Tuesday, 11 April 2017

'' हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में ''. एक मधुर गीत


कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

जबसे गये तुम छोड़ नगर
लगे वीरां-वीरां मुझे शहर
हवा गुलिस्तां से भी रूठ गयी
अजनवी लगे हर गली डगर
फब़े न जिस्म लिबास भरी तरूनाई में
अब वो आबोहवा रूवाब नहीं अरूनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

तुझे जबसे नज़र में कैद किया
कभी ख्वाब ना देखा और कोई
तेरी याद में गुजरी शामों-सहर
दूजा शौक ना पाला और कोई
खनखन बोले ना चूडी़ सूनी कलाई में
रूनझुन पैंजनी भी ना झनकी अंगनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इस कदर हुआ बदनाम इश्क
हमें दर्द का तोहफा मुफ्त मिला
ख्वाहिशों पे पहरे लगे दहर के
मौसम भी रंग बदला यही गिला
हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में
जहर लगे है कूक कोईल की अमराई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इक दिन खिले थे हम गुंचोंं की तरह
किरनों की तरह बिखरा जलवा
तेरे शुष्क मिजाज से हैरां दिल 
गुजरी क्या इस दौरां तूं बेपरवा
आनंद नहीं महफिलों की रंगों रूबाई में
थिरकन में भी लोच न जो धुन हो शहनाई में ,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में ।
                                               शैल सिंह