Tuesday, 25 July 2017

घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह 

सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं

एक ही हैं भगवान मगर हैं नाम अनेकों गढ़े गए
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,

अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
परब्रम्हपरमेश्वर,एकाकार एक ही हम बतलाओ,

बाँटते तुझे निज स्वार्थ लिए विभिन्न धर्मों-पंन्थों में
अशांति मचा रखे दहशत फैला मुल्कों-मुल्कों में,

गर नहींं समझें अपना रौद्र ता्डव रूप दिखाओ
जिनके उत्पात से त्रस्त सभी गह के वज्र गिराओ,

बड़ा लिया तूने इम्तिहान और देखा खून खराबा
मची नाम पे तेरे मारकाट तूं बैठा है कौन दुवाबा,

आस्था पे तेरी हम मरते जो मांगें जन्नत का प्यार
बस राम मंदिर बनवा दे उनका प्राण हूरों पे वार ।

                                                 शैल सिंह

ये शब्द



जितने भाव उमड़ते उर में
शब्द  जुबां बन  जाते  हैं
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं 
खुद में ढाल जज्बातों को 
मन का सब कह जाते हैं | 

                      शैल सिंह 

Sunday, 23 July 2017

कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर


कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर,

बन्द करो अब रोना बरखा रानी
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,

नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,

कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,

कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,घर भरा सीलन ,

रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी, मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन महके सब हद कर दी ,

जलावतन से बिलें भरीं यकायक
जीव घूम रहे खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,

बहुत हो गई तेरी अति वृष्टि की
बरसो कहीं और जगहें भी सृष्टि की
काबिलियत दिखाओ ऐसी कृति की ।

                          शैल सिंह

Thursday, 20 July 2017

क्रान्तिकारी कविता '' शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ''

क्रान्तिकारी कविता 

हस्त कलम गहते ही भक-भक लगी उगलने छार
शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ,
तोड़ के बंधन विविध भीति के की द्विजिहा ने वार 
चल गई खंजर कागज पे दिल ने जो उगली उद्गार |

परिमिति--सीमा      
 भीति--भय,डर                                        
                      शैल सिंह 

क्रमशः--

जब-जब सांप-सपोलों के,फन हमको फुफकारेंगे
ताल ठोंककर कहते जी,हम मौत के घाट उतारेंगे ,

कबतक मलते रहेंगे हाथ वो घात के पांव पसारेंगे
दूध पिलाया ठर्रा तो जूतमपैजारम से भूत उतारेंगे ,

क्या समझे हो मरदूदों जो जी में आएगा बक दोगे
अभिव्यक्ति की आजादी पे थोबड़ा तोड़ भोथारेंगे ,

संपोला शरण में रहने वाला गर ऐसे आँख तरेरेगा
ज़रा ना होगी देर आँख से आग उगल  भक्ष डारेंगे  ,

अगर शहीद की परिभाषा पड़ी तुम्हें समझानी तो
तत्काल स्वर्ग के रस्ते का सरजाम अनेक संवारेंगे ,

क्यों मुल्क से कर बग़ावत तूं दिखलाता तुर्रा तेवर
औक़ात तेरी बतलाने को तुझे धोधो और कचारेंगे ,

जिस थाली खा छेद उसी में पामर,पिशाच करेगा
राग जपे कृतघ्न गैरमुल्क़ का देखो खाल उधारेंगे , 

जयचंदों की मिलीभगत से आज अशान्त वतन है
गद्दार कर्त्तव्यशून्य मतिमंदों को भी खूब निथारेंगे ,

चौकसी में सेना ग्रास बने साजिश की सरहद पे 
जश्न करे तूं कुढ़कुढ़ खून भरी आँखों से निहारेंगे ,

तूने कर्णधारों,शूरवीरों के कुटुम्बों को बिलखाया 
नहीं,तड़-तड़ गोली बौछारों से भेजा तेरा बुहारेंगे ,

नरपिशाचों,भेड़ियों अम्मीयों ने क्या संस्कार दिए
हरा रंग का चढ़ा फितूर रौंद पांव तले ललकारेंगे ,

