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वसंत ऋतु पर कविता '' शिरोमणि वसन्त ''

   '' शिरोमणि वसन्त '' जन-मन में गुदगुदी प्रकृति में छाया हर्ष  शी तल,मंद,सुगन्धित,समीर का पा  स्पर्श , बीत गया ऋतु शिशिर,आई  ऋतु वसन्ती बड़ी सुहानी मनमोहक,लगे ऋतु वसन्ती , प्रकृति का उपहार ले,आयी ऋतु वसन्ती मन करे मतवाला ये रूमानी ऋतु वसंती , फूले गेंदा,गुलाब,सूरजमुखी फूली सरसों अमुवा के मञ्जर पर मुग्ध कुहुकिनी हरषे , कोयल कूके कुहू-कुहू गायें गुन-गुन  भौंरे मयूर नाचें मग्न,उड़तीं तितलियां ठौरे-ठौरे , गुलाबी   मौसम में मस्ती भर दिए मधुमास घोल दिए अमृतरस दिशा-दिशा ऋतुराज , भर दिए नथुने मधुमाती स्नेहिल सुगन्ध से नव सिंगार कर  इठलाती  प्रकृति उद्दंड से , छजें टहनियां  हरित पल्लव के परिधान में धरा लगती नवोढ़ी दुल्हन  धानी लिबास में , मखमली चादर लपेटे धरित्रि अंग-अंग पर मानव मन मुग्ध झूमे वसन्त के सौन्दर्य पर , वृक्ष,लतायें और पुहुप सज-धज प्रफुल्ल हैं भ्रमरे करें अठखेलियां  पी  मकरंद टुल्ल हैं, प्रक...

इश्क़ की दीवानगी

इश्क़ की दीवानगी  दीवाना किया आशिक़ी ने बेइंतहा प्यार में तप रही है देह सारी इश्क़ के बुख़ार में , बस में नहीं दिल जरा भी होश नहीं ख़ुमार में निग़ाहें टकटकी साधे रहें  किसी के इंतज़ार में , ख़्वाब बुनते बीतते दिन दिल लगे ना कारोबार में आँखें इक झलक भी चार हों खिल जाते दीदार के बहार में , वफ़ा भी करे ग़र बेवफ़ाई आनन्द आए तक़रार में मनाना,रूठना शिकवे,गीले रोज मनुहार करते प्यार में , भय बदनाम होने का भी लब कर देता ज़िक्र बेक़रार में गढ़ते तारीफ़ों के क़लमें सदा इशारों से बेनाम के बाज़ार में , इश्क़ में मौजे हैं,तूफां है लेकिन इश्क़ इक सजा भी है पठार में दिल ये नादान जानता ही नहीं काँच ही काँच प्यार के दयार में , फासला नहीं फूलों,काँटों में अड़चनें मोहब्बतों के ज्वार में मुरादें पूरी हो मर्ज़ी ख़ुदा की बेतहाशा ग़म भी है इक़रार में।                           शैल सिंह

दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले विलुप्त हो गये जो शब्द

'' जिन शब्दों को सिरे से भूल गए '' थपुवा,नरिया,खपड़ा,मड़ई,टाठी,भीत  गोईंठा,कंडा,कर्सी,इन्हन,चिपरी,छान्हीं गोहरऊला,कोल्हुवाड़ा,खरिहान,मचान  ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । सनई,संठा,खरहरा,झंगड़ा,हरेट्ठा,सोटा  छिट्टा,खाँची,फरुहा,बरदउल,भुसहुला  घूर,कतवार,पण्डोहा,बढ़नी,सेनहना,  ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । कुरुई,मउनी,डाली,सूप,ओसउनी माठा,कचरस,होरहा,खरवन,लउनी दाना,चबैना,कुचिला,भुकूनी,भरसांय ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । ढील,उड़ुस,मस,लीख,चिल्लर,किलनी चइला,फल्ठा,लवना,खोईया,खुखूड़ी  रेह,रहंट,मोठ,हेंगीं, ढेकुल,लेहड़, घाम  ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । कड़िया,ढेकी, पहरूवा,ओखरी, मूसर जांता,चाकी,सील,लोढ़ा,थुन्ही,कोतर  गोड़,मूड़ी,केहुनी,कर्हियांय,कपार  ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । बीड़ो,बोरसी,धुईंहर,कउड़ा,भुकुरी  पहल,पोरा,कोठिला,शुज्जा,टेकुरी कन,भूसी,चूनी,चोकर,जुठहड़, पिसान ये सब उच्चारण जाने खो गए कहाँ । कोठा,ताखा, भड़सर,दिवट,भड़ेहरी टोड़ा,मुड़ेरा,ओरी,करनी,धरन,बल्ली गदबेला,मकुनी,डुग्गी,स...

