ना मैं जानूं रदीफ़ ,काफिया ना मात्राओं की गणना , पंत, निराला की भाँति ना छंद व्याकरण भाषा बंधना , मकसद बस इक कतार में शुचि सुन्दर भावों को गढ़ना , अंतस के बहुविधि फूल झरे हैं गहराई उद्गारों की पढ़ना । निश्छल ,अविरल ,रसधार बही कल-कल भावों की सरिता , अंतर की छलका दी गागर फिर उमड़ी लहरों सी कविता , प्रतिष्ठित कवियों की कतार में अवतरित ,अपरचित फूल हूँ , साहित्य पथ की सुधि पाठकों अंजानी अनदेखी धूल हूँ । सर्वाधिकार सुरक्षित ''शैल सिंह'' Copyright '' shailsingh ''
शनिवार, 27 सितंबर 2014
गुजरे ज़माने की बातें
शुक्रवार, 26 सितंबर 2014
कुछ क्षणिकाएँ
हे मेरे अन्तर्यामी प्रभो
गुरुवार, 25 सितंबर 2014
माँ अम्बे
माँ अम्बे
ये शिलाएं तो बेजान शिल्पी की रचना
क्यूँ भटकती रही आज तक द्वारे-द्वारे
माँ के दर्शन को प्यासी ये दोनों आखें
जगदम्बे बसी जब कि उर में हमारे ,
कल्पनाओं में साकार प्रतिमा सजाकर
सच्ची लगन का दीया,धूप,चन्दन,अगर
अखण्ड श्रद्धा की रोली,अक्षत चढ़ाकर ,
विश्व संताप के शमन को हवन हैं किए
सुख शांति औ समृद्धि अमन के लिए
आरती भी उतारी पूजन,अर्चन किया
शीश चरण में झुकाया नमन के लिए ,
जग की नैया डांवाडोल अब हो रही
देवभूमि से संस्कृति विलुप्त हो रही
हम सबकी आधार माँ बस तू-ही-तू
टूटी कश्ती की पतवार इक तू-ही-तू ,
दोनों कर जोड़ती अर्चना सुन ले माँ
स्याह फैला अँधेरा धरा पर मिटा दे
मन से मन के सभी टूटे तार जोड़कर
प्रेम की जग में पावन सी गंगा बहा दे ,
मन के दुर्भाव कर भष्म नैन ज्वाल से
जग में सद्भाव भर दे अभय हस्त से
हम सन्मार्ग पर ही सदा चलते जाएं
कभी जिसपे न आँधी औ तूफान आए ,
भाव भक्ति का भर सदाचारी बना
स्वार्थ सारे मिटा परोपकारी बना
शिष्य तेरे सभी सत्यपथ पर चलें
लाली नवयुग की बन दमकें,खिलें ,
विश्व की वेदना का हम चिन्तन करें
और विकल हो उठें जग के भय पीर से
दिव्य अहसास का बोध जन-मन को हो
निर्मल हिय से सदा बांट लें दर्द को ,
ज्ञान के यज्ञ में स्वाहा कल्मष करें
साथ सब मिल हँसें भाव ऐसा भरें
ऐसी दुनिया बना दे जो लागे भली
नेह की बाती जलती रहे हर गली ।
शैल सिंह
सोमवार, 22 सितंबर 2014
''अपनों ने जो दर्द दिया''
अपनों ने जो दर्द दिया
सम्भल जाये ज़ुबाँ तो मैं क्या करूँ ,
शब्द शिकवे के बड़े ही लचीले यहाँ
अर्थ का अनर्थ ना हो जाए कहीं
परे हटकर कुछ हो ना जाये कहीं
मैं अनुरक्त उनकी वो समझ ना सके
भ्रान्ति मन में उठे तो मैं क्या करूँ ।
लाख दे दो हमें तुम बद्दुवाएं मगर
साये से अपने विरत ना करना कभी
मुझसे प्रश्नों की झड़ियाँ लगाने से पहले
अरे परखा तो होता विश्वास को भी
पृष्ठ पीछे क्या-क्या गुल खिला दिए गये
आप मुझसे छुपाएं तो मैं क्या करूँ ।
उस ग्रन्थि को कैसे सुलझाऊँ भला,जो
निपुणता से रंग-रंग में बोई पिरोई गई
पालिश कला में ये जुबां जो डुबोई नहीं
मुझे तूलिका में सही रंग भरने ना आया
हजार रंगों की ये दुनिया तो मैं क्या करूँ ।
अब समझने को बाक़ी कुछ भी नहीं
