संदेश

अगस्त 16, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रिश्ते हुए बेगाने रह गई तन्हाई

लिखो लेखनी अनुभूति मेरे मेरी अंतरंग संगिनी बनकर  कैसे तन्हाई का हाथ पकड़  ज़िंदगी का काट रही सफ़र ।  चहुंओर पसरा घना सन्नाटा  सब घर की निस्तब्ध दीवारें  बाग़ों के दरख़्त वीरान दिखें  चले गये पंछी कहाँ ना जाने । जाने कहां चला गया सुहाना  अपने लोगों के साथ का दौर  उन लम्हातों की सुनहरी यादें  स्मृतिपटल पर थिरकतीं और । लिख तन्हाई की कंबल ओढ़े  गुज़र रही मेरी तन्हा ज़िंन्दगी  जिसे भी देखती वही अकेला  किससे करें ठिठोली दिल्लगी । जब भी निकली घर से बाहर  जो भी मिला दिखा तन्हाई में  अलबत्ता स्वयं से मिला दिया  मुझसे मुझको मेरी तन्हाई ने । किसके संग बैठ जी बहलायें  सभी घर निर्जन सुनसान पड़े  कौन किसे सांत्वना देवे भला  चित्त भी सबके बियाबान पड़े । अकेलेपन के इस रेगिस्तान में  नितान्त तन्हाई मैं मेरी परछाईं  अन्यमनस्क यही घर-घर मंजर  रिश्ते हुए बेगाने रह गई तन्हाई