Friday, 13 October 2017

गांव पर कविता '' भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ''

            गांव पर कविता 


बासी-बासी  सी लगती  शहर की  फिज़ां है
मेरे गांव सी कहाँ मिलती यहाँ ताज़ी हवा है ,

सर्दी,गर्मी,वर्षा,वसंत भी अनूठे मेरे गांव के 
शहर के कोलाहल में दिन गुजरता कहाँ है
खुले आसमां के छत के तले दूर-सुदूर तक
लहलहाते खेतों में हरियाली दिखता जहाँ है ,

वो गाँव की रुखी रोटी का स्वादिष्ट निवाला
पिज्जा,बर्गर में तृप्ति का बोध होता कहाँ है
लगता रोज इतवार है देख गांवों की रौनक़ 
शिद्दत से इतवार का इन्तज़ार होता यहाँ है ,

कुटुम्ब-कुनबे संग गूँजता हँसी का ठहाका
चौपाल जगत पर इनारों की लगता जहाँ है
सड़कें,बिजली,मकां,पार्क फिर भी वीरानी 
दीयों के रौशनी में मेरा गांव हँसता जहाँ है ,

जहाँ चहचहा अगवानी पाँखी करें भोर की
महकते पुष्पों से वन-उपवन हर्षता जहाँ है
है भाईचारा जहाँ रेशमी डोरियाँ रिश्तों की
भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ,

नीम,बरगद,पीपल की जहाँ छाँव का मज़ा  
शहरी प्रदुषण में दम हरदम घुटता जहाँ है
न चौबारे आंगन,सहन,यहाँ की इमारतों में
गांव प्रकृति की मुग्धता में विहंसता जहाँ है ,

रसीला सावन  नशीला फागुन मेरे गांव का
बेख़बर मज़हबी द्वेषों से गांव रहता जहाँ है
त्यौहारों का उल्लास शुद्ध स्वच्छ पर्यावरण
विपत्ति में करुणा का सिन्धु बरसता जहाँ है ।

इनारों --कुआं
                                         शैल सिंह