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ऐ कविता

ना जाने है क्यों सुस्त धार मेरे कलम की जो लहराते उर के समंदर की सरदार थी छटपटाता है अन्तस उमड़ते कितने भाव  उदास मन को है कविता आज तेरी तलाश  बुझा दे कागज़ पर अनकहे भावों की प्यास अश्रु की बूंद से लिख दे कथा ज़िन्दगी की हंसा दे रूला दे मिटा दे तृषा ज़िन्दगी की मुस्कुराये सदा कविता में मन का अहसास  ऐ ख़ामोश शब्दों अश्क अब पिया नहीं जाता  मन के गहरे समंदर का सफ़र तय किया नहीं जाता  मन के उद्गारों से इतना ना रहा करो नाराज़  लौटा दो फिर से मेरा वहीं पुराना अन्दाज  लफ़्ज़ों का खजाना चूक ना जाये कहीं  ज़िन्दगी ही ना कर जाये बगावत कहीं  पीरो दे खूबसूरत सपने कविताओं में  संजो दे सुनहरी यादें कविताओं में  महफूज़ कर दे खट्टे मीठे अनुभवों के लहर   अवशेष पल हैं बस ,उम्र के ढल रहे पहर  हर विधा के दीप प्रज्ज्वलित कर दो कविताओं में  ना जाने कब ज़िन्दगी की धूप छुप जाये घटाओं में। शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

बे-हिस लगे ज़िन्दगी --

बे-हिस लगे ज़िन्दगी -- ऐ ज़िन्दगी बता तेरा इरादा क्या है  बे-नाम सी उदासी में भटकाने से फायदा क्या है  क्यों पुराने दयार में ले जाकर उलझा रही है  अब तो ख़ुशी के दिन थे आये ग़म से मिला रही है। ना लुत्फ़ अंजुमन में ना महफ़िलों में रंगत दिल बुझा-बुझा सा लगे सांय-सांय हर तरफ ना कुछ ख्वाहिशें बचीं ना कुछ अरमान बाकी है  ज़िन्दगी होगी बसर किस तरह सोच मन में उदासी है। उदासी का कोई सबब नहीं क्यों बे-हिस लगे ज़िन्दगी  शाम लगे धुआं धुआं कोई ऐसा नहीं हो जिससे दिल्लगी  कैसी अकथ है वेदना कि अशान्त और विकल रहता मन समझ न आता ऐसा क्या संताप कि विचलित रहता  हरदम । क्यूं मायूस है ज़िन्दगी जाने किसकी है तलाश  खाली-खाली सा दिन लगे खाली-खाली सी रात अजीब-अजीब से उठते दिल में ख़यालात ऐ ज़िन्दगी अब बस कर ना कर ऐसे हताश। सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

वाह रे गर्मी

वाह रे गर्मी--- भीषण गर्मी का आक्रमण  किसी यन्त्रणा से कम नहीं  ताप सहन करना मुश्किल  अलसाई लगे दोपहरी  बादल का आसार नहीं  मेघ से चलो करें चिरौरी  झुलस रहा है कन-कन  कब बरसोगे घनश्याम  तपन से दरक रही धरती  लगे नहीं शीतल सी शाम  सूरज का पारा बढ़ता जाये कोमल काया झुलसाये सूखी नदियां,नाले,ताल,कछार  गर्मी ने कर दिया जीना दुश्वार  गर्म हवाएं आग बरसायें  विरान हुआ चिड़ियों का खोता जल बिन मछली तड़प रही  कैसे लगायें बिन पानी गोता तरूवर भी हाथ खड़े कर दिए  नहीं कहीं शीतल सी छाया पीपल बरगद भी मुर्झाये नहीं उन्हें भी पहले सी माया उमड़ घुमड़ बरसो ना मेघ लगा दो गर्मी में सेंध  क्यों नाराज़ हो बरखा रानी  झम झमाझम बरसा दो पानी । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

