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कविता '' गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की ''

'' गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की  '' उमड़ कर बही वेदना जो अश्रु धार में  बह गई उनके यादों की धूप-छांव भी वहम ही सही तो भी कुछ कम ना था हृदय में था बसा भले पीर का गाँव ही , काश होती व्यथा की जुबान भी अगर मुस्कराती नहीं मैं ग़म छुपा इस तरह  न भावना का उमड़ता अथाह समंदर न ग्रन्थ लिखती ज़िन्दगी का इस तरह , एकाकीपन से मुझे तो अटूट प्यार था  क्यूँ रोज आता ख़्यालों में दबे पांव वो  सुलगाता विरह की अगन से अंतहीन    छितर जाता है हर्फ़ सा काग़ज़ों पे जो , वो आकर मेरी कल्पना कुञ्ज की गली  पुराने मौसम का पुरवा बहा कर गया फिर से अनवरत् ख़्वाबों का कांच के  जत्था पलकों पर मेरी बिछा कर गया , भरकर उन्माद पोर-पोर में वसन्त सा  पी अधर का पराग उर लगा कर गया गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की   आलम तन्हाई का यूँ महका कर गया , नई कोंपलें खिला यादों के दरख़्त पर  झट उदासी के...

ग़ज़ल '' मिलना,बिछड़ना उल्फ़त का दस्तूर है ''

मिलना,बिछड़ना उल्फ़त का दस्तूर है  आज की रात आलिंगन लगा लें सनम कल ना जाने हसीन ये समां रहे ना रहे, ख़ुशनुमा सी जो ये आज की रात है क्षण भर की ही और ये मुलाकात है जुदाई,मिलन चाहत में,बे-आसरा हैं वफ़ा,बेवफ़ा की  सहूलियत कहाँ है इश्क़ वालों की राहें दहर में जुदा हैं हँस इंकार करो ना सुहानी फ़िज़ा है, आज की रात  चाँदनी में नहा  लें सनम कल ना जाने ये वक़्त मेहरबां रहे ना रहे , क्या पता था दुश्मन  जमाना बनेगा प्यार हमारा तुम्हारा फसाना बनेगा इश्क़ में होंगी खुशी संग मजबूरियां सिमटी घड़ियाँ तक़ाजों की बेड़ियाँ चाँद का कारवां तुरत गुजर जायेगा कभी ठहरा कहाँ वक़्त छल जायेगा, आज की रात मय अधर का पी लें सनम कल ना जाने अधर ये मकरंंद रहे ना रहे, यादों से सजाना सुहागरात यादों की होंगी तहरीरों  से बातें  जज़बात की कल्पनाओं में तस्वीर उभरती रहेगी जुदाई तन्हाई में भी अखरती  रहेगी शम्मा जलती  रहेगी अमर प्यार की याद आएगी स्याह रात इन्तज़ार की, आज ...

छोड़ दो तसव्वुर में मुझको सताना

छोड़ दो तसव्वुर में मुझको सताना  तबस्सुम के  जेवरात ग़ म को   पेन्हाकर अश्क़ से  याद के  वृक्ष  ख़िज़ां में हरा कर डाली खिलखिलाने की आदत तुम्हारे लिए। सील अधर तमन्नाओं  को  दफ़न कर ख़्वाब दिल  के कफ़स में जतन कर  डाली दिल बहलाने की आदत तुम्हारे लिए।  भर दृग की दरिया अश्क़ों का समंदर   सितम  सहे  इश्क़ में  चले जितने ख़ंजर डाली जख़्म भुलाने की आदत तुम्हारे लिए।  जब भी घुली मन  तेरे  लिए कड़वाहट  भींगो दीं हसीं लम्हों के नूर की तरावट डाली मर्म समझाने की आदत तुम्हारे लिए। दिल की सल्तनत ही,की नाम जिनके  वो ही दे गये मिल्यक़ित तमाम ग़म के डाली दर्द सहलाने की आदत तुम्हारे लिए।  क़सक हिज्र के रात की  तुम  न  जाने ले गए मीठी नींद भी प्यार के बहाने डाली रात महकाने की आदत तुम्हारे लिए। ना कोई अर्जे तमन्ना ना पैग़ामे-अमल सीखा तरन्नुम में  दर्द  पिराने का शग़...

शब्दों के अभाव पर कविता

शब्दों के अभाव पर कविता शब्दों बिन बेजुबां वाक्य हैं रचना रखूं किस शिलान्यास पर  अस्मर्थ,बेजान पंक्तिबद्ध कतारें मौन शब्दों के उपहास पर , क्षत-विक्षत हो शब्द शांत हैं   भाव दिग्भ्रमित वनवास पर  अवचेतन की प्रसव वेदना    सही न जाये ,कलम  उपवास पर , गीतों के बोल ठूंठ पड़े  अधरों के कैनवास पर शीतल से अहसास बन्दी जैसे  कल्पनाओं के आवास पर , अक्षर-अक्षर दुलराया  अभिव्यक्ति के विभास पर काव्य के अवयव गण सभी  रस,छंद,अलंकार हैं अवकाश पर , सुप्त पड़ी लेखनी की वाणी  मसि,कागज गये सन्यास पर घोलूं किसमें कल्पना का लालित्य   टूटन, मिलन, वियोग  के परिहास पर , करूँ प्राण-प्रतिष्ठा भावदशा  की  किन शब्दों,बिम्बों के मधुमास पर  शब्द हो गए विलुप्त या विस्थापित  या गये शब्द विधान के अभ्यास पर , कैसे गूंथूं  मन का अवसाद  शब्दाभाव में  किस विश्वाश पर किन श ब्द कलेवरों मे...