भाषा भावों की आती है पढ़नी मुझे
विवश धैर्य का ज़ाम थामे मैं घुटती रही
सही समय की प्रतीक्षा ने रोका मुझे
कौन कितना ग़लत कौन कितना सही
आप इससे अन्जान हैं तो मैं क्या करूँ ।
विनती हमसे ग़िला कभी करना नहीं
लाचार वज़ूद की कोई अहमियत नहीं
अति साधारण बेक़सूर इंसान हूँ मैं
पर स्वाभिमान मरा नहीं जिन्दा हूँ मैं
आप पूछते हैं कि ये सब क्या चल रहा है
बेहिचक कह ना पाऊँ तो मैं क्या करूँ ।
मेरे ख़्वाबों की दुनिया है छोटी मगर
बदसूरत और कुरूप बिलकुल नहीं
अतीत हमसाया बनकर सदा साथ है
समझना ना सपनों की महफिल नहीं
सृजन के विस्तार का ख़ूबसूरत आकार है
दुर्गम राह काँटों भरी तो मैं क्या करूँ ।
अधर खुलते नहीं तो मूक वाणी नहीं
स्वस्थ मस्तिष्क बीमार है ना बेज़ार है
हो ना जाना ख़फ़ा फिर किसी बात से
मान लेना कि दिल का ये गुब्बार है
दिल पर इल्ज़ाम की चोट खायी हुई हूँ
बिफरे क़लम की जुबाँ तो मैं क्या करूँ ।
टीस गहरी चुभन जिसमें कसक तेज भी
कितना मरहम लगाऊँ ऐसे नासूर पर
घर उनका भी जलेगा इक दिन जरूर
जिसने फेंकी चिंगारी है मेरे फूस पर
लगातीं हैं काकी बुझाती ये क़िस्सा सही
फन ऐसे मुझमें नहीं तो मैं क्या करूँ ।
स्वार्थ में शख़्स इतना क्यों मग़रुर है
जिसकी प्रतिमा स्थापित उर के तख़्त पर
फांस उसके मन में मेरे प्रति चुभोई गई
जिसे पाट सकने में दक्ष ईंट गारे नहीं
जो हमपे सितम की बिजली गिरी है
बदली घिरी है हवाओं से छंट जाएगी
वो तो सराबोर भींगेंगे उस दिन जरूर
जिस दिन बरखा झमाझम बरस जाएगी
हमें बेचैन करके वो आजकल चैन में हैं
सुकून मुझसे जो रूठा तो मैं क्या करूँ ।
हम आपके वास्ते क्या से क्या सह गए
जुबां ख़ामोश थी और वो सब कह गए
आप भी जिनसे वाकिफ़ बहुत ख़ूब हैं
फ़र्क़ इतना वो नज़दीक हम बहुत दूर हैं
रख संयम स्वयं पर बहुत प्यार से आपने
कहने को बहुतेरे सफ़र में अपने मिलेंगे
कौन कितना पराया सगा कौन कितना
ये तो बताएगी वक़्त पर समय की वफ़ा
आप अपने थे रहेंगे हमेशा हमारे मगर
आग ये दुनिया लगाये तो मैं क्या करूँ ।
इतनी लिखने की धृष्टता मैंने जो की
माफ़ करना कोई जो भूल मुझसे हुई
आप उकसाते थे प्रायः कविता लिखो
उर के उद्गार वास्ते कवयित्री बन गई
बहुत रोका-टोका मनाया भी लेकिन
बदमाश पोरें ना मानें तो मैं क्या करूँ ।
शैल सिंह
बे-हिस लगे ज़िन्दगी --
बे-हिस लगे ज़िन्दगी -- ऐ ज़िन्दगी बता तेरा इरादा क्या है बे-नाम सी उदासी में भटकाने से फायदा क्या है क्यों पुराने दयार में ले जाकर उलझा रह...
-
नई बहू का आगमन छोड़ी दहलीज़ बाबुल का आई घर मेरे बिठा पलकों पर रखूँगी तुझे अरमां मेरे । तुम्हारा अभिनंदन घर के इस चौबारे में फूल ब...
-
बे-हिस लगे ज़िन्दगी -- ऐ ज़िन्दगी बता तेरा इरादा क्या है बे-नाम सी उदासी में भटकाने से फायदा क्या है क्यों पुराने दयार में ले जाकर उलझा रह...
-
ग़ज़ल---- जो लफ़्ज़ों में बयां ना हो वो आॉंखों से समझ लेना कि करती हूँ मोहब्बत कितना तुमसे वो समझ लेना मुझको दीवानगी की हद तक मुहब्बत हो ग...