Wednesday, 2 August 2017

सावन पर कविता

सावन पर कविता, मेरी 

है सावन के महीने की अजी बात निराली
मन्त्रमुग्ध कर देता क्षिति बिखेर हरियाली ,

तोड़ संयम बूँद-बूँद बरसे सावन झमाझम
उसर,बंजर,परती धरती का करे सीना नम ,

बाढ़,आपदा, भूकम्प से करता छलनी मन
धानी चूनर में जगत को बनाता नई दुल्हन ,

इन्द्रदेव करते सावन में हर्षित हो जल वर्षा
गाते मोर ,दादुर,पपिहा मोरनी नाचती हर्षा ,

घटा कारी नभ से गरज बिजलियां गिराती
इतरा क्षुद्र नाले,नदियां,नौले उफ़ान मारतीं 

कजरी,तीज,झूला,मेघ,मल्हारों भरा मौसम
नजारा देख हरा-भरा लगा मन को मनोरम ,

विरहन का तन जलाता विरह की अगन में
सावन प्रेम का अंकुर उगाता युवा जहन में ,

मस्तानी धूप बदली की,सुहानी लगती भोर
सोंधी महक माटी की शोख पवन करे शोर ,

नागपंचमी,जन्माष्टमी,रक्षाबंधन के त्योहार
सब मौसमों में लगे सावन सबसे खुशगवार ।

   क्षिति---धरती                                शैल सिंह