ऐ शुभचिंतकों आतंकी रहनुमाओं,सरगनाओं के 
देह नोच निर्दयता से अन्तड़ि भी खींच निकारेंगे ,

कलेजा चाक हुआ है देख क्षतविक्षत जवानों को
सर बाँधा कफ़न तेरे ख़ून से माँ का पांव पखारेंगे ,

दीप तेरा भी होगा गुल हनुमनथप्पाओं के बदले 
क्यूँ उकसाते तेरे पुरखों तक का ताबूत उखारेंगे ,

हद हो गई हद से बाहर हम रट अहिंसा त्यागेंगे
प्रण करते हैं बर्बरता से तेरा अंग-अंग चटकारेंगे ,

आहत बार-बार विश्वास हुई बहुत वंश हम खोये 
ऐसे कृत्य पे किस हर्ष से अंश को तेरे पुचकारेंगे ,

वतन लिए फाँसी एक अशफ़ाक़उल्ला झूल गए
तैमूर के ये दुर्दांत कालिख देश के मुँह पोचारेंगे ,

होते खाक तूम विश्वपटल पर देख धमक हमारी
धाक से तेरी जमीं पे जा केसरिया रंग लहकारेंगे ,

अबतक सभा मौन थी तूने देश का चीर खसोटा
चक्र सुदर्शन धार लिये कृष्णा चूलें तेरी खखारेंगे ,

ऐ नाशुक्र,नपुंसक,नाजायज औलादों गजनी की
करो अनेकों अफजल पैदा बाप को भी पछारेंगे ,

तूं कुरान के निर्देशों को कुकर्मों का ढाल बना़ले
हम गीता रामायण के पावन मन्त्रोचार उच्चारेंगे ,

तुम स्वत: जगाओ जज्बा काफिरों देशभक्ति के 
होश में आओगे तब जब रब ही तुझे धिक्कारेंगे ,

हर क्षण प्राण हदस में तुम भी बैरी से मिल जाते 
शहर सैलानि के अकाल यहाँ कैसे दिन गुजारेंगे ,

बनी अखाड़ा रण की कश्मीर की मनोहर घाटी 
कैसे केसर,इत्र की खुश्बू क्षेत्र फिजां में फुहारेंगे ,

बहुत सहे वार पीठ पे अपने दर्द भी खूब दिए हैं
ओ हूरों के आशिक़ भेजेंगे जब भी कब्र पुकारेंगे ,

                                      शैल सिंह

  









Monday, 17 July 2017

मेघ से उलाहना

'' मेघ से उलाहना ''



उमड़-घुमड़ घनघोर घटा
नखरे दिखा लौट जाती है
चाहत का उल्लंघन कर
मन भर जी को जलाती है ,

देखें कब बूंदों के सोंधेपन से
भरेंगे नथुने सरगोशी कराती है
कब रिमझिम सुरों से हर्षोन्माद
जगेंगे धरा बुदबुदाती है ,

न जाने कब अँधेरे में टिप-टुप
कुछ बूंदा-बांदी गिराती है
दूसरे ही पल तैश में आकर
ऊष्मा पुनः रौब दिखाती है ,

लगे हण्टर सी तपन सूर्य की
रेत सी धरती तड़फड़ाती है
लगी नभ पे सभी की टकटकी
छोड़ ऐंठन क्यों भाव खाती है ,

बेहाल जीव-जंतु वन्य प्राणी
आस के मंच ताजपोशी कराती है
जरूरत के मुताबिक कब
कभी नाशपीटी रंग में आती है ,

बाढ़ का कहर कहीं मार सूखे की
कभी बेढब व्यवहार दिखाती है
कभी अनहद बरस मनबढ़
सैलाबों में सब कुछ बहाती है ,

सरसा बरस सीना धरणि का 
मिटा पल में ऊष्मा क्यों सताती है
बनती हर जुबां की कोपभाजन 
कड़क-कड़ट भर अवसाद जाती है ,

सुनो गुहार मनहर मेघराज
घटा दिग्भ्रमित चक्र्व्यूह रचाती है 
छलकाओ न गागर वृष्टि की
सूखे कंठ मेंढकि टरटर्राती है,

