Wednesday, 17 January 2018

'' अभिनन्दन तेरा साल नवागत ''

    '' अभिनन्दन तेरा साल नवागत ''


नई ऊर्जा लेकर नव वर्ष की आई है नई सुबह
पुलकित मन है नई नेमतें ले आई है नई सुबह।

नई उमंगें नई तरंगें लेकर आया साल नया
मन में नई हिलोरें लें अंगड़ाई आया साल नया
कर के इक युग का अन्त आया साल नया
बीते साल ने की मेहरबानी भेज कर साल नया।

फांस जो कुछ भी दिल में है बीते युग की
सूनें,सुनाएँ,सुलझाएं दिलों की आया साल नया
इक दूजे को दिल में बसाएँ और बसें हम
करें भूले विसरों को याद चलो आया साल नया।

चाहे जैसे गुजरा पर गुजरा पिछला बरस
फिर दहशत ना देहरी लांघे के आया साल नया
नए हर्ष से नव वर्ष का नवल उत्कर्ष भर
धवल प्रवाह से नव पर्व मनाएं आया साल नया।

नई पहल से पहेली अनसुलझी सुलझाएं
नए आह्लाद से अभिनन्दन तेरा आया साल नया
हो नव वर्ष के शुभागमन में नव आयोजन
नव वर्ष का शुभेक्षु सूर्योदय हो आया साल नया।

क्रोध,अहं,द्वेष,पुरातन साल अवसान तले
करें दफन सभी नव भाव लिए आया साल नया
नव वर्ष में रोपें नव अंकुर स्नेह,प्रीत का
मन भाव भरें राष्ट्र कल्याण का आया साल नया।

                                                  शैल सिंह


Wednesday, 3 January 2018

'' चार जवानों की शहादत पर कविता ''

'' चार जवानों की शहादत पर कविता ''


जाते-जाते साल के आखिरी दिन सन सत्रह
दे गया ज़ख्म गहरा,कैसे मनाएं साल अट्ठरह ,
दर किसी के आयी सज अर्थी कोई जश्र में डूबा 
देश के लोगों का जश्न मनाना लगे बड़ा ही अजूबा ,
ऐसे ताजा तरीन खबर पे भी किसी ने नज़र न डाली
चार जवानों के शोक पर लोग कैसे मना रहे खुशहाली ।

मन बिल्कुल नहीं लगता नव वर्ष का जश्न मनाने में
सरहद पर हुए लाल शहीद देश की गरिमा बचाने में ,
बन्द ताबूत में ओढ़ तिरंगा कितनों के लाल आये हैं घर
जश्न मनाने वालों तुझपर भी तो इसका होता कोई असर ,
रो-रो हाल तेरा भी होता बुरा गर खुद का नयन सूजा होता
तब भी तुम जश्न मनाते क्या निज के घर का दीप बुझा होता ,
जिनकी मेंहदी,महावर,बिंदिया,सिन्दूर धुल दिए गये हैं पानी से
जिनके सुहाग ने दी शहादत देश लिए अपनी अनमोल क़ुर्बानी से ,
उन घरों में पसरे सन्नाटे,सूनी चौखट का दुःख तो आभास किये होते
अाह ऐसी मर्मान्तक पीड़ा का अो हृदयहीनों थोड़ा अहसास किये होते।

जिनके घरों में अर्थी भेज नए साल ने दी है दस्तक
बलिदानियों पे संवेदनहीनों चाहिए था नवाना मस्तक , 
शत-शत नमन शहीदों,देश तुझे शोकातुर होना चाहिए
जिस घर में मातम का आलम भान गम का होना चाहिए , 
आज़ बिलख रहे हैं बच्चे जिनके रो रही पछाड़ें खा-खा माँ
फट जाता सीना दहाड़ पर पत्नी मूर्छित हो गिरती जहाँ-तहाँ ,
नव वर्ष पे दी सौग़ात जो पाक ने उसे ईश्वर कभी ना माफ़ करे
घातियों पे इतना बरपाना कहर कि ताक़त की आंक के थाह डरे ,
पाक तेरा हो घोर अमङ्गल नव वर्ष लिए है हम सबकी कामना यही
तेरे हर घर का बुझा देना चराग़ करना नेस्तनाबूद है मनोकामना यही।