'' चार जवानों की शहादत पर कविता ''

 चार जवानों की शहादत पर कविता  जाते-जाते साल के आखिरी दिन सन सत्रह दे गया ज़ख्म गहरा,कैसे मनाएं साल अट्ठरह , दर किसी के आयी सज अर्थी कोई जश्र में डूबा  देश के लोगों का जश्न मनाना लगे बड़ा ही अजूबा , ऐसे ताजा तरीन ख़बर पे भी किसी ने नज़र न डाली चार जवानों के शोक पर लोग कैसे मना रहे खुशहाली । मन बिल्कुल नहीं लगता नव वर्ष का जश्न मनाने में सरहद पर हुए लाल शहीद देश की गरिमा बचाने में , बन्द ताबूत में ओढ़ तिरंगा कितनों के लाल आये हैं घर जश्न मनाने वालों तुझपर भी तो इसका होता कोई असर , रो-रो तेरा भी होता बुरा हाल ग़र खुद का नयन सूजा होता तब भी तुम जश्न मनाते क्या निज के घर का दीप बुझा होता , जिनकी मेंहदी,महावर,बिंदिया,सिन्दूर धुल दिए गये हैं पानी से जिनके सुहाग ने दी शहादत देश लिए अपनी अनमोल क़ुर्बानी से , उन घरों में पसरे सन्नाटे,सूनी चौखट का दुःख तो आभास किये होते आह ऐसी मर्मान्तक पीड़ा का ओ हृदयहीनों थोड़ा अहसास किये होते। जि...

कविता ''आख़िर वो है कौन '

कविता  आख़िर वो है कौन खो न जाएँ भाव कहीं कलम हाथ ने गह ली  दर्द, खुशी, गम ,तन्हाई, उदासी शब्दों ने पढ़ ली उमड़े -घुमड़े उद्गारों की लेखनी नब्ज़ पकड़ ली अनकही अभिव्यक्ति मेरी काव्य कड़ी में गढ़ दी मन की मौन कथा व्यथा पन्नों पे उसने ने जड़ दी । तुम  हो मेरी आत्मबोध   तुमसे करके आत्म विलाप  मैं सहज हो लेती हूँ। आत्मलोचना तुम हो मेरी, आत्मवृतान्त तुझे सुना  मैं सहज हो लेती हूँ।  अस्मिता का बोध कराती  हँसि,खुशी,दुःख तुझसे बाँट  मैं सहज हो लेती हूँ।  तुम मेरे हर रंगों की पहचान  तेरा स्वागत कर  निजी ज़िन्दगी के दरवाजों से  मैं सहज हो लेती हूँ।  तूं मेरी चुलबुली सखि  बेझिझक अक्सर कर  तन्हाई में तुझसे बातें   मैं सहज हो लेती हूँ।  आत्मविस्मृति की परिचायक तेरी पनाहगाह में आकर  मैं सहज हो लेती हूँ। अन्तर के छटपटाहट को भाँप  मुझे सहज कर देती हो।  कभी वजूद को ढंक लेती हो  कभी उजागर कर देती हो।  कभी तो भटका...

वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना

 वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना  पहलू से महकती चलती संदल सी मतवाला कर निगाहों के  निमंत्रण  से मदिरालय में दीवाना कर , तेरी आँखों के भी सागर में देखा इश्क़ की लहरें कश्ती मेरे इश्क़ की उतराये सागर में उस गहरे देखे मिज़ाज  आशिक़ाना  इन उफनाती लहरों के  चलो मिलें साहिल पर तोड़ ज़माने के सभी पहरे , ग़र अल्फाज़ मुकर जाएं हृदय का हाल बताने से पलकें झुका बता देना अन्तर का राज निग़ाहों से अंतर की नदी का कलकल नाद हृदय सुन लेगा हटा घूँघट हया का चाँद निकल आना घटाओं से  , गेसुओं के झुरमट में बसा दिल आबाद कर देना आरजू को मेरी नज़राना दिल में उतार कर देना मदहोश अदायें कीं आजकल गुम नींद रातों की   वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना , हमदर्द बनकर मुक़म्मल नब्ज़ टटोल लिये होतीं मौन हसरतों,अहसासों का कुछ मोल दिये होतीं छोड़ निकम्में लफ़्जों को बंदिशें तोड़ संशयों की दिल बोझिल ना यूँ रहता फ़ख्र स...

दीवाली पर कविता '' आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ''

      दीवाली पर कविता  शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना हर्ष और उल्लास का पर्व दीवाली  रिश्तों में खूब गर्माहट लाना अंधेरा दूर भगा स्नेह लूटाना  नभ तारे शरमायें हो पावन तेरा आना शत-शत   अभिनन्दन  माँ लक्ष्मी तेरा आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना धवल ज्योति से  उजियारा कर नफ़रत की दीवार ढहाना ईर्ष्या,द्वेष मिटा प्रेम,सौहार्द्र बरसाना  रौनकता से शान्ति का साम्राज्य बिछाना शत-शत   अभिनन्दन  माँ लक्ष्मी तेरा आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना काली रात अमावस की कर आसुरी वृत्तियों का प्रतिकार कण-कण प्रकाश बिखराना अनन्त काल तक जग रहे तेरा दीवाना शत-शत अभिनन्दन  माँ लक्ष्मी तेरा आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना मन का भाव बतासे सा मीठा  अन्तस्तल खील सा खिलाना   खुशियों की सौगात लुटाकर शुभागमन से पर्व ये परमानन्द बनाना  शत-शत  अभिनन्दन माँ  लक्ष्मी तेरा आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ।     ...