Saturday, 21 January 2017

तुम कहाँ हो बोलते

सर्प दंश से भी बढ़ कर
घातक तुम्हारा मौन है ,

तुम कहाँ हो बोलते
बोलती तुम्हारी चुप्पियाँ हैं
मौन की भाषा अबोली
कह देतीं मन की सूक्तियां हैं ,

इतनी विधा के भाव समेटे
अधर विराम चिन्ह क्यों हैं
शब्दों को रखते मापकर
स्वभाव इतना भिन्न क्यों है,

क्या-क्या उधेड़ बुनकर
दिन रात तुम हो जी रहे
कौन सा ऐसा गरल जो
मौन घोंट कर हो पी रहे,

मौन तो हो तुम मगर
बोलती देह की भित्तियां हैं
किस खता पे सौगंध तुमको
बन रही कड़वी पित्तियाँ हैं,

किताब भर ब्यौरा समेटे
क्यूँ रखते अधर के बंद पट
अंदाज की चंठ झाँकियाँ
झाँकतीं नैन के पनघट,

जब कभी गर खोलते हो
भानुमति का बंद पिटारा
बस गोल मोल बोल करते
चन्द सा अस्फुट निपटारा,

जीने लिए इस किरदार को
मजबूर क्यों हो बोल दो
चुपचाप की इन खिड़कियों को
भड़भड़ाकर खोल दो,

मूल्यवान मेरे हजारों शब्द से
मौन की कुपित दृष्टियां  हैं
आत्मज्ञान की तुम खोज में
मगर रहतीं तनी भृकुटियां हैं ,

वास्ता मुझसे अगर है
मैं वजह हूँ मौन की
तो ओ विरागी पूछती हूँ
ढीठ बन मैं कौन हूँ,

तुम बंद सीपी की तरह
मैं प्रश्नों का बादल हूँ बस
ग्रीवा के हाँ,ना उत्तरों से
छीज-खीझ घायल हूँ बस,

कभी मौन कड़के बिजलियों सी
अन्तर्द्वन्द की कुण्डी तोड़कर
जलजला इक छोड़ मौन
फिर चुप की चुन्नी ओढ़कर,

देख नयन की घन घटा भी
फर्क नहीं पड़ता कोई
गुम रहते तुम अपनी घुन में
इस ढंग पे मैं कितना हूँ रोई,

जिंदगी के लघु मंच पर
मन में कितनी गुत्थियाँ हैं
मन के तल का शोर झंकृत
कर देतीं भाव वृत्तियाँ हैं,

अब नहीं मोहताज हूँ मैं
कि हँस के जरा तुम बोल दो
कर ली ख़ुशी के औज़ार ईज़ाद
मत कहना कि इसकी पोल दो,

इस मौन से भली कविता मेरी
इस चुप से सुन्दर लेखनी
कोरे कागज़ों से मेल कर
फूंक-फाँक ली मन की धौंकनी ,

चंठ --बदमाश
मेल -- दोस्ती
                         शैल सिंह