Saturday, 9 June 2018

नज़्म ' जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का '

याद कभी आये न वो मेरे सपनों में भी
दरबान पलकों को सख्ती से ताक़ीद कर दी कसम से
लौटा दी नफ़रत की सूद सहित पाई-पाई उसे भी
ज़िक्र छेड़ें हवाएं भी ना कभी ताकीद कर दी कसम से
जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का
तन्हाई,गम,उदासी से खुद को फ़ारिग कर ली कसम से
मुद्दतों बाद सुकून मिला मेरी रूह को
दिल की विरां महफ़िल फिर गुलजार कर ली कसम से
कहांँ थी काबिल ही वो मेरे मिज़ाज़ के
सच में किस सांचे में ढाला था उसको ख़ुदा ने कसम से।

                                                          शैल सिंह

Friday, 25 May 2018

एक व्यंगात्मक कविता '' पाक भी आंख तरेरेगा बन्धु ''

एक व्यंगात्मक कविता 

'' पाक भी आंख तरेरेगा बन्धु ''

चलो देखें अजूबा प्रेमानुराग
चालू भतीजे,फूफीजान का
फूफी बैरी से हाथ मिला भूलीं
किस्सा गेस्टहाऊस अपमान का ,

इक मंच साझा कर बहरूपिये सारे
नौटंकी करने को मजबूर हुए
देख मोदी जी का बजता डंका
बौखलाहट में भस्मासुर हुए
इसी विरोध के सुर,राग,लहर में
मोदी जी देश-विदेश मशहूर हुए
मोदी रोको एक ही मकसद
इस गठबंधन के अभियान का
बेच जमीर कुकुरमुत्तों ने
खो दी इज्ज़त मान-सम्मान का ।

शामिल तीन खातूनें भी पाखंड में
माया,ममता,इटली वाली हैं 
देखें कितना दिन निभता है
दोस्ती भी देशद्रोहियों की जाली है
मोदी जी की शोहरत का भय
इन अमलों को डंसता खाली है
येचुरी,केजरी,चाराचोर सपूत,नायडू
आदियों का मिलन जमीं आसमान का
देख जोकरपन पप्पू संग भांडों की
आ रही हँसी सच में आप मान का ।

खड़ी हुईं खिलाफत बीजेपी के 
एक साथ गद्दारों की टोलियां
साम्प्रदायिकता का ठप्पा जड़जड़
दाग़ें अनर्गल प्रचार की गोलियां
इस सियासत में चर्च भी कूदा
छेदतीं भ्रष्ट जमातों की बोलियां
देखो मंडराता हिंदूत्व पर खतरा
सवाल हिन्दुस्तान के स्वाभिमान का
जागो देश की उन्नींदी जनता जागो
मत सोओ ऐसी नींदें इत्मिनान का ।

गर देश को अपने शीर्ष पर देखना
छोड़ना होगा आपसी मतभेद की बातें
किसी के बरगलाने में गर आओगे
सहना होगा घातक गद्दारों की घातें
पाक भी आंख तरेरेगा बन्धु 
छोटी सी भूल की कीमत पे आके
है संघ को भी लेकर साथ में चलना
जो मेरूदंड हिन्दूत्व की आन का
इक विनती समर्थकों सन उन्नीस में
रखना मान नरेन्द्र मोदी की शान का ।

                               शैल सिंह
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Thursday, 17 May 2018

आत्मविश्वास सबसे बड़ी ताकत है

कुछ ने कांटे बिछाए बहुत चाह की राह में
मगर कर लिए कांटे मोहब्बत मेरी चाह से ,

कोशिशें बहुत की गईं मनोबल तोड़ने की
मगर साथ मेरा निबाहा धैर्य ने बड़ी धैर्य से ,

वल्गा थामें रहीं ख़्वाहिशें आत्मविश्वास की
नहीं हो जाते ख़ाब धराशाई छल विद्वेष से ,

चक्रवात आये बड़े जूझ लहरों से जिद भी
कश्ती लाके ही मानी साहिल पे खुद्दारी से ,

शक खुदा को भी नहीं काबिलियत पे मेरी
बख्श दी चाहत मेरी रब ने काबिलियत से ,

कब तक मिटायेगा बैर रख हस्तरेखा कोई
जल ख़ुदी ख़ाक होंगे 'अरि' मेरी हैसियत से ,

कितना तजुर्बा है झेली विषम मेरी ज़िन्दगी
मिली आकर तब मुझसे है मंजिल खुशी से ।

अरि-शत्रु।                         शैल सिंह   

Sunday, 8 April 2018

ग़ज़ल। " कैसे मच गई गदर हवाओं में "


      गजल

" कैसे मच गई गदर हवाओं में "

बिस्तर की सलवटों से पूछिए
गुजारी है रात किस तरह
शब-ए-हिज्राँ क्यूँ टपके शबनम
नम तकिये हुए हैं इस तरह

