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गर्मी और मानसून पर कविता

अंबर दहकाये ज्वाला कड़क धूप की देखो बेशर्मी  हे सूरज देव तपन मिटाओ व्यवहार में लाओ नर्मी तरस खाओ अरे इन्द्रदेव जनजीवन पर रहम करो सूख रहे हैं उपवन हरी-भरी अवनि की जठर करो झुलस रहे खलिहान खेत सूख गये पोखर तालाब  लू के थपेड़े मार रहे बरसा रहा गगन है जैसे आग उमड़ घुमड़ कर आओ ना फौरन मेघराज मेरे गांव  झुलस रही है वसुंधरा अनगिन पड़ गए छाले पांव मुंह पर चढ़ा सुबह से पारा सूरज हंटर है बरसाता अंगीठी जैसे तपे वदन नहीं तरस तनिक है खाता  ऐ मानसून कब आओगे प्रकृति सिंगार को मचले चातक की प्यास बुझाने बता कब आओगे पगले इतने प्रचंड,क्रूर और निर्मम बन क्या पाओगे तुम  सब कुछ कर लोगे बरबाद क्या तब आओगे तुम । जठर------कोख या गर्भाशय  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित