Monday, 18 September 2017

तन्हाई पर कविता , " गुजरे मौसम की याद दिलाती "

यादों के शुष्क बिछौने पर
भीगीं-भीगीं सिमसिम रात
तन्हाई से करती बातें
नैनों की रिमझिम बरसात 
जाने कहाँ-कहांँ भटकाती रात ,

पलकों की सरहद तक आ
नींद काफूर हो जाती है
बेचैन रात की आलम का
सिलवट दस्तूर बताती है
उन्नीदी आंँखों में बीति सारी रात ,

हठ करती बचपन की क्रिड़ायें
अबोध अल्ह़ड़पन यौनापन का 
काश कि मुट्ठी में बंद कर रखती
कुछ हसीं पलों के छितरेपन का
कभी बावफा ना होती इतनी रात ,

हर पहर रैन की कातिल होकर 
गुजरे मौसम की याद दिलाती 
बेदर्द वीरानी हमदर्द बन   
रख पहलू में हँसाती और रुलाती
तन्हा और बनाती तन्हाई की रात ,

ना जाने क्यूँ तन्हाई में यादें
ज़िक्र करती हैं पुराने मंजर का
तल्खी और उदासी भर देतीं
काम करती हैं जादू-मंतर का
ख़्यालों में डूबी,उतराई सारी रात
                                 शैल सिंह