                                                                   शैल सिंह


Tuesday, 5 December 2017

कविता '' मुझे सहज कर देती हो ''

        कविता ---

तुम  हो मेरी आत्मबोध  
तुमसे करके आत्म विलाप 
मैं सहज हो लेती हूँ।
आत्मलोचना तुम हो मेरी,
आत्मवृतान्त तुझे सुना 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
अस्मिता का बोध कराती 
हँसि,खुशी,दुःख तुझसे बाँट 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
तुम मेरे हर रंगों की पहचान 
तेरा स्वागत कर 
निजी जिन्दगी के दरवाजों से 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
तूं मेरी चुलबुली सखि 
बेझिझक अक्सर कर 
तन्हाई में तुझसे बातें  
मैं सहज हो लेती हूँ। 
आत्मविस्मृति की परिचायक
तेरी पनाहगाह में आकर 
मैं सहज हो लेती हूँ।
अन्तर के छटपटाहट को भाँप 
मुझे सहज कर देती हो। 
कभी वजूद को ढंक लेती हो 
कभी उजागर कर देती हो। 
कभी तो भटकाती हो 
शब्दों के अभयारण्य में 
कभी शब्दों के लच्छों के 
सुन्दर,विराट वितान में 
मेरी अवधारणाओं को 
अपने सम्बल का देकर पनाह 
मुझे सहज कर देती हो।
सपनों के उदास कैनवास पर  
उम्मीदों के बहुविध रंग बिखेर 
मुझे सहज कर देती हो 
विचलित जब भी मन होता 
तुम स्वच्छंद,मुक़्त,मुखर हो 
मेरे स्वभावानुकूल शब्दों में 
कविता की लड़ियाँ गूंथकर 
मुझे सहज कर देती हो। 
मेरे जीवन संघर्ष की
परिचारिका या सेविका 
आख़िर वो है कौन,
मेरी रचना मेरी कविता, 
मेरी सुर साधना 
मेरी क्रिया,प्रतिक्रिया 
मेरी विश्वशनीय सहचरी
मेरी रचनाधर्मिता कविता। 
                       शैल सिंह 

Saturday, 18 November 2017

शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

भंसाली का बहुत-बहुत शुक्रिया,
राजपूतों के ज़मीर को जगा दिया,सदियों से सो रहे थे, राजपूतों के चरित्र को जितना गन्दा से गन्दा हो सके उतना सीरीयल्स फिल्म,मन गढ़न्त कहानियों के माध्यम से दर्शाया गया पर कभी किसी राजपूत ने अपनी कम्युनिटी के लिए आवाज नहीं उठाई, लेकिन जब एक माँ की अस्मिता पर एक क्षत्राणी की आन-बान पर आँच आई तो राजपूती लहू ने अपने क्षत्रिय होने का प्रमाण दिखा दिया ,शमशीरों को म्यानों से निकाल लिया, नहीं बहुत हो चुका अब बर्दाश्त नहीं, हमारे बलिदान और योगदान की क्या यही कीमत कि चन्द बिगड़ैल लोगों के चरित्र को पूरी राजपूत लावी पर चरितार्थ कर दिखा दिया जाता रहा, देश याद करें राजपूतों के त्याग को उनकी दानशीलता को जो और किसी में नहीं। हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग हैं ,पर क्षत्रियों का ही किरदार क्यो  अत्याचारी,अनाचारी,व्यभिचारी, दुर्दांत,अक्खड़ पर्दे पर उतारा जाता रहा ,उसी का नतीजा है कि आज क्षत्राणियाँ भी कमर कस लीं कि अब राजपूत के मुंह में कोई उंगली डाल कर गुस्ताख़ी तो करें , ये होती है वर्चस्व की लड़ाई ।लीला भंसाली को धन्यवाद , शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

शैल सिंह

Friday, 17 November 2017

बेटियों की महत्ता पर कविता '' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''