इक बार देख जाईए
दिलक़श तन्हाईयों का मंज़र 
बेआबरू सा कर दिये हैं
उमड़ के यादों का समंदर
बहलाने छत पे जाऊं कैसे
ले ख्वाबों का बवंडर
कर देगी दिल को और छलनी
चाँदनी की गहनाईयों का खंजर ।

सब्र बेकरार अब्र आँखें 
तमन्ना दीदार की है
अक्स उभरते हैं खयालों में 
परवा न संसार की है
सहना जुदाई आसां मगर
सहना बेरूखी न प्यार की है
कशमकश में ढल न जाए उम्र यूँ
छोड़िए नाराजगी बेकार की है ।

खाई कसम वफ़ा की क्यूँ
हाथ थाम हर जनम के लिए
दिल में बो के बीज प्रीत का 
कयूँ छोड़ा दहर में गम के लिए 
पट घूंघट का खोला जो कली ने
क्यूँ मिले नयन दो इक वदन के लिए
कैसे मच गई गदर हवाओं में 
महकी खुश्बू जो थी चमन के लिए ।

                         शैल सिंह



Saturday, 31 March 2018

" कमर कस लो कोई बाकी कसर ना रहे "

आँधियों का चट्टानों पर असर नहीं होता
हवाओं का जड़-तनों पे बसर नहीं होता
चाहे चाल जितनी चला लें बागी दिशाएं
हर इक टहनियां कहर से हिलालें बलाएं
सुगंध फैली खिजां में भी जिस फूल की
उस महक पर बला का सफर नहीं होता ।

आग में तपा कर निखरे हुए सोने जैसा
गिन्नी,गिलट में असल चमक नहीं होता
जौहरी होते सब हीरे की परख के लिए
तो लहरों पर तूफां का डगर नहीं होता
कमर कस लो कोई बाकी कसर ना रहे
भटकेे पथिक का कोई शहर नहीं होता ।

ठोकरों ने जब स्वर्णिम अवसर दिया है
तो बांट रहे हो जहन को किन खेमों में
चमन सर्वोपरि बन्धु हमारे तुम्हारे लिए
सोचो कि हरदम सुन्दर पहर नहीं होता
चलो,गूनें,मथें लें संकल्प सदा के लिए
गद्दारों सेे घातक कोई जहर नहीं होता ।

                                 शैल सिंह

Tuesday, 27 March 2018

" अम्बेडकर का संविधान बदल देखिए "

आरक्षण पर कविता , मोदी जी से निवेदन करती हुई

हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए
सभी के अरज पर भी अमल कीजिए
नोटबंदी,जीएसटी के मानिंद माननीय
कमर कसके इक और करम कीजिए ।

आरक्षण के कोढ़ से हो मुक्त देश मेरा
इस दीमक से होता खोखला देश तेरा
मेहनतकश नस्लों पे भी रहम कीजिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

आरक्षण के हवनकुण्ड चढ़ीं प्रतिभायें
आर्थिक आधार पे हों चयन प्रक्रियायें
नये अभियान को अब सफल कीजिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

तपती योग्यतायें इस मियादी बुखार में
झुलसें बुद्धिजीवी आरक्षण के अंगार में
महोदय उपचार का शीघ्र पहल कीजिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

बढ़ते अपराध क्यों तह तक तो जाईए
आरक्षण हटाकर इक बार आजमाईए
अविलंब ऐसी महामारी का हल ढूंढिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

प्रतिभावों संग होता ये अन्याय रोकिए
हौसलों के पंख न कतर करके फेंकिए
अम्बेडकर का संविधान बदल देखिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

कहर आन्दोलन का असहनीय होगा
उम्मीदों पर उतरना अवर्णनीय होगा
जायज है मांग हमारी बिगुल फूंकिए
हो चुकी मियाद खतम दखल दीजिए ।

                         शैल सिंह

Thursday, 8 March 2018

महिला दिवस पर मेरी रचना

सदियों पुरानी तोड़ रूढ़ियां
आजाद किया है खुद को,
परम्पराओं की तोड़ बेड़ियां,
कुशल सफर क्षितिज तक का
दिखा दिया है जग को,
देखो हमको अबला कहने वालों,
सबल,सशक्त बना लिया है खुद को,
रोक नहीं सकतीं हमको
अब श्रृंगार की जंजीरें,
देखो हर कालम में नारी की
उभरती हुई सफल तस्वीरें
आंचल में हमारे जन्नत है
हम ममता की मूरत हैं
हमसे ही है सृष्टि सारी
रची हमने ये दुनिया खूबसूरत है।
                शैल सिंह

महिला दिवस की ढेरों शुभकामनाएं

हम वो फूल हैं जो महका दें अकेले पूरे चमन को
,हम वो दीप हैं जो रोशनी से भर दें अकेले पूरे भवन को,
हम वो समंदर हैं जो तृप्त कर दें सारे संसार को,
और समेट भी लें अपने आगोश में सारी कायनात को,
हम चाहें तो स्वर्ग उतार लाएं आसमान से ।

                              शैल सिंह