बुधवार, 30 जुलाई 2014

नौमीद मत होना जहाँ आफ़री साथ तेरे

नौमीद मत होना जहाँ आफ़री साथ तेरे



घबराकर तुम कभी ग़म-ए-हयात से
जिंदगी बेबस दूभर ना खुद बना लेना
हर भयावह रात बाद रंगेशफक़ सवेरा
होगा, बात सोज़ दिल को समझा लेना ,

असंख्य गुलाबों की बाग़ है ये दुनिया 
फूल चुनना शूलों से दामन बचा लेना 
ये दुनिया है फर्श चिकना चौंधियाकर 
फिसल ना जाना खुद को संभाल लेना ,

महरूमी-ए-किसमत पर हँसे जमाना 
जुल्में-दुनिया से हाले दिल छुपा लेना
ऐतबार,वफा ,खता आग के दरिया हैं 
इरादों का अपने ना ख़्वाब जला लेना ,

मायूस हो मुश्किले-हालात से हरगिज़
न खुद को ग़म के आईने में ढाल लेना
वक्त के ज़ालिम हाथ की कठपुतलियां
हैं हम,किस्मत रंग लाएगी आज़मा लेना ,

यही इम्तिहान की कठिन घड़ी है दोस्त 
आस्मां पर लक्ष्यों का अरमान उगा लेना 
जिंदगी इक जंग है संघर्ष अनवरत सही 
ठोकरों की नोंक पे अंगड़ाई जवान लेना ,

जो काबिल नहीं तेरे तरज़ीह भी ना देना
इन दिल दुःखाने  वालों से मुँह फेर लेना
गिरगिटों की तरह मवाली हैं रंग बदलते
बेवफ़ाओं की जुदाई का मातम देख लेना ,

नौमीद मत होना जहाँ आफ़री साथ तेरे
वारिस्ता होकर अपना मुक़ाम बना लेना
मयस्सर नहीं खुशियाँ उसे परलोक में भी
मरेगा वो तेरी ही मकरमत् पर जान लेना ,                                                                   

मर्दों की नस्ल का है ईमान बड़ा ज़ाहिल 
मेहरो-मुरव्वत से पहले जरूर जाँच लेना 
रहमत ख़ुदा की होगी जहान की ख़ुशियाँ 
खुद आँचल में आ गिरेंगी बात गाँठ लेना । 


नौमीद--हताश , जहाँ आफ़री--संसार रचने वाला  ,
वारिस्ता --आजाद , स्वछंद  ,मकरमत्--दया ,अनुग्रह ,
मेहरो-मुरव्वत--मेल,मुलाक़ात,
                                               शैल सिंह

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