रिश्ते हुए बेगाने रह गई तन्हाई

लिखो लेखनी अनुभूति मेरे
मेरी अंतरंग संगिनी बनकर 
कैसे तन्हाई का हाथ पकड़ 
ज़िंदगी का काट रही सफ़र । 

चहुंओर पसरा घना सन्नाटा 
सब घर की निस्तब्ध दीवारें 
बाग़ों के दरख़्त वीरान दिखें 
चले गये पंछी कहाँ ना जाने ।

जाने कहां चला गया सुहाना 
अपने लोगों के साथ का दौर 
उन लम्हातों की सुनहरी यादें 
स्मृतिपटल पर थिरकतीं और ।

लिख तन्हाई की कंबल ओढ़े 
गुज़र रही मेरी तन्हा ज़िंन्दगी 
जिसे भी देखती वही अकेला 
किससे करें ठिठोली दिल्लगी ।

जब भी निकली घर से बाहर 
जो भी मिला दिखा तन्हाई में 
अलबत्ता स्वयं से मिला दिया 
मुझसे मुझको मेरी तन्हाई ने ।

किसके संग बैठ जी बहलायें 
सभी घर निर्जन सुनसान पड़े 
कौन किसे सांत्वना देवे भला 
चित्त भी सबके बियाबान पड़े ।

अकेलेपन के इस रेगिस्तान में 
नितान्त तन्हाई मैं मेरी परछाईं 
अन्यमनस्क यही घर-घर मंजर 
रिश्ते हुए बेगाने रह गई तन्हाई ।

कभी अंगारों सी सुलगाती यह 
कभी नागिन सी डंसती तन्हाई 
मन का अवसाद पढ़ सिखा दी 
तन्हा भी जीने का हुनर तन्हाई ।

अनुभूति ---अहसास
शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 









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