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पारदर्शी हो जीवन का हर रास्ता

करले पावन हृदय की गली ओ रे मानव भाव निःस्वार्थ हो कर्म करते चलो ,श्रम करते चलो मानवमात्र के कल्याण के लिए लोक मंगल के भाव तिरोहित करो पारदर्शी हो जीवन का हर रास्ता सदाचारी बनो महानता के लिए खुद का महिमा मंडन करो ना महानता के लिए अत्याचार,अनाचार,अन्याय वास्ते दांव जीवन का दे तम रौशन करो खुद करेगी वरण महानता अमरता के लिए सम्पदा के संग्रह से आसां है बनना महान ओ रे मानव ऐसी महानता घड़ी दो घड़ी के लिए ।

क्या फायदा मौत तेरे आने के बाद

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क्या फ़ायदा मौत तेरे आने के बाद कण्ठों से गूँजे स्वर डूबती आवाज सी खंडहरों में खो गए मंज़िल की चाह में ज़िंदगी अवसान के अंचलों में खो गए ।  जल रहा है दिल बेचारा आँखें झर-झर हैं बरसती हर घड़ी बयां करतीं कहानी मौन हो,चमकती आँसुओं की ये झड़ी मन में उठता शोर कहता चल छोड़कर दूर ये दुनिया कहीं मत ख़्वाबों की गूँथ ताबीर मिला कहाँ मुक़्क़मल जहाँ कहीं । चमन में किसी के फूल न्यारे कहीं तर ख़ुश्बुओं से रात है अरमां किसी के धुंध छाये किसी की खिलखिलाती रात है कहीं तो चाँद सा रौशन जहाँ किसी को हर सताती रात है कहीं वीरान है दिल का नगर किसी की गुनगुनाती रात है । ख़ुशनुमा नज़ारे हर तरफ मश्गूल कुछ न कुछ में हर कोई हर नज़र में मस्त शोख़ियाँ,किसी पर दिल निसारे हर कोई दहकते अंगारों पर काट रहा यहाँ,दिन-रात है  तनहा कोई चुन शूल सारे ज़िन्दगी के आँचल भर देता फूल काश कोई । जहाँ रूप का सागर छलकता वहाँ क्या विसात है अब मेरी जहाँ गुलज़ार भी गुलशन सदा उजड़ी क़ायनात है अब मेरी रंगीन दुनियां में कल्पना का रंग सिर्फ़ प्रारब...

ऐ कुदरत

      केदारनाथ घाटी की तबाही पर ऐ कुदरत तेरी क़हर  का मंज़र अज़ीब देखा लहरता तेरी तबाही का समंदर अज़ीब देखा जल प्रलय के  उमड़ते सैलाबों में निग़ाहों ने भयावह तेरी बेदर्दी का बवंडर अज़ीब देखा ।             ऐ कुदरत तेरी तबाही का मंज़र अज़ीब देखा तेरी विनाशलीला का क्रूर क़हर अज़ीब देखा पल में जमींदोज नगर,खण्डहर अज़ीब देखा प्रचण्ड प्रलय का लहर नज़र से करीब देखा। तेरी चंचल क्रीड़ा में समाहित ज़िन्दगानियों का रेला तमाशबीन बना देखा मौत की आशनाईयों का मेला बेघर हुए अनाथ कितने आंकड़े दफ़न तेरी मौज़ों में सब कुछ गँवा कर लौटा घर बिलखता हुआ अकेला ।                     सर्द हवायें,मुसलाधार बारिश का उफ़ ताण्डव नर्तन लाचार खड़ा देखा भंवर में उफ़ रुग्ण करूँण क्रन्दन उफनती जलधार में समाया धरा का वो हसीन जंगल ज़िंदगी मौत के दरमियान विवश उफ़ दर्दनाक रुदन । रौनक भरी वादी,पल में पलीदा शमशान बनते देखा सूखे पत्तों के मानिन्द भरभरा कर...