रिटायरमेंट के बाद

रिटायरमेंट के बाद-- सोचा था ज़िन्दगी में ठहराव आयेगा  रिटायरमेंट के बाद ऐसा पड़ाव आयेगा  पर लग गया विराम ज़िन्दगी को  अकेलापन,उदासी का चारों तरफ घेरा मौसम उदास होता है या मन समझ नहीं आता दिन कचोटता बीतती शाम तनहा तनहा  कैसे कट रहा ज़िन्दगी का हर एक लमहा सेवानिवृत्त के बाद लगता जीवन कुछ रहा नहीं  नौकरी थी तो कितने लोग साथ थे हमारे  अब है केवल तन्हाई न कोई संगी न सहारे बस दो काम खाना और सोना  ना बचा कोई काम ना धाम बस आराम  ना कोई शौक बचा ना कोई इच्छा  ना पहनावे ओढ़ावे का अंदाज रहा ना तो अब घूमने फिरने की वो ललक बहुत कचोटता अकेलापन,उदासी,रिटायरमेंट कितने यादगार पल हैं पर आज सब निष्काम  कितनी शानदार थी नौकरी वाली ज़िन्दगी  व्यस्त थे मस्त थे स्वस्थ थे हॅंसने बोलने के लिए लोग तो थे  आज जैसी वीरानी तो नहीं थी बोरियत सी जिन्दगानी तो नहीं थी विश्राम भी रास आता नहीं  सेवानिवृत्त का वरदान भी सुहाता नहीं  कहां बड़े बड़े बंगले खुला खुला सहन और अब अपार्टमेंट का बंद बंद घुटा घुटा कक्ष मन में निराशाजनक और नकारात्मक बातों का आना रिटाय...

नज़्म ----

नज़्म --- अपनी नज़रों में कर लो महफूज़ मुझको  ताकि कर सको हर पल महसूस मुझको तुम्हारी नज़रों में रहके देखूं सुहाने नजारे ज़िन्दगी में रहूं हर पल साथ साथ तुम्हारे । खुशबु बन कर तेरी श्वासों में समां जाऊं तेरी सूरत में मैं ही मैं सबको नज़र आऊं तूं मेरा मुकद्दर  मैं तेरी मुकद्दर बन जाऊं दूर कितना भी रहूॅं तेरे पास नज़र आऊं । मुहब्बत के नशे में अगर हो गये बदनाम  आंखों के देखें ख़्वाब अगर हो गये आम ग़म नहीं जज़्बात का तोफ़ा देते ही रहेंगे मोहब्बत की तपिश कर दे भले सरेआम । अजनवी होके भी कितने करीब आ गये रूसवाई के चर्चे आज इस कदर भा गये तुझपे ऐतबार कर दाग दामन लगा लिये तुझपे यकीन कर गले तन्हाई लगा लिये । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

नज़्म ---

अपनी नज़रों में कर लो महफूज़ मुझको  ताकि कर सको हर पल महसूस मुझको तुम्हारी नज़रों में रहके देखूं सुहाने नजारे ज़िन्दगी में रहूं हर पल साथ साथ तुम्हारे । खुशबु बन कर तेरी श्वासों में समां जाऊं तेरी सूरत में मैं ही मैं सबको नज़र आऊं तूं मेरा मुकद्दर  मैं तेरी मुकद्दर बन जाऊं दूर कितना भी रहूॅं  तेरे पास नज़र आऊं । मुहब्बत के नशे में अगर हो गये बदनाम  आंखों के देखें ख़्वाब अगर हो गये आम ग़म नहीं जज़्बात का तोफ़ा देते ही रहेंगे मोहब्बत की तपिश कर दे भले सरेआम । अजनवी होके भी कितने करीब आ गये रूसवाई के चर्चे आज इस कदर भा गये तुझपे ऐतबार कर दाग दामन लगा लिये तुझपे यकीन कर गले तन्हाई लगा लिये । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

ये तनहाई

ये तनहाई -- सुबह तनहा शाम तनहा  तनहा ज़िन्दगी का हर लमहा  परछाईंयां भी अब डराने लगी हैं सुख चैन ज़िन्दगी का चुरानें लगी हैं  कैसे कटेगी ज़िन्दगी की बाकी उमर  तनहा-तनहा लगता आठों पहर ना जाने किसकी लग गई नज़र  नहीं तन्हाई का अब कोई हमसफ़र  अपने चारों तरफ तन्हाई का मेला भीड़ भरे शहर में भी फिरते अकेला  न महफ़िल न मयखाना ना कोई खेला न कोई संगी संम्बन्धी ना कोई चेला गुज़र रही ज़िन्दगी अकेला अकेला।  शैल सिंह