ना मैं जानूं रदीफ़ ,काफिया ना मात्राओं की गणना , पंत, निराला की भाँति ना छंद व्याकरण भाषा बंधना , मकसद बस इक कतार में शुचि सुन्दर भावों को गढ़ना , अंतस के बहुविधि फूल झरे हैं गहराई उद्गारों की पढ़ना । निश्छल ,अविरल ,रसधार बही कल-कल भावों की सरिता , अंतर की छलका दी गागर फिर उमड़ी लहरों सी कविता , प्रतिष्ठित कवियों की कतार में अवतरित ,अपरचित फूल हूँ , साहित्य पथ की सुधि पाठकों अंजानी अनदेखी धूल हूँ । सर्वाधिकार सुरक्षित ''शैल सिंह'' Copyright '' shailsingh ''
मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
कविता ''आख़िर वो है कौन '
सोमवार, 6 नवंबर 2017
वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना
वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना
पहलू से महकती चलती संदल सी मतवाला कर
मौन हसरतों,अहसासों का कुछ मोल दिये होतीं
छोड़ निकम्में लफ़्जों को बंदिशें तोड़ संशयों की
दिल बोझिल ना यूँ रहता फ़ख्र से बोल दिये होतीं ।
बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
दीवाली पर कविता '' आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ''
दीवाली पर कविता
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना
अंधेरा दूर भगा स्नेह लूटाना
काली रात अमावस की
कर आसुरी वृत्तियों का प्रतिकार
कण-कण प्रकाश बिखराना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
शैल सिंह
शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
गांव पर कविता '' भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ''
गांव पर कविता
बासी-बासी सी लगती शहर की फिज़ां है
मेरे गांव सी कहाँ मिलती यहाँ ताज़ी हवा है ,
लहलहाते खेतों में हरियाली दिखती जहाँ है ,
वो गाँव की रुखी रोटी का स्वादिष्ट निवाला
देख गांवों की रौनक़ लगता रोज इतवार है
जहाँ चहचहा अगवानी पाँखी करें भोर की
जहाँ रिश्तों की रेशमी डोरियाँ है भाईचारा
नशीला फागुन,रसीला सावन मेरे गांव का
करुणा का विपत्ति में सिन्धु बरसता जहाँ है ।
शैल सिंह
सोमवार, 18 सितंबर 2017
क्षणिका
क्षणिकाएं
क्यूँ इतना वक़्त ली ज़िन्दगी
खुद को समझने औ समझाने में
समझ के इतने फ़लक पे ला
छोड़ दी किस मोड़ पे ला विराने में
बोलो अब उम्र कहाँ है वक़्त लिए
वक़्त बचा जो खर्च कर रही तुझे बहलाने में।
कुछ लोगों ने महफ़िलों में
ये आभास कराया
जैसे पहचानते नहीं ,
मैंने भी जता दिया
जैसे मै उन्हें जानती नहीं ,
कद आसमां का खुद-बख़ुद झुक जायेगा
राह कोसों हों दूर मंज़िल की चाहे मगर
खुद मंजिलों पे सफर जाकर रुक जायेगा।
तन्हाई पर कविता गुजरे मौसम की याद दिलाती
तन्हाई पर कविता
गुजरे मौसम की याद दिलाती
भीगीं-भीगीं सिमसिम रात
तन्हाई से करती बातें
नैनों की रिमझिम बरसात
पलकों की सरहद तक आ-आ
उन्नीदी आंँखों में बीति सारी रात ,
गुजरे मौसम की याद दिलाती
रविवार, 17 सितंबर 2017
'' तिरंगा तन सजा सोचा न था तेरा मन दुखा दूं माँ ''
एक शहीद की अन्तर्व्यथा माँ के लिए
ऐ मेरे मित्रों मेरे गांव तुझसे मेरे हिन्द ये कहना है
शहीदों के मज़ारों पर नित्य दीप जलाये रखना है ,
याद आए मेरी दिल को जरा समझा लिया करना
लगा सीने से तस्वीरों को मन बहला लिया करना
हर्गिज़ कोसना मत देश को ऐ त्यागमयी माताओं
लाल था देश का तेरा मन को बतला दिया करना ,
जां कुर्बान वतन पर की कि तेरा कर्ज़ चुका दूँ माँ
आँसू अच्छे नहीं लगते योद्धा की माँ की आँखों में
तिरंगा तन सजा सोचा ना था तेरा मन दुखा दूं माँ ,
प्रिये का साथ जीवन भर निभा पाया नहीं तो क्या
भारत माँ के चरणों में थी चाहत वीरगति हो प्राप्त
जिनके शौर्य की गाथायें सुन हम बेहाल हुए थे माँ
वतन की गोद में सोने का गौरव जो आज है मिला
शैल सिंह
गुरुवार, 14 सितंबर 2017
मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए
मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए
सभी मदहोश बैठे हैं
नशा नस-नस तरल कर दी
सभी ख़ामोश बैठे हैं,
झपकना भूल बैठी हैं
जब से आई हूँ महफ़िल में
सभी खो होश बैठे हैं,
तो भंग तन्द्रा सभी की हो
महफ़िल हो उठे जीवन्त
करतल ध्वनि सभी की हो,
सुर साजों से नवाज़ें ग़र
हो अन्दाजे-बयां माहौल
वाह-वाह धुन सुना दें ग़र,
महफ़िल हो जाए गदगद
गर दें हौसला रंच भी
मन के तार छेड़ूं अनहद,
करूं भरपूर मनोरंजन
दर्शक दीर्घा में बैठे सज्जनों
करुं शत-शत नमन वन्दन ।
शैल सिंह
हिंदी पर कविता , हिंदी का हो राज्याभिषेक
हिंदी का हो राज्याभिषेक
हिंदी की ख़्याति बढ़ाने को
इसे हमें सशक्त,समृद्ध करना है
विश्वपटल पर भी प्रसिद्द करना है ,
हिंदी हमारे भारत का गौरव
हिंदी सुशासन,सुराज की धार है
भाल सजा बिंदिया हिंदी
करती हिंदुस्तान का श्रृंगार है ,
गंगाजल सी पावन हिंदी
उर्दू,संस्कृत से भी मिलनसार है ,
कितनी सीधी,सहज,सरल,मधुर
हिंदी हृदय का उद्गार है