" निराकार ईश्वर पर कविता "

" मेरे सर्वव्यापी साईं,कहाँ-कहाँ ढूंढी हर घड़ी मैं " घनघोर  आँधियों से  लड़ता  रहा दीया सारी रात तेरी याद में जलता रहा पिया, चैन दिन नहीं नींद आती नहीं है रात रूतों ने ख़ूब ठगा है दे दे के झूठी आस भरा आँखों में समन्दर बुझती नहीं है प्यास प्रभु दरश को तेरे  क्या-क्या लगाती रही कयास, प्राणों की  दे दे आहुति  घुलता रहा दीया सारी रात तेरी याद में पिघलता रहा पिया घनघोर  आँधियों  से  लड़ता  रहा   दीया सारी रात  तेरी याद में सुलगता रहा पिया । आकाश में पाताल में,गिरि,कन्दरा,गुफ़ा में पर्वत,शिखर में हेरा रे कण-कण चहुँदिशा में उपत्यका में ढूंढा प्रभु दिग्-दिगन्त मधु निशा में किस गह्वर में है समाधिस्थ,बता दे किस विभा में, निर्वस्त्र  बारिशों  में  भींगता  रहा  दीया सारी रात तेरी याद  में गलता रहा पिया घनघोर  आँधियों से  लड़ता  रहा  दीया  सारी रात तेरी याद में तड़पता रहा पिया । वेदों में तुझको ढूंढा,गीता,बाइबिल,कुरान में प्रत...

" हर आहट लगे जैसे तुम गए "

" दास्तां कली की जुबां "  हर आहट लगे जैसे तुम गए तन-मन सजाए संवारे हुए करके सिंगार आई तुम्हारे लिए यौवन के मय से छलकती हुई  खोली कलियों के घूँघट तुम्हारे लिए । एक भौंरा गली से गुजरकर मेरे रूप की माधुरी ही चुरा ले गया चूस मकरंद वहशी गुलों के सभी सुर्ख़ अधरों की लाली उड़ा ले गया । हर बटोरी से तेरा पता पूछती हार तेरे लिए पुष्प के गूंथती दृग को प्रतिपल प्रतिक्षा रही देवता दौड़कर द्वार पर हर घड़ी देखती । रो रही साधना हँस रही बेबसी ज़िस्म मुर्दा लिए फिर रही बाग़ में तारिकाएं विहंसती रहीं हाल पर मनचली कामिनी मिल ख़ाक़ में । दर्द घुल-घुल बहे अश्रु सैलाब में मन का हिरना भटकता रहा चाह में वक्त कंजूस है प्यास बुझती नहीं सब्र शर्मसार होती रही राह में । ईल्म होता बहारों के यदि ज़ुल्म का बंद कोंपलों की सांकल नहीं खोलती तान पत्तों की धानी चंदोवे सी छतरी झूमकर डाल पर बाग़ में डालती । मस्त मौला हवा का बेशर्म झोंका ख़ुश्बू सारी चमन की बहा ले गया हर आहट लगे जैसे तुम आ गए वो आशिक़ आवारा दगा दे गया । भान होता घटाओं की शोख़ियों क...

" तेरा अस्तित्व क्या शहर गाँवों के बिना "

तेरा अस्तित्व क्या शहर गाँवों के बिना मेरे गाँव की सोंधी  खुश्बू ले आना हवा शहर में खरीदे से भी कहीं मिलती नहीं ईमारतें तो गगनचुम्बी शहर में बहुत सी धूप की परछाईं तक कहीं दिखती नहीं । बीत गई इक सदी देह को धूप सेंके हुए  भींगी लटें तक घुटे कक्ष में सूखती नहीं खुले आँगन के लुत्फ़ को तरसता शहर लगे व्योम से चाँदनी कभी उतरती नहीं । शहरी सड़कों से भली गंवईं पगडंडियाँ आबोहवा गाँव सी यहाँ की लगती नहीं लगे दिनकर को आसमां निगल है गया किरणें मोहिनी सुबह की बिखरती नहीं । भाँति-भाँति के शज़र यहाँ तनकर खड़े किसी टहनी पर परिन्दों की बस्ती नहीं क़िस्म-क़िस्म के गुल यहाँ खिलते बहुत फज़ां में महक़ रातरानी सी तिरती नहीं । लाना जमघट पीपल के घनेरे छांवों का वैसी मदमस्त पवन शहर में बहती नहीं वो पनघट की मस्ती झूले  नीम डाल के बुज़ुर्गों के चौपाल की हँसी  गूँजती नहीं । ना नैसर्गिक सौन्दर्य ना समरसता कहीं  स्वर्ग जैसा है,वास्तविकता दिखती नहीं तेरा अस्तित्व क्या  शहर गाँवों के बिना बसती...