     '' बेटियों की महत्ता पर कविता ''

'' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''


गर हम बेटियां ना होतीं विपुल संसार नहीं होता
गर ये बेटियां ना होतीं ललित घर-बार नहीं होता
गर बेटियां ना होतीं भुवन पर अवतार नहीं होता
गर हम बेटियां ना होतीं रिश्ते-परिवार नहीं होता ।

हमने तोड़ के सारे बन्धन अपनी जमीं तलाशा है
दृढ़ इरादों के पैनी धार से अपना हुनर तराशा है
हमने फहरा दिया अंतरिक्ष में अस्तित्व का झंडा
सूरज के शहर डालें बसेरा मन की अभिलाषा है ।

झिझक,संकोच शर्म के बेड़ियों की तोड़ सीमाएं
हौसले को पंख लगा निडर उड़ने को मिल जाएं
सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम
बदल जग सोच का पर्दा हमारी शक्ति आजमाए ।

मूर्ख से कालिदास बने विद्वान दुत्कार हमारी थी 
तुलसी रामचरित लिख डाले फटकार हमारी थी 
विरांगनाओं के शौर्य की गाथा जानता जग सारा 
अनुपम सृष्टि की भी रचना अवनि पर हमारी थी ।

इक वो भी जमाना था के इक नारी ही नारी पर
सितम करती थी घर आई नवोढ़ाओं बेचारी पर
संकीर्ण मानसिकता से उबार उन्हें भी संवारा है
पलकों पर बैठा सासूओं ने बहुओं को दुलारा है ।

क़ातर कण्ठों से करती निवेदन माँओं सुन लेना
मार भ्रूण हमारा कोंख में यूँ अपमान मत करना
क्यों हो गईं निर्मम तूं माँ अपने अंश की क़ातिल
हमें बेटों से कमतर आँकने का भाव मत रखना ।

हम जैसे ख़जानों को पराये हृदय खोलकर मांगें
हमारे लिए कभी रोयेंगे आँगन ये दीवार,दरवाज़े
हम परिन्दा हैं बागों के तेरे आँगन की विरवा माँ
रिश्तों की वो संदल हैं खुश्बू से दो घर महका दें ।

करें मुकाम हर हासिल गर अवसर मिले हमको
कर स्वीकार चुनौतियाँ हमने चौंकाया है सबको
लहरा दिया अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पे राष्ट्र का ग़ौरव
बेहतर कर दिखायें गर जगत में आने दो हमको ।

विपुल---विशाल , ललित---सुन्दर ,
भुवन---- जगत , अवनि----पृथ्वी ।

                                                       शैल सिंह 




Monday, 6 November 2017

'' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''

हिंदी ग़ज़ल '' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''


संदल सी महकती चलती पहलू से मतवाला कर
मदिरालय में निगाहों के निमंत्रण से दीवाना कर ,

तेरी आँखों के सागर में भी देखा इश्क़ की लहरें
सफ़ीना दिल का उतराये तेरे सागर में इस गहरे
आशिक़ाना मिज़ाज देखे इन उफनाती लहरों के 
साहिलों पर मिलें चल ज़माने के तोड़ सभी पहरे ,

गर अल्फाज़ मुकर जाएं हृदय का हाल बताने से
झुका पलकें बता देना अन्तर का राज निग़ाहों से
अंतर की नदी का कल-कल नाद दिल सुन लेगा
हटा घूँघट हया की चाँद निकल आना घटाओं से ,

बसा गेसुओं के झुरमट में दिल आबाद कर देना
नज़राना आरजू को मेरी दिल में उतार कर देना
गुम मदहोश अदायें कीं आजकल नींद रातों की
वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ,

हमदर्द बनकर नब्ज मुक़म्मल टटोल लिये होतीं
मौन हसरतों,अहसासों का कुछ मोल दिये होतीं
छोड़ निकम्में लफ़्जों को बंदिशें तोड़ संशयों की
दिल बोझिल न यूँ रहता फ़ख्र से बोल दिये होतीं ।

                                             शैल सिंह