Monday, 17 July 2017

मेघ से उलाहना

'' मेघ से उलाहना ''



उमड़-घुमड़ घनघोर घटा
नखरे दिखा लौट जाती है
चाहत का उल्लंघन कर
मन भर जी को जलाती है ,

देखें कब बूंदों के सोंधेपन से
भरेंगे नथुने सरगोशी कराती है
कब रिमझिम सुरों से हर्षोन्माद
जगेंगे धरा बुदबुदाती है ,

न जाने कब अँधेरे में टिप-टुप
कुछ बूंदा-बांदी गिराती है
दूसरे ही पल तैश में आकर
ऊष्मा पुनः रौब दिखाती है ,

लगे हण्टर सी तपन सूर्य की
रेत सी धरती तड़फड़ाती है
लगी नभ पे सभी की टकटकी
छोड़ ऐंठन क्यों भाव खाती है ,

बेहाल जीव-जंतु वन्य प्राणी
आस के मंच ताजपोशी कराती है
जरूरत के मुताबिक कब
कभी नाशपीटी रंग में आती है ,

बाढ़ का कहर कहीं मार सूखे की
कभी बेढब व्यवहार दिखाती है
कभी अनहद बरस मनबढ़
सैलाबों में सब कुछ बहाती है ,

सरसा बरस सीना धरणि का 
मिटा पल में ऊष्मा क्यों सताती है
बनती हर जुबां की कोपभाजन 
कड़क-कड़ट भर अवसाद जाती है ,

सुनो गुहार मनहर मेघराज
घटा दिग्भ्रमित चक्र्व्यूह रचाती है 
छलकाओ न गागर वृष्टि की
सूखे कंठ मेंढकि टरटर्राती है,

                               शैल सिंह