रिश्तों की डोरी,ऊष्मा प्राणों की
हिंदी मौसमी गीतों की फुहार है
हिंदी का विस्तार करें हम
ये ऋषि,मुनियों के वाणी की टंकार है ,
मन से मन के तार जोड़ती
हिंदी मधुर,मनोहर रसधार है
कण-कण में है घुली हुई
हिंदी कल-कल बहती जलधार है ,
देश,दुनिया में भी गूंज रही
आज़ हिंदी की ललकार है
बांधती सुर में गीत,ग़ज़ल को
हिंदी मीठी कर्णप्रिय झंकार है ,
भावों में करुणा,पीर पिरोने वाली
हिंदी एकमात्र आधार है
सब भाषाओँ पर भारी पड़ती
हिंदी जब भरती हुंकार है ,
स्वतः उतरती मन के आँगन
कवि मन के कृतियों का संसार है
हिंदी का हो राज्याभिषेक
हम हिन्दुस्तानियों की पुकार है ,
भावों की प्रेयसी,प्रखर वक़्ता भी
हिंदी तेरा जय-जयकार है
परचम हिंदी का लहर रहा
बह रही दिशा-दिशा बयार है ,
हिंदी मणि है हिंदुस्तान की
परिष्कृत सम्प्रेषणीय उदार है
जन मानस को करती जागरूक
हिंदी हृदय से तेरा सत्कार है।
शैल सिंह
मंगलवार, 12 सितंबर 2017
'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''
देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना
तेरी आन लिए प्रान किया क़ुरबान प्यारे देश मेरे
किस हाल में दुलारा,हाल क्या लाड़ली दुलारी की
तेरे सम्मान,आन,बान लिए माता ने उजाड़ी कोख़
ज़िन्दगी भर लिए जिसने आँचल रखी समेट शोक
जिस द्वारे पर अर्थी आई ध्वजा में लपेटी संवार के
नमन तो करो देख जवानों का जज़्बा
सेना तुम्हारी ही हिफ़ाज़त में ऐ मूर्खों
एक दिन तो है मरना क्यूं ना मरें तिरंगा तन पर लहरा
तो क़ुर्बांन होने को देना जनम माँ बार-बार ईबादत से ।
दौलत,जागीर,तख़्तो-ताज़ हम परवानों का प्रिय तिरंगा है
वतन के गौरव लिए मर मिटना हम दीवानों का फण्डा है
सीने से लगाये रखना शहादत को हमारी न्यारी धरती माँ
रविवार, 10 सितंबर 2017
किसी की शायरी, कविता का जवाब मेरे भाव में
किसी की शायरी, कविता का जवाब मेरे भाव में
वोे किरायेदार हैं तो रहें किरायेदार की तरह
रास्ता बाहर का भी बता दे जा कोई उसको ,
हमारे बाप तक न पहुँचें हम तक रहें अच्छा
भलमनसाहत यही कि इन्हें बर्दाश्त करते हैं
जो असुरक्षित यहाँ पर जिनकी सांसें है बन्दी
वो कहीं जा ठिकाना ढूंढ लें आगाह करते हैं ,
ज़ुबां कैंची सी चलती एहसानफ़रामोशों की
अरे जान हथेली पर तो हम लोगों की ग़द्दारों
अलग-अलग वस्तियां हमारी और तुम्हारी हैं
न ज़द में हैं न रहते हैं विश्वासघातों के ग़द्दारों
ना कोई दुश्मन यहाँ उनका न जान खतरे में
हमारी घर-गली में रहके,जमाते धौंस हमी पे
आँखें अंँधी हैं कि बहरे कान,तस्दीक़ हाल तो कर ले ,
रविवार, 3 सितंबर 2017
कविता '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''
'' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''
दिन भर आग उगल सूरज जला नहीं निढाल हो गया
सारी रात जला एक दीप जल कर भी निहाल हो गया ,
ग़म सहना सीखा मैंने नीरव रजनी के गहन अंधेरों से
कभी रंगा नहीं किसी भी रंग में मैंने अपने अंदाज़ को
देखो अपना ढलता सूरज मेरे किस्मत से खेलने वालों
नमन करने वालों उगते सूरज को मेरा भोर भूला दिए
शैल सिंह
गुरुवार, 31 अगस्त 2017
बेटियों पर कविता,अँधेरों को कर ना दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी
बेटियों पर कविता
अँधेरों को कर ना दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी
ख़ुद चमकूँ जुगुनू सा मैं दे दूँ चाँद को भी मात
क़तर के डैनों को रखा है रस्मों की तिज़ोरी में
बंधन तोड़ें रस्मों-रिवाज़ के दे दो कुँजियाँ मेरी
शैल सिंह
सोमवार, 28 अगस्त 2017
कविता -ढोंगी बाबाओं पर व्यंग्य
ढोंगी बाबाओं पर व्यंग्य
झऊवा जैसे बाल बढ़ा लेना ,
लीला करना बनकर खूब मदारी,
जर,जोरू,जमींदारी अनुयायी तेरे
बहन,बेटियों के अस्मत की भी
देखना अंधभक्त बन्दे बाट लगा देंगे,
विरोधियों,प्रशासन पर पिल पड़ेंगे
डाल कर खुली आँखों पर पर्दे,
प्रशासन के विरुद्ध रोष जताएंगे
भक्ति के मद में डूबे ओ नकली ढोंगी
तेरे लिए ये मौत को भी गले लगाएंगे,
नपुंसक तो सबसे पहले बनाना
अपने सेवकों और सेवादारों को
हैसियत और रुतबे की धौंस दिखा
धमकाकर रखना भक्त परिवारों को,
खुद को ईश्वर का साक्षात् अवतार बता
कुकर्मों से मस्त बनाना अंधियारों को
धर्म की आड़ में अधम,निशाचर,पापी बन
आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं,
सम्पत्ति अर्जित करने के नायाब तरीके
बन जाना नकली बाबा कारोबारी
रंगीन बनाना हर रात ऐशगाह की
तन जोकर,बहुरुपिये सा लिबास धार
बिछा लेना भड़ुवाई का मायाजाल
लम्पट प्रवचनों की कर बौछार भक्तों पर
धुऑंधार,मचाना खूब धमाल,
ब्रह्मचारी का चोला पेन्हकर
भक्तों को मुर्ख बना धूल झोंकना आँखों में
उल्लू सीधा करना जो होगा देखा जायेगा
उलझाए रखना मूर्खों को बातों में,
जादू से जल में पूड़ी तलना आदि
अपनाना जितने भी हों ढोंगी हथकण्डे
लाखों करोड़ों भींड़ को खूब भरमाना
कि हो जायें फेल असली पूजारी पण्डे,