                               शैल सिंह 










उमड़े-घुमड़े उद्गारों की


खो न जाएँ भाव कहीं
कलम हाथ ने गह ली 
दर्द, खुशी, गम ,तन्हाई,
उदासी शब्दों ने पढ़ ली
उमड़े-घुमड़े उद्गारों की
लेखनी नब्ज़ पकड़ ली
अनकही अभिव्यक्ति मेरी
काव्य कड़ी में गढ़ दी
मन की मौन कथा व्यथा
पन्नों पे उसने जड़ दी ।

                    शैल सिंह


Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल " कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की "

ये कैसा नशा प्यार का के बेवफाई के शहर में
टूटी उम्मीदें हैं बरकरार आज भी
भले बदल गए वो आते-जाते मौसम की तरह
इन आँखों में है इंतजार आज भी
कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
आस में दिल है बेक़रार आज भी 
दरमियां रिश्तों के खिले फूल से अल्फाज जो
कानों में ताज़ी है झंकार आज भी
बहा ना ले आँखों की दरिया का सैलाब कहीं
फ़िक्र यादों का है अम्बार आज भी
कैसे समझाऊँ ख़्वाबों,साजिशों के बाजार में
दिल हो रहा है शिकार आज भी
ये कैसा फलसफ़ा ज़िंदगी,मोहब्बत-दोस्ती में  
दर्द का मिले है गुब्बार आज भी | 

                                   शैल सिंह

Friday, 14 July 2017

ग़ज़ल '' कोई याद आ रहा है ''

रुमानियत भरा ये मौसम शायरी सुना रहा है
गा रहीं ग़ज़ल फ़िज़ाएं अम्बर गुनगुना रहा है ,

मुँह छिपाये घटा में बादल खिलखिला रहा है
मृदुल आह्लाद भरे इन्द्रधनुष मेघ लुभा रहा है ,

प्रफ़ुल्ल पात-पात लग गले ताली बजा रहा है
महकी हुई दिशाएं वातावरण मुस्कुरा रहा है ,

सावन का सुहाना मन्जर बांसुरी बजा रहा है
अलमस्त अलौकिक छटा माज़ी जगा रहा है ,

बीते मधु पल चपल चित्रित समां करा रहा है
पुरानी स्मृतियों का हसीं जख़ीरा गिरा रहा है ,

चाँद उतर आहिस्ता आँगन उर जला रहा है
इतना ख़ुशगवार लम्हा कोई याद आ रहा है |

                                   शैल सिंह


Tuesday, 11 July 2017

            कविता
'' हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी ''


इक दिन पास उसी के जाना सबको
जो तीनों लोकों का स्वामी है
भले-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा
रखता ऊपर वाला अन्तर्यामी है ,

मत तेरा-मेरा कहा करो जी
सब यहीं धरा रहा जायेगा
माटी का तन माटी में मिल
इक दिन ब्रह्मलीन हो जायेगा ,

ऐसे तत्वों का बस संग्रह करना 
जिससे सुख आनन्द मिले भरपूर
तेरी हँसी बन जाये दवा रुग्ण की
जो निःशुल्क मगर बहुमूल्य है गुर ,

बुद्धि की सम्पत्ति बाँट सभी में
धैर्य का रखना संग हथियार सदा
रक्षा कर विश्वास,संस्कार की रखना
रिश्तों में प्रीत की घोल सम्पदा ,

ऐसी मुस्कान बिखेरो मुखारबिन्दु
कि,पराये भी शामिल होके हँसे
आँसू तो आँखों के होकर भी
बहते ही पराया हो विहँसे ,

हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी
चलो हम-हम का रिस्ता जोड़ें
इंसानियत,मानवता सबपे भारी
दम्भ हैसियत का सस्ता छोड़ें ,

श्रद्धा,ज्ञान,दया,सम्मान,नम्रता
जीवन तन के शृंगार आभूषण हैं
प्रार्थना,विश्वास अदृश्य भले पर
कर देते असम्भव को भी धूसर हैं ,

वसीयत,भोग-विलास,विरासत
मे, ना भूलें कर्मों की प्रधानता
परमपिता रखता हिसाब-किताब
जिनके कर्मों में होती महानता |

गुर---गुण

                   शैल सिंह