खतों के मजमून

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शैल सिंह                                                                                                                                                                समझ में नहीं आता कहाँ से आरम्भ करूँ,आज जब कुछ लिखने बैठी तो बीते हुए समय की तमाम छोटी-छोटी घटनाएँ जेहन में कहानी बनकर उभर आईं। लिखने की प्रवृत्ति बचपन में ही प्रबल हो उठी थीं शायद,तभी तो कक्षा तीन की अबोध सी पगली कही जाने वाली तानी ने अपनी लेखन शैली से बड़े-बड़े काम कर दिखाए। जिस उम्र में अभी बच्चे कलम दावात पकड़ते थे उस समय तानी अड़ोस-पड़ोस के लोगों का भावप्रवण,लच्छेदार चिट्ठियां लिखा करती थी,वह समय य...

''मदर्स डे पर''

              मदर्स डे पर                          [ १ ] माँ के वात्सल्य प्रेम सा दूसरा कोई अहसास नहीं होता माँ के आँचल सा दूजी किसी वस्तु में सुवास नहीं होता माँ के फटकार में दुलार की नीम सी गरमाहट होती है कभी किसी और रिश्ते या प्यार में ये आभास नहीं होता । जिग़र के टुकड़ों के लिए माँ तो तपा खरा सोना होती है उस त्यागमूर्ति जैसा मर्मस्पर्शी कोई बलिदान नहीं होता दुनियां प्यार पे लिख ले चाहे जितने भी उपन्यास क्यूँ ना ममता के भंडार सा कोई भी मार्मिक दास्तान नहीं होता ।                          [२ ] महबूबा के दामन में नहीं  माँ के कदमों में ज़न्नत होती है , अज़ीम ,मुकद्दस है रिश्ता ये इसकी ख़ुश्बू कभी ना हो रुसवा , झंझावात आये चाहे जितनी ज़िंदगी में माँ की मोहब्बत नहीं होती कभी रुसवा , कभी फ़र्ज से ना मुकरना करना ख़िदमत  ये बुनियाद कभी होती नहीं रुसवा।  ...

गज़ल

           ग़ज़ल बंद रखा है दिल का झरोखा  ये पागल पवन  ना उड़ा ले  कहीं यादों का अनमोल तोहफा  ये पागल  ........।  ज़मज़मा लगती ज़िंदगी सनम  एहसास की मीठी-मीठी चुभन  हमसफर साथ हैं परछाईयाँ  महकाती जीवन की तन्हाईयाँ  जाग काटी हैं रातें नयन में भोर सा नींद में ना चुरा ले कोई सपनों का झिलमिल भरोसा  ये पागल ........।  भींचकर ख़्वाब की बांह में  बेश-कीमती साज मन छांह में   ख़त सीने से तेरा लगा रखा है   बीते लम्हों की चीजें छुपा रखा है  ये मनमौजी काली घटायें  उमड़कर बरस ना बहा लें  बेशुमार जलवों का निशां अनोखा  ये पागल ...........।  जमजमा---संगीतमय,मनोरंजक                                               शैल सिंह 

एक सिरफिरा

     एक सिरफ़िरा  लड़का --- जुल्फ़ों के घुँघर पेंच ना रुख़ पर गिराइए गेसुओं तले ना चाँद सा मुखड़ा छिपाइए  लत लगी नज़र को क्या नज़र है आपकी  बला की इस अदा से ना बिजली गिराइए ।  छुप-छुप के मेरे ख़्वाब ना दिल के चुराइए  ना बन के खुश्बू ख़्वाब के सिरहाने आइए  क्या हुश्न का जलवा क्या शक़ल है आपकी  ऐ अज़ीज ना इस फ़न का दीवाना बनाइए ।  लड़की -- कसम ख़ुदा की आपके जज़्बात को सलाम  होश फ़ाख़ता हो जाये न सुन मेरा ये कलाम नज़ीर बेमिसाल रब की हूँ होगा बुरा अंज़ाम   हुज़ूर दिल के इस हरिना को लगाइये लगाम । निग़ाहों की तीखी बरछी ना मुझपर चलाइये    इल्तज़ा है ज़नाब हनक से घर पर आ जाइये  गुरू ख़िदमत से होगी खूब हज़ामत आपकी   आकर पापा से आशिक़ी का भूत उतरवाइये।