ईश्वर सज़ा मुक़र्रर तभी करेगा
जब पाप का घड़ा आकण्ठ भर जायेगा
फिर तबतक जेल में चक्की पिसना जब-तक
मौत के दिन गिनना सलाखों के पीछे
गवाहों के बयानात खुलेंगी पोल पट्टियाँ
कैसे-कैसे खूब चलाते थे काले धन्धे,
शैल सिंह
रविवार, 20 अगस्त 2017
ग्राम्य जीवन पर कविता
ग्राम्य जीवन पर कविता
किन शब्दों में बयां करुं बदरंग हुए मेरे ग्राम्य जीवन के यथार्थ दर्शन को ,भूला नहीं रस ऊख का,होरहा चने,मटर का,गाय-बैल,खेतों का टूटा मेढ़
ना पनघट पर कोई सखी,ना कजरी,फगुवा गीत रससिक्त मल्हार गूंजता
शैल सिंह
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
देश पर कविता कहीं दुर्गन्ध नाक में दम ना कर दे
देश पर कविता कहीं दुर्गन्ध नाक में दम ना कर दे
उर्दू है तहज़ीब वतन की
हिन्दुस्तान का हिन्दी है श्रृंगार
बाईबल,गीता,ग्रन्थ,कुरान हैं हार,
जहाँ भिन्न बोलियां,वेश भूषा भाषाएं
विभिन्न धर्मों के समावेश का प्यार ,
भारत माँ के विस्तृत आँचल को आज
जनमानस की आत्मायें कुत्सित कर डाला ,
शनिवार, 12 अगस्त 2017
पन्द्रह अगस्त पर्व मनायें हम प्रण प्यार से
दिल में राष्ट्रभक्ति अभिमान देश की भू पर
चाहे जो देनी क़ुरबानी मातृभूमि पर प्राण लुटायेंगे
सकुशल जन-जन,अमन,चैन हो भारत माँ पर सर्वस्व लूटायेंगे हम
बुधवार, 2 अगस्त 2017
सावन पर कविता
सावन पर कविता
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
घूँघट जरा उलटने दो
जितने भाव उमड़ते उर में
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं
खुद में ढाल जज़्बातों को
मन का सब कह जाते हैं |
'' घूँघट जरा उलटने दो ''
आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँखों में अंजन भरने दो
संग प्रतिक्षित मेरे संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,
घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
अपलक देखें इक दूजे को थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।
'' कोई याद आ रहा है ''
रुमानियत भरा ये मौसम शायरी सुना रहा है
गा रहीं ग़ज़ल फ़िज़ाएं अम्बर गुनगुना रहा है ,
मुँह छिपाये घटा में बादल खिलखिला रहा है
मन्जर सुहाना सावन का बांसुरी बजा रहा है
अलमस्त अलौकिक छटा माज़ी जगा रहा है ,
बीते मधुर पलों को समां चित्रित करा रहा है
आँगन उतर चाँद आहिस्ता,दिल जला रहा है
एक क़तरा तो देखें
तो जानोगे होती मजा क्या है बरसात की ,
एक क़तरा तो देखें क्या इसमें बरसात सी ,
प्रलय मचा देता जब फटता है बरसात सी ,
फिर ना कहना कैसी बला की बरसात थी।
कैसे खड़ा ख़िज़ाँ में शज़र
जा पता पूछ कर आ बता कुछ इधर
क्यों बदल सी गई हमसफ़र की नज़र |
ऐ बहारों कभी जाओ मेरे दर से गुजर
हो गए बेखबर क्यूँ आजकल इस क़दर ।
सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं
सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,
अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
रविवार, 23 जुलाई 2017
कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर
कई दिनों की बारिश से आजिज़ होने पर,
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,
नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,
कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,
कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,चहुँओर सीलन
रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी,मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन सी दुर्गंध हद कर दी ,
घूम रहे जीव खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,
जा कहीं और बरस कई जगहें सृष्टि की
क़ाबिलियत दिखा अपने क्रूर कृति की ।
शैल सिंह
सोमवार, 17 जुलाई 2017
मेघ से उलाहना
मेघ से उलाहना
उमड़-घुमड़ घनघोर घटाएंचाहतों का घोर उल्लंघन कर
जी भर-भर मन को जलाती हैं ,
देखें कब बूंदों के सोंधेपन से
कब रिमझिम बारिश की फुहारों से
ना जाने कब अँधेरों में टिप-टुप
दूसरे ही पल तैश में आकर
ऊष्मा पुनः अपना रौब दिखाती है ,
लगे हण्टर सी तपन सूर्य की
रेत सी वसुंधरा तड़फड़ाती है
नभ पर लगी सबकी है टकटकी
बेहाल हैं जीव-जंतु,वन्य प्राणी
देखें कब ताज़पोशी वर्षा की कराती है
घटा दिग्भ्रमित कर चक्र्व्यूह रचाती है
छलकाओ ना जरा गागर वृष्टि की
सूखे कंठ से मेंढकी टर्रटराती है।
शैल सिंह
रविवार, 16 जुलाई 2017
ग़ज़ल " "कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
टूटी उम्मीदें हैं बरकरार आज भी
भले बदल गए वो आते-जाते मौसम की तरह
इन आँखों में है इंतजार आज भी
कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
आस में दिल है बेक़रार आज भी
दरमियां रिश्तों के खिले फूल से अल्फ़ाज़ जो
कानों में ताज़ी है झंकार आज भी
बहा ना ले आँखों की दरिया का सैलाब कहीं
फ़िक्र यादों का है अम्बार आज भी
कैसे समझाऊँ ख़्वाबों,साज़िशों के बाजार में
