Thursday, 14 September 2017

मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए

मेरी आंँखों का पीके मय
सभी मदहोश बैठे हैं
नशा नस-नस तरल कर दी
सभी खामोश बैठे हैं,

पलकें हो गईं शोहदा
झपकना भूल बैठी हैं
जब से आई हूँ महफ़िल में
सभी खो होश बैठे हैं,

गर हो तालियों की गूँज
तो भंग तन्द्रा सभी की हो
महफ़िल हो उठे जीवन्त
करतल ध्वनि सभी की हो,

बंधन खोल हथेली का
सुर साजों से नवाजें गर
हो अन्दाजे-बयां माहौल
वाह-वाह धुन सुना दें गर,

शब्दों से करूं सराबोर
महफ़िल हो जाए गदगद
गर दें हौसला रंच भी
मन के तार छेड़ूं अनहद,

गणमान्य अतिथियों का
करूं भरपूर मनोरंजन
दर्शक दीर्घा में बैठे सज्जनों
करुं शत-शत नमन बन्दन ‌।
                     शैल सिंह