाग़,तड़ाग,पशु,पक्षी
सूखे ताल,तलैया,पोखर
प्यासी मीन दरकती धरती |

                      शैल सिंह

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