दिल हो रहा है शिकार आज भी
ये कैसा फलसफ़ा ज़िंदगी,मोहब्बत-दोस्ती में
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
कविता '' हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी ''
कविता
हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी
इक दिन जाना सबको पास उसी के
भले-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा
रखता ऊपर वाला अन्तर्यामी है ,
मत कहा करो जी तेरा-मेरा
सब यहीं धरा रहा जायेगा
माटी का तन माटी में मिल
इक दिन ब्रह्मलीन हो जायेगा ,
बस ऐसे तत्वों को संग्रह करना
जिससे मिले सुख,आनन्द भरपूर
विवेक की सम्पत्ति बाँट सभी में
संग धैर्य का रखना हथियार सदा
रक्षा कर विश्वास,संस्कार की रखना
रिश्तों में प्रीत की घोल सम्पदा ,
मुख पर ऐसी मुस्कान बिखेरो कि
आँसू तेरी आँखों के होकर भी
बहते ही पराया होकर ख़ूब विहँसे ,
हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी
चलो हम-हम का रिस्ता जोड़ें
इंसानियत,मानवता सबपर भारी
दम्भ हैसियत का सस्ता छोड़ें ,
ज्ञान,सम्मान,श्रद्धा,नम्रता,दया
प्रार्थना,विश्वास अदृश्य भले हों पर
कर देते असम्भव को भी धूसर हैं ,
वसीयत,भोग-विलास,विरासत में
कभी ना भूलें कर्मों की प्रधानता
परमपिता रखते हिसाब-किताब सब
जिनके कर्मों में होती सदा महानता।
गुर---गुण
शैल सिंह
शनिवार, 1 जुलाई 2017
कविता एक शहीद की पत्नी की दारून व्यथा
एक शहीद की पत्नी की दारून व्यथा
डाल ओहार ताबूत तिरंगे की
अर्थी आई पिया की मैं सन्न रह गई
जन सैलाब का उमड़ा हुज़ूम दर
देख शव संग पिया की मैं सन्न रह गई ,
ख़त का मजमून पूरा पढ़ा भी न था
शहादत की खबर यूँ बता दी गई
थे जिनके लिए बेसबर दो नयन
झट चंन्दन की चिता सजा दी गईं ,
राह तकती महावर लगी एड़ियां
सुर्ख हीना हथेली रची रह गई
गजरे की लड़ियों गूंथीं वेणियां
सेज फूलों सजी की सजी रह गई ,
तोड़ बिखरा गईं कांच की चूड़ियां
झट माथे की बिंदिया मिटा दी गई
मेरे सिंगार के सारे असवाब भी
धू-धू करती चिता में जला दी गईं ,
श्वेत वस्त्रों का अभरण पेन्हाया गया
स्वर्णाभूषण वदन से हटा दी गईं
चाँद से मुखड़े पर थी भरी माँग जो
टार घूँघट झट लाली उठा दी गईं ,
टूटा कैसा क़हर मुझपे हा जिन्दगी
ज़िन्दगी भर को बिधवा बना दी गई
ओढ़ जाऊँ कहाँ लिबास वैधव्य का
शोक संग जब सगाई करा दी गई ।
मिली कैसी सजा मेरे जाबांज़ को
जवां ज़िन्दगी वतन पर लूटा दी गई
देशभक्त सीमा प्रहरी की ये दुर्दशा
मेरी हसीं देखो दुनिया मिटा दी गई ,
एक क़तरा गिरा देश की आँख से
दो बूँद श्रद्धांजलि की बस चढ़ा दी गईं
लुटा संसार मेरा सदा के लिए
सैनिक पिया की कृतियां भूला दी गई ।
ओहार--परदा , वेणियां--चोटी ,
असवाब--सामग्री ,
शैल सिंह
रविवार, 4 जून 2017
गर्मी पर कविता '' हे सूरजदेव तरस खाओ ''
हे सूरजदेव तरस खाओ
अकड़ इतनी नहीं अच्छी
जरा तेवर को वश में रखो
भीषण ताप से झुलसाना
दिनकर कलेवर पास में रखो ,
भाती भोर की शीतलता
उजाला दिन का,सूरज जी
बनकर अग्निपिण्ड का गोला
मचाते क्यूँ हड़कम्प लपट से जी,
कड़कड़ाती धूप का क़हर
वदन है आग सी झुलसे
हे सूरजदेव तरस खाओ
घटा अम्बर से अवनि बरसे ,
इस मनमौजी प्रकोप से कब
बताओ निज़ात दिलाओगे
कब बारिस की फुहारों से
दहक तन की मिटाओगे
पौधों को मार गया लकवा
खड़े निर्जीव क्यारी में
पांखी उन्मुक्त पड़े दुबके
नीड़ों की चारदीवारी में ,
लगता जान ले लेगी
असहनीय ऊफ्फ़ ये गर्मी
बताओ लाओगे कब मानसून
चिलचिलाती धूप में नरमी
जीना हो गया दूभर
लिसलिसाता तन पसीने से
तेरे लू के थपेड़ों की
तीखी मार से बेहाल
तमतमाना छोड़ बिछाओ ना
घुमड़ते घन का महाजाल
तेरी ऊष्मा से सैर-सपाटे
चौपट अवकाश गर्मी की
सुबह अलसाई बड़ी होती
कड़ी दोपहरी गर्मी की ,
हे इन्द्रदेव निमन्त्रण देते
तुझे बाग़,तड़ाग,पशु,पक्षी
सूखे ताल,तलैया,पोखर
प्यासी मीन दरकती धरती |
शैल सिंह
सोमवार, 29 मई 2017
'' माँ पर कविता ''
'' माँ पर कविता ''
सबसे प्यारी सबसे न्यारी
पूज्यनीया है माँ
माँ से बढ़कर दुनिया में
नहीं कोई बड़ा इन्सान
माँ के आगे सब कुछ बौना
बौना लगे भगवान
माँ दुनिया की पहली अवतरण
जिसे कहते हैं माँ
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,
माँ शब्द शहद से मीठा
आत्मीयता सोम सी माँ की
माँ सृष्टि सृजन की रचईता
सारे अनुष्ठान चरण में माँ की
सबसे बड़ा तीरथ माँ का दर्शन
चारों धाम परिधि में माँ की
माँ त्याग,तपस्या करुणा की देवी
पूजा,मन्त्र है जाप जहाँ की
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,
तेरे गर्भ के गहन प्रेम की
उपलब्धि मैं माँ
तेरे बिना कहाँ सम्भव था
कितनी पीड़ा दर्द सहा के
सारी दुनिया तुझमें समाई
कभी कर्ज़ चुके ना माँ का
तेरा आँचल सुख का सागर
मुझको लोरी गाकर
तेरे आँचल की छाँव में छलका
निस दिन स्नेह का गागर
भींच सीने में सिर सहलाई
खिली अंक में मुझे लिटाकर
अतुलनीय तेरी ममता,मुझपे
जीवन सहर्ष न्यौछार दिया
कर्तव्य निर्वहन की बेदी पर
तुझ सा नहीं बलिदानी कोई
न तुझ सा माँ कोई उदार,
इतना बड़ा संसार
सबसे अमूल्य तोहफ़ा ईश्वर की
कैसे शब्दों में बाँधूँ माँ को
सहा ना जाने कितनी मुसीबत
कभी आंच न आने दी मुझको
सबसे सुन्दर माँ की रचना
सर्वस्व लूटाकर बरसाई बस
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,
कहाँ मिले तरुवर तले रे माँ
तेरे आँचल सी मीठी छाया
निःस्वार्थ न तुझ सी माया
गीली शैय्या सोकर तूने
दिया आँचल का नरम बिछौना
तेरे अंश को नज़र लगे ना
दिया काजल का चाँद ढिठौना
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,
तेरी उँगली पकड़ सीखा चलना
तूं ही मेरी पहली प्रशिक्षक
तुझी से सीखा बोलना हँसना
हर मुश्किल में तूं संग मेरे
हर जिद पूरी तुझसे
गलत सही का फ़र्क भी जाना
तेरी बतलाई सीख से
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,
भले तूं ओझल दृग से
तेरे एहसास की ख़ुश्बू तन में
हर पल महसूसती आज भी
तेरी मौजूदगी माँ कण-कण में
तेरे स्पर्श को तरसें बांहें
अँकवार में भरकर रोने को
ढूंढ़ रहे तुझे नैन विक्षिप्त हो
घर के कोने-कोने को
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम |
ढिठौना --नजर न लगे इसलिए काजल का टीका
शैल सिंह
मंगलवार, 23 मई 2017
राम मन्दिर पर कविता
मुख़्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी से राम भक्तों की गुज़ारिश
राम मन्दिर पर कविता
भज-भज के सब राम के नामसाध रहे बस अपने काम
राम के दिन कट रहे छतरी में
भिंगो रहीं बारिश की बूँदें
तपा रहा तन घाम
हवा का निर्मम सह आघात
सहा ना जाये राज में तेरे
योगी जी राम का ये अपमान
जल्दी से करवाओ बाबा जी
राम मन्दिर का आलीशान निर्माण ,
भौंकने वाले भौंकेंगे
उन्हें भौंकने दीजिये योगी जी
इस बात पे जल्दी अमल कीजिये
साथ में लेकर मोदी जी,
कहीं लक्ष्य अधूरा रह ना जाये
असली गर्भ गृह पर ही मंशा,हो
राम मन्दिर का आलीशान निर्माण ,
अत्याचारी बाबर की निर्मम बर्बरता
विध्वंस थी की रघुवंशी भव्यता
इसपर क्यों मचा विवाद,बवाल ,
थे लिए राम जी अद्द्भुत अवतार
अयोध्या नगरी हिन्दू धर्म का धाम,हो
राम मन्दिर का आलीशान निर्माण ,
कुछ से तो मोर्चा लेना होगा
कुछ से वार्ता का प्रावधान
दरकिनार कर देशद्रोहियों को
करना है तर्ज़ पर सोमनाथ के काम
यही सुनहरा अवसर योगी जी
क्यों देना किसी को कोई तथ्य प्रमाण
थे मर्यादा पुरुषोत्तम राम महान,हो
राम मन्दिर का आलीशान निर्माण ,
जिद छोड़ बाबरी मस्ज़िद का
छोड़ आक्रांता बाबर का गुणगान
सहभागिता निभाएं उदार हृदय कर
इक अत्याचारी की कारगुजारी पर
हो बंद अब तो बखेड़ा,क़त्लेआम
राम मन्दिर का आलीशान निर्माण |
शैल सिंह
शनिवार, 6 मई 2017
योगी जी पर कविता
योगी जी पर कविता
महर्षि रूपी मोती लाये मोदी जी खंगाल के
गरजता जो सिंह सा औ दहाड़ता है शेर सा
वह ऐसा कर्मयोगी करता हिन्दुत्व की पैरवी
जिसपे जनता हुई न्यौछावर मुग्ध राग भैरवी ,
ऐसा कोहिनूर जाँच-परख़ ला सौंपा जौहरी
स्वधर्म का हिमायती फ़िदा जिसपे फ़िज़ाएं ,
विरोधी तत्व ठप्पा लगाते सम्प्रदायवाद का
बुधवार, 3 मई 2017
'' कविता '' , '' वीर शहीदों के खूँ का बदला ''
वीर शहीदों के खूँ का बदला
अब सही न जाये हानि जी
थोड़ा करने दो मनमानी जी
जल्द खुली छूट दो मोदी जी
सर ऊपर हो गया पानी जी
सेनाओं का बढ़ा मनोबल
करने दो उत्पात तूफानी जी ,
कड़ी धूप के भीषण ताप में भी
डटा रहूँगा असह बरसात में भी
चाहे सर्दी की हो जैसी ठिठुरन
तूफांन,बवंडर की रात में भी
डिगा रहूँगा सीमा पर सीना ताने
दुश्मन बैठा हो चाहे घात में भी ,
डर नहीं बम,गोली बौछारों से
वतन की ख़ातिर मक्कारों से
चाहे भूख बिलबिला दे आहारों से
दर्द सह लैस रहूँगा औज़ारों से
जब तक तन आख़िरी सांस रहेगी
दहलाऊँगा खंग की टंकारों से ,
कभी पग पीछे नहीं हटाऊँगा
चाहे कितनी भी हों दुर्गम राहें
चप्पा-चप्पा आखों की गिरफ़्त में
रखूँगा दुश्मनों पर पैनी निगाहें
वीर शहीदों के खूँ का बदला
लूंगा आस्तीन चढ़ाकर दोनों बाँहें ,
हद कर दी पाक ने बर्बरता की
हमने मानवता की सजा ये पाई है
हमारे निर्दोष प्रहरियों की मोदी जी
देखो सिर कटी लाश घर आई है
हमें भी सर काट शत्रु के गेंद खेलना
जिद से भारत माँ की कसम खाई है ,
खौल रहा ख़ून बेसब्र धमनियों में
गर इक बार ईशारा मिल जाये
तबाही का ऐसा दिखलाऊँगा तांडव
कि पाकिस्तान की धरती थर्रा जाये
फिर पिशाच का पिल्ला तरेरकर
मजाल आँख उठाने की जुर्रत कर जाये |
शैल सिंह
गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
'' हम प्रेम का वृक्ष लगाएं ''
कविता
विनम्रता और सहजता लाएं हम सब अपने जीवन में
क्यों तोड़ते जा रहे नित हम मानवता की परिपाटी को
अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रहार संवेदना के ढाँचे पर
उष्ण होती हृदय की तरलता,सामंजस्य का होता ह्रास
उदारता,सहिष्णुता,त्याग,दया का ,उर मरुस्थल होता आज
प्रेम स्वरूपा प्रकृति से कुछ नहीं सीखा हम सबने
निःस्वार्थ भाव से वृक्ष सदा हमें फल-फूल दिया करते हैं
फलों से लदी डालियाँ सदा झुकी शालीन क्यों रहती हैं
बिना शुल्क नदियां हमें सदा जल देती रहती हैं
फिर भी नहीं कभी कोई उलाहनें देती हैं
इनकी मौन प्रवृति से प्रेरित हो हम प्रेम का वृक्ष लगाएं
नदी की देख दानशीलता हम प्रेम की नदी बहायें
सबसे कठिन है प्रेम सभी से कर पाना और निभाना
पर प्रेम जरुरी जीवन में,हम समरसता की पौध उगाएं
अभिमान,घमंड,अहंकार से जीवन नरक बन जाता है
करुणा,संवेदना,परमार्थ,सौहार्द्र से हम जीवन स्वर्ग बनायें |
शैल सिंह
शनिवार, 15 अप्रैल 2017
अन्तर्चेतना की दृष्टि तो खोलो
अन्तर्चेतना की दृष्टि तो खोलो
हर हाल में दोनों ही देते संत्रास
सुख में ईर्ष्या दुःख में उपहास,
ऐसी हुई अवधारणा आज की
सम्बन्धों में आ रही ख़टास
अन्तर्चेतना की दृष्टि तो खोलो
जग वालों ना यूँ रहो उदास ,
निश्छल मन से सम्बन्धों को
जोड़-जोड़ करो हास-परिहास
समानता के पथ पर चल कर
मानवीय उदारता का दो आभाष ,
सर्वमंगल की करो कामना
रखो परोपकार का मन में वास
स्वहित से तुम ऊपर उठकर
स्वार्थ,संकीर्णता को दो वनवास,
इसी में सबका सुख निहित है
व्यापक भावनाओं से भरें उजास
जीवन दो दिन का ना विषम बनाएं
जाना सभी को परमात्मा के पास ।
शैल सिंह
मंगलवार, 11 अप्रैल 2017
'' हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में ''. एक मधुर गीत
कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,
लगे वीरां-वीरां मुझे शहर
हवा गुलिस्तां से भी रूठ गयी
अजनवी लगे हर गली डगर
फब़े न जिस्म लिबास भरी तरूनाई में
अब वो आबोहवा रूवाब नहीं अरूनाई में,
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,
कभी ख्वाब ना देखा और कोई
तेरी याद में गुजरी शामों-सहर
दूजा शौक ना पाला और कोई
खनखन बोले ना चूडी़ सूनी कलाई में
रूनझुन पैंजनी भी ना झनकी अंगनाई में,
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,
हमें दर्द का तोहफा मुफ्त मिला
ख्वाहिशों पे पहरे लगे दहर के
मौसम भी रंग बदला यही गिला
हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में
जहर लगे है कूक कोईल की अमराई में,
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,
किरनों की तरह बिखरा जलवा
तेरे शुष्क मिजाज से हैरां दिल
आनंद नहीं महफिलों की रंगों रूबाई में
थिरकन में भी लोच न जो धुन हो शहनाई में ,
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में ।
गुरुवार, 6 अप्रैल 2017
भजन
'' भजन ''
भगवन तुम तो बसे हो मन-मन्दिर
ईंट-पत्थरों के शिवाले क्यूँ जाऊँ
जब मन के नगर में तेरा महल
क्यूँ चौखट-चौखट सर टकराऊँ ,
तेरा रूप धार ली काया मेरी
प्रतिदिन अंग भभूत लगाऊँ
रच-बस गए हो प्रभु तुम मुझमें
नख-शिख रोम-रोम सुख पाऊँ ,
याचनाओं का अर्ध्य भेंट दी
दु:ख का मृगछाल बिछाऊं
निशि-वासर हूँ लीन भजन में
दीन-दशा का भोग चढ़ाऊँ ,
तेरे पांव पखारें नीर नयन के
दुःख की गागर छलकाऊँ
कहीं छवि ओझल ना जाये
डर से पलकें ना झपकाऊँ ,
तुम ध्यान मग्न मेरे उर गह्वर में
क्यूँ गुफ़ा कंदरा मन भटकाऊँ
जब मुझमें समाहित तुम प्रभुवर
क्यूँ दर-दर की जा ठोकर खाऊँ ,
एक बार नज़र तूं फेरे इधर
क्यूँ मन्दिरों की घण्टी खटकाऊँ
जब नज़रबन्द कर लिया तुझे
दिन रात दरश तेरा पाऊँ ,
शैल सिंह
गुरुवार, 16 मार्च 2017
होली अबकी बार
मोदी जी की जीत पर
होली अबकी बार
बेदाग छवि पे मेहरबान जनता हुई निहाल
उन्मत्त उमंगों की होली होगी अबकी बार
नाना नवरंगों के गुलाल,उड़ेंगे अबकी बार
शेर,हुंकार भरेगा दुबकेंगे रंगे सभी सियार
नमो-नमो जयकार में चित हैं सब भौकाल
किसी की बम्पर हार तो कोई हुआ बीमार
रंग अबीर पिचकारी ख़ुशी से गाल हैं लाल
कितने वर्षों बाद देश में आया ऐसा भूचाल
सात समंदर पार चर्चा,मोदी नाम बेमिसाल
शैल सिंह
बुधवार, 8 मार्च 2017
नारी दिवस पर
नारी दिवस पर
मैं शक्तिस्वरूपा नारी जननी सम्पूर्ण जगत कीत्याग,दया,ममता की मूरत गौरव निज संस्कृति की
मैं लक्ष्मी,दुर्गा,सरस्वती हूँ अवतार अनवरत शक्ति की
युग निर्मात्री लिए सीमाएं,लक्ष्मण रेखाएं क्यूँ बनीं प्रकृति की
सीता,द्रौपदी,गंगा,कुन्ती को कीं कलुषित मानसिकता कुत्सित की
वही सबल बन अबला निष्ठुर जग की निर्मम अवरोधों को खंडित की
सह समाज के विषम थपेड़े नियति से लड़ खुद लिए उसने नव राह सृजित की
उड़ रही गगन में,हर क्षेत्र में बढ़-चढ़ हिस्सा स्वयं स्वरूपा ख़ुद को महिमामंडित की ।
शैल सिंह
शनिवार, 4 मार्च 2017
वसंत ऋतु पर कविता
वसंत ऋतु पर कविता
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना
थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी
मौसम बड़ा सुहाना ,
इंद्रधनुष ने खींची रंगोली
सज गई मधुऋतु की डोली
बिखरा दी अम्बर ने रोली
धरती मांग सजा खुश हो ली
छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश
कलियाँ घूँघट के पट खोलीं
आई ठूँठों पे तरुणाई
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना।,
देख हरित धरणी का विजन
हुआ मन मयूर मस्ताना
पीली चूनर सरसों लहराई
उसपे तितली का मंडराना
पी मकरंद मस्त भये मधुकर
मद में मगन दीवाना
गूंजे विहंगों की किलकारी
कुञ्ज-कुटीर मलय भर जाना ,
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
अमराई महके बौराई
मधुकंठी तान सुनाये
देख वासन्ती मादकता नाचे
वन,वीथिक मयूरा बौराये
पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि
नशीला गन्ध जिया भरमाये
पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले
सुध विरहन को पी की सताये ,
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
चित चकोर तिरछी चितवन से
अपने सजन से करे निहोरा
मूक अधर और दृग से चुगली
करे दम-दम सिंगार-पटोरा
प्रकृति नटी भरे उमंग अंग औ
वाचाल कंगना हुआ छिछोरा
बूझे ना अनुभाव बलम अनाड़ी
कंचन देह अंगार दहकावे मोरा ,
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
`
वासन्ती दुपहरिया में गर
संग प्रियतम मेरे होते
प्रीत रंग में नहा सराबोर
हम सारा अंग भिगोते ,
धारे पीत-हरा रंग धरा वसन
चिरयौवन दिखलाये
बहे उन्मादी फागुनी हवाऐं
चाँदनी उर पे बरछी चलाये ,
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
लगे नववधू सी वसुधा
सूरज प्रणय निवेदन करता
अवनि हुलास से इठलाये
होंठों पे शतदल खिलता ,
टेसू,गुलाब,हरसिंगार,पलाश
मौली,कचनार पे पवन है रीझता
मनमोहक बिछा है इन्द्रजाल
दिग-दिगन्त सौन्दर्य दमकता ,
बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ।
शैल सिंह
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017
चुनावों की बेला में ,मेरी ये कविता
एक विनम्र निवेदन देश की जनता से
हमें विश्व गुरु है बनना हर मन सपना ये बुनवाना होगाअराजकता,अत्याचार,अनाचार का कोढ़ दूर भागना होगा
राष्ट्रीय पुष्प का कर अभिनन्दन बहुमत का अर्ध्य चढ़ाना होगा
ईमानदारी,नैतिकता,जनसेवा हित कमल का फूल खिलाना होगा ,
हिंदुस्तान के हिन्दुओं को अकल तभी अब आएगी
जब उसकी ही सरजमीं पर फसल दूजी क़ौम उगायेगी
ग़र नहीं चेता हिन्दू अब भी मिट जायेंगे हम अपने ही चारों धाम से ,
गढ़-गढ़ में कमल खिला दे जनता ग़र यूपी के कीचड़ में
चोर,उचक्के सारे माफ़िया बंद हो जायेंगे जेलों के सीकड़ में
ना गुंडागर्दी हत्या,बलात्कार ना होगा कैराना,दादरी जैसा काण्ड
ना एक मंच पर सांठ-गांठ कर खड़े होंगे साथ फिर सारे भड़ुवे भांड़ ,
हाथी,पंजा,साईकिल ने बना दिया जैसे यूपी को चम्बल
मज़हब की दीवार खड़ी कर करवाते रहे आपस में दंगल
इक थैली के चट्टे-बट्टे बन गए सियासत कर इक दूजे के संबल
मेधावों को कर दरक़िनार सदा वर्ग विशेष का ये करते रहे सुमंगल ,
कितना जाति,धर्म के दाँवपेंच का देना होगा प्रमाण
सर्वधर्म,समभाव,सर्वांगीण विकास का तभी होगा निर्माण
जब हर तबके के लोग होंगे मोदीमय,धर्मों,वर्णों का होगा कल्याण
लोकतंत्र के इस महापर्व को विवेक के रंग से रंगना होगा
राष्ट्रहित के लिए जन-मन को यूपी का भविष्य नया रचना होगा
हर मज़हब के हिंदुस्तानी बाशिन्दों तुम्हें भारत माता कहना होगा
कश्मीर से कन्याकुमारी के दुर्ग को केसरिया भगवा रंग से भरना होगा ,
सोने की चिड़िया गुमसुम बैठी राजनीति की शाख़ पर
धधक रही धरा हिन्द की ज़हरीली जाति,मज़हब की आँच पर
तिलमिला उगलते विष सदा विरोधी आग क्यों लग जाती साँच पर
देशद्रोहियों,गद्दारों के मनसूबों के महल गिराने होंगे
जाति,धर्म का ज़हर उतार गुमराहों को सिरे से समझाने होंगे
लाना अमन-चैन ग़र रामराज्य हम सबको सारे मतभेद मिटाने होंगे
मनभेद कराने वाले चालबाजों को इस चुनावी संग्राम में धूल चटाने होंगे।
जय हिन्द ,जय भारत
शनिवार, 21 जनवरी 2017
तुम कहाँ हो बोलते
घातक तुम्हारा मौन है ,
तुम कहाँ हो बोलते
बोलती तुम्हारी चुप्पियाँ हैं
मौन की भाषा अबोली
कह देतीं मन की सूक्तियां हैं ,
इतनी विधा के भाव समेटे
अधर विराम चिन्ह क्यों हैं
शब्दों को रखते मापकर
स्वभाव इतना भिन्न क्यों है,
क्या-क्या उधेड़ बुनकर
दिन रात तुम हो जी रहे
कौन सा ऐसा गरल जो
मौन घोंट कर हो पी रहे,
मौन तो हो तुम मगर
बोलती देह की भित्तियां हैं
किस खता पे सौगंध तुमको
बन रही कड़वी पित्तियाँ हैं,
किताब भर ब्यौरा समेटे
क्यूँ रखते अधर के बंद पट
अंदाज की चंठ झाँकियाँ
झाँकतीं नैन के पनघट,
जब कभी गर खोलते हो
भानुमति का बंद पिटारा
बस गोल मोल बोल करते
चन्द सा अस्फुट निपटारा,
जीने लिए इस किरदार को
मजबूर क्यों हो बोल दो
चुपचाप की इन खिड़कियों को
भड़भड़ाकर खोल दो,
मूल्यवान मेरे हजारों शब्द से
मौन की कुपित दृष्टियां हैं
आत्मज्ञान की तुम खोज में
मगर रहतीं तनी भृकुटियां हैं ,
वास्ता मुझसे अगर है
मैं वजह हूँ मौन की
तो ओ विरागी पूछती हूँ
ढीठ बन मैं कौन हूँ,
तुम बंद सीपी की तरह
मैं प्रश्नों का बादल हूँ बस
ग्रीवा के हाँ,ना उत्तरों से
छीज-खीझ घायल हूँ बस,
कभी मौन कड़के बिजलियों सी
अन्तर्द्वन्द की कुण्डी तोड़कर
जलजला इक छोड़ मौन
फिर चुप की चुन्नी ओढ़कर,
देख नयन की घन घटा भी
फर्क नहीं पड़ता कोई
गुम रहते तुम अपनी घुन में
इस ढंग पे मैं कितना हूँ रोई,
जिंदगी के लघु मंच पर
मन में कितनी गुत्थियाँ हैं
मन के तल का शोर झंकृत
कर देतीं भाव वृत्तियाँ हैं,
अब नहीं मोहताज हूँ मैं
कि हँस के जरा तुम बोल दो
कर ली ख़ुशी के औज़ार ईज़ाद
मत कहना कि इसकी पोल दो,
इस मौन से भली कविता मेरी
इस चुप से सुन्दर लेखनी
कोरे कागज़ों से मेल कर
फूंक-फाँक ली मन की धौंकनी ,
चंठ --बदमाश
मेल -- दोस्ती
शैल सिंह
सोमवार, 16 जनवरी 2017
देशभक्ति गीत
एक देशभक्त सिपाही के उद्वेग का वर्णन गीत वद्ध कविता में ,
मत प्रिये राह रोको कर दो ख़ुशी से विदा
भाल पर मातृ भूमि का रज-कण दो सजा
दिल पे खंजर चलातीं हरकतें दुश्मनों की
लेना सरहद पे बदला हर बलिदानियों का ,
है पिता का आशीष गर दुआ साथ माँ की
प्रिये होगी विजय मुश्किले हर हालात की
रखना इंतजार का दीया दिल में जलाकर
सलामत रहा होगी बरसात मुलाक़ात की ,
अश्कों के बाल दीप ना बुज़दिल बनाओ
ना कजरे की धार की ये बिजली गिराओ
पिघल न जाये कहीं मोम सा दिल ये मेरा
विघ्न के इस प्रलय की ना बदली बिछाओ ,
महबूब ये वतन तेरा वतन से प्यार करना
वतन की आबरू लिए सुहाग वार करना
माँग अपनी संवारो संकल्प के सामान से
कंगना कुंकुम ना रोको न मनुहार करना ,
आरती के थाल आज़ सम्मान से सजाओ
धरा पलकें बिछा पथ निहारती सपूत का
फर्ज़ का यह कटघरा न मुज़रिम बनाओ ,
है ललकारता नसों में नशा इन्क़लाब का
तूफां से लड़ते देखना कश्ती के ताब का
व्यर्थ ये जनम जो वतन के काम आये ना
व्यर्थ रक्त शिराएं जिसमें उबाल आये ना ,
मक्कारियों से दुश्मनों के आजिज़ हैं हम
बार-बार क्यूँ हुए शिकार साज़िश के हम
हौसलों के आग से तबाह करना शत्रु को
भेंजो रणसमर न नैन कर ख़ारिश में नम ,
जीना मरना राष्ट्र हित लिए आरजू है मेरी
कर्ज़ माँ का फ़र्ज निभाऊँ जुस्तजू है मेरी
मौत आये ग़र अर्थी पर कफ़न हो तिरंगा
शहादत पे सुनना आख़िरी गुफ़्तगू ये मेरी ,
ये तन समर्पित सरज़मीं पे देश प्राण मेरा
ऐसा बनूँ मैं प्रहरी लगे सारा आवाम मेरा
रखूँ अखण्ड देश को मैं लाल भारती का
माँ भारती की आन पर कुर्बान जान मेरा ,
वतन पे मिटने वालों दिल से तुम्हें सलाम
मिटना हमें क़ुबूल ज़िन्दगी वतन के नाम
वफ़ा की मेरे खुश्बू सने माटी में वतन के
शौर्य,शूरवीरता पे मिले हमें बस ये इनाम।
शैल सिंह
रविवार, 8 जनवरी 2017
नव वर्ष पर कविता
भय,आतंक से मुक्त हो नया साल ये
नव वर्ष तेरा अभिनन्दन कर
किया जग बेसब्री से इन्तज़ार
नव वर्ष तेरा शत वन्दन कर ,
ठसक से नवागत साल ले आना
नेमतें नई खुशियों की नियामतें
पर्यावरण,देश,समाज का विकास
है नवीन श्रृंखला में हमें तराशने ,
तुझसे उम्मीदें ख़ुशियों के सौगातों की
मंशा कारनामों के नए-नए आयामों की
पुलकित मन उल्लसित हर्षित जीवन हो
महकें दसों दिशाएँ नूतन निर्मित कन हो
ठहरे हुए वक्त को पर लग जाये
नवागत वर्ष में जन-जन का उत्कर्ष हो
धर्म,मज़हब की पट जाये गहरी खाई
फिर ना सियासत,नफ़रत सा संघर्ष हो ,
भ्र्ष्टाचार,ग़रीबी,फ़रेब,अन्याय का
प्रेम,सौहार्द,स्नेह भाव से हो निष्कर्ष
हिंसा,द्वेष,घृणा,निराशा,दुर्घटना को
नव प्रभा निगल ले ऐसा हो नव वर्ष
भय,आतंक से मुक्त हो नया साल ये
दंगा,फ़साद,क़त्ल ना कोई बवाल हो
नया साल हो तेरा ऐसा पूण्य आगमन
बढ़े प्रभुत्व देश का हर का ख़याल हो ,
नित नव रंग भरो जीवन के उपवन में
नवीन चेतना,ईमान का करो जागरण
विमल हृदय,मनोवृत्ति हो सकारात्मक
श्रम,निष्ठा,परोपकार का भरो आचरण ,
दुःख-दर्द,पीड़ा,कटुता,कलेश हर लेना
भाईचारे,सद्दभाव की चादर फहराकर
अनसुलझी सुलझाना पिछली पहेलियाँ
सुख समृद्धि बरसा देना नीहार हटाकर।
नीहार--धुंध,कुहासा
शैल सिंह
बे-हिस लगे ज़िन्दगी --
बे-हिस लगे ज़िन्दगी -- ऐ ज़िन्दगी बता तेरा इरादा क्या है बे-नाम सी उदासी में भटकाने से फायदा क्या है क्यों पुराने दयार में ले जाकर उलझा रह...
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नई बहू का आगमन छोड़ी दहलीज़ बाबुल का आई घर मेरे बिठा पलकों पर रखूँगी तुझे अरमां मेरे । तुम्हारा अभिनंदन घर के इस चौबारे में फूल ब...
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बे-हिस लगे ज़िन्दगी -- ऐ ज़िन्दगी बता तेरा इरादा क्या है बे-नाम सी उदासी में भटकाने से फायदा क्या है क्यों पुराने दयार में ले जाकर उलझा रह...
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ग़ज़ल---- जो लफ़्ज़ों में बयां ना हो वो आॉंखों से समझ लेना कि करती हूँ मोहब्बत कितना तुमसे वो समझ लेना मुझको दीवानगी की हद तक मुहब्बत हो ग...