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तलाक और शरिया

तलाक तलाक तलाक के मसले को ना तो कानून सही कर सकता और ना ही शरीयत ,सिर्फ बहस और वाद प्रतिवाद के दौर में असली मुद्दा ही दबकर रह जायेगा । इस मसले का हल सारी मुस्लिम महिलाओं के हाथ में है यदि वह अपने साथ सदियों से हो रहे अन्याय के प्रति बगावत पर उत्तर जाएँ तो ,पर वो डरती हैं इस लड़ाई से कहीं अलग-थलग न पड़ जाएं ऐसी घड़ी में साथ देना होगा समाज को ,सभी वर्ग के लोगों को तथा हिंदुस्तान के सभी मानवीय संवेदनाओं को,मुस्लिम महिलाओं की सहनशक्ति ने ही बढ़ावा दिया मुस्लिम मर्दों को क्रूर से क्रूरतम अत्याचार और व्यवहार करने को सर से एड़ी तक बुर्का ,खुलकर साँस लेने की भी आजादी नहीं ,फैशन के अनुसार तथा बदलते हुए ज़माने साथ कितनों ने कुरीतियों को छोड़ ज़माने के साथ कदम मिलाया पर मुस्लिम धर्म में कोई बदलाव कभी नहीं आया न आएगा जब तक विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होगा जब तक सोच के फलक पर नई सोच हॉबी नहीं होगी ।                                                     ...

मन इतना आद्र है की बस .... मत पूछिये

     मन इतना आद्र है की बस  ....  मत पूछिये उरी में शहीद हुए हैं अपने वीर जवान जो उनकी श्रद्धांजलि में अभी शपथ लो हिंदुस्तान के नौजवानों डटकर इंतकाम लेने का सिलसिला तभी थमेगा जब घुसकर तुम भी पाकिस्तान के गढ़ में ऐसा हश्र करोगे मुँहतोड़ जवाब दे बेगैरत छिनालों के छैले ख़ेमे का । मच्छर,मक्खी सी माँऐं पैदा करतीं तादातों में वाहियात औलादें न तहजीब सीखातीं न कोई संस्कार बस जनती रहतीं हरामजादे न अफ़सोस उन्हें ना फर्क कोई गोजरों की एक टांग टूट जाने का गर महसूसती वज्र का पहाड़ टूटना मलाल होता कुछ खो जाने का । पर तेरी बहना तो थाल सजा बैठी थी इकलौते भाई की राहों में मेंहदी रचे हाथ भरी चूड़ियाँ जहाँ सिंगार तब्दील हो गए आहों में हसरत से देखती रस्ता जिन माँओं के आँखों से निर्झर आँसू उमड़े उन वीर सिपाहियों की शहादत पे नौनिहालों लेने होंगे फैसले तगड़े । शीघ्र फतह कर घर लौ...

वीर रस की कविता --ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना

वीर रस की कविता --ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना  क्यूँ पापों में निर्लिप्त निर्बाध बह रहे अनिर्दिष्ट दिशा में पाकिस्तान , क्यों सत्य,अहिंसा की पावन वेदी को हिंसात्मक बनाने पर हो तूले कश्मीर का तो सवाल नहीं पीओके पर नजर हमारी क्यूँ तुम भूले , छोड़िये नवाज़ शरीफ बुरहान वानी की तोतिये रट का सिलसिला मेरे घर का मामला था वो ग़द्दार,उसे उसके करनी का फल मिला , गर कुछ लेहाज बाकी तो पहले निज घर की बिगड़ी तस्वीर संवार तेरी व्यर्थ कोशिशें काश्मीरियों लिए शाख़ की ढहती दीवार निहार , छोड़ दो वानी का कल्ट खड़ा कर कश्मीरी युवाओं को भड़काना अन्तर्राष्ट्रीय मानकों ने इतना धिक्कारा पर तुझे नहीं आया शर्माना , क्यों उसकी फिक्र तुझे इस्लाम अनुसार जन्नत के मजे वो लूट रहा बहत्तर हुरों के अंगूरी रस का स्वाद इत्मिनान से वानी तो चूस रहा , वैश्विक पटल पे इतनी फ़जीहत देखले मक्कार तूं अपने को तनहा कहाँ गई जनाब की दादागिरी ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना ,...

बता दो शेरों क्या औक़ात तेरे हिंदुस्तान की,

   ' वीर रस की कविता ' सीमाओं पर तो सब कुछ सहते तुम सेनानी फिर किस आक़ा के ऑर्डर का इन्तजार है आत्म रक्षा के लिए वीरों तुम पूर्ण स्वतंत्र हो हैवानों से निपटने का तुम्हें पूर्ण अधिकार है, स्वयं के जान की कीमत समझो सिपाहियों     दुश्मनों पर दागो गन ,बारूद औ एटमबम कायर बन कर राक्षसों के वंशज करते वार छप्पन गज सीने से टकराने का नहीं है दम,     खद-खद ख़ौल रहा जो आज खून जाबांजों इतना ख़ौफ़ दिखा फट जाए पाकिस्तान की बहुत खोये हैं लाल भारत माँ ने आज तलक बता दो शेरों क्या औक़ात तेरे हिंदुस्तान की, ऐसा उठा बवंडर शान,आन की बात सपूतों घर के मित्र-शत्रु का फर्क भी ध्यान में रखना बहुत हुई गाँधीगिरी मानवीयता बहुत दर्शाये असमंजस क्यों,पैलेटगन हिफ़ाजत में रखना, मुहूर्त बहुत ही अच्छा दुश्मन मार गिराने का मटियामेट इन्हें करना संकल्प ठानो दिग्गज़ों प्रीत पड़ोसी नहीं जानता बार-ब...

' क्रान्तिकारी कविता ' अविच्छिन्न अंग काश्मीर हमारा इसे न हाथ से जाने देंगे

 इस कविता के द्वारा मैंने हिजबुल मुजाहिदीन,जैश-ए-मोहम्मद और अलगाव वादी नेताओं तथा हाफिज सईद आदि जैसे आतंकी फैक्ट्रियों को चलाने वाले एवं भारत में अराजकता फैलाने वाले एवं अपने नापाक इरादों से कश्मीरी नौजवानों को गुमराह करने वाले सनकियों को समझाने वाले अंदाज में एक सन्देश देने की कोशिश की है ।  ' क्रान्तिकारी कविता '  अविच्छिन्न अंग काश्मीर हमारा इसे न हाथ से जाने देंगे, भटके नौजवां आतंकी बन काश्मीर के जर्रे-जर्रे में छैले छितरे नागफ़नी के काँटों से फुफकारें पाले नाग विषैले , क्यूँ रक्षकों के भक्षक बन दुश्मन देश से हाथ मिलाते हो क्यूँ जन्नत सी धरती पर अपनी काँटों की पौध उगाते हो संग कौन खड़ा होता विपदाओं में जब भी तुम घिरते हो  किस आजादी की मांगे कर दिन-रात उत्पात मचातें हो , ओ वादी के भोले नादानों कह दो अपने सरगनाओं को हमें नहीं जेहादी बनना दो टूक जवाब दो आक़ाओं को हमें तामिल हासिल कर नबील बानी जैसा टॉपर बनना हमें हुर्रियत जैसे भड़काने वाले ...

'' क्रन्तिकारी कविता '' शत-शत नमन तुम्हें महानायकों

क्रन्तिकारी कविता  शत-शत नमन तुम्हें महानायकों ये वानगी तो एक चेतावनी थी सिंधु जल पर जल्द फैसला लेंगे हम , दिल आज ख़ुशी से पागल है मन रही देश में गली-गली दीवाली   शहर-नगर फूटे धांय-धांय पटाखे मिष्ठानों से घर-घर सज गई थाली , इंतक़ाम ले लिया उरी की घटना ने मातमी चेहरों पर फैली ख़ुशहाली बहादुरों ने ऐसा साहसी रंग बिखेरा अबीर गुलाल उड़ा होली पर्व मना ली , शत-शत नमन तुम्हें महानायकों रच दी एल ओ सी पे नई कहानी प्रण किया था खाकर माँ की कसम सेनाओं की व्यर्थ ना जाने दी क़ुरबानी , तेवर ने एक-एक शहादत के बदले  दस-दस जां लेने की बात कही थी बता दो नहीं पूरा हुआ मिशन अभी पीठ पर हमने घात की वार सही थी आज कलेज़े को मिली है ठण्डक उरी का मुँहतोड़ जवाब दे देने पर घर में घुस वीरों ने जो अंजाम दिया अब नहीं मलाल सुपुत्रों के खोने पर तेरे शौर्य का अद्द्भुत परचम देख हल्दीघाटी का भी सीना फूल गया परमाणु बमो की धमकी देने वाला शिकश्त खा लाशें गिनना ...

'' क्रन्तिकारी कविता '' शमशीरें मचल रही हैं चोलों में

उरी हमले पर मेरी लेखनी द्वारा बिफ़रती हुई यह दूसरी कविता है ,उरी के शहीदों को समर्पित मेरी इस वीर रस की कविता की एक वानगी --- शमशीरें मचल रही हैं चोलों में प्रस्तावना से लेकर उपसंहार तक ऐ पाकिस्तान तेरी बर्बादी का पटकथा,कहानी लिख ली भूमिका ध्वस्त करना ढाँचा तेरी आबादी का ,   कितनी बार फेंकी है तूने लुत्ती हमारे अमन चैन के उपवन  में कितनी बार तूने भड़काए शोले हमारे जन-मन के शान्त सदन में , विकराल हवा संग मिल चिन्गारी तेरी चमड़ी पर ऐसा क़हर ढहाएगी अब अंगारों को चैन तभी मिलेगा,जब  नमक-मिर्च का खाल पे छौंङ्क लगाएगी , अनगिनत नासूर दिए हैं तुमने अब ये उफान नहीं है रुकने वाला लालकिले की रणभेरी ने हुंहकार कर  अब खोल दिया है चुप का ताला  , दरियायें भी अब समंदर बन कर व्याकुल हैं पाक तेरी तबाही को आँसुओं की छछनाईं नदियां आकुल हैं तेरी भीषण बरबादी को , क्यों तेरी अम्मियाँ बस पैदा करतीं तुझे आतंक,ज़िहाद में झोंकने को क्यों शिक्षा,संस्कार,चलन को देतीं चोला आत्मघाती,फ़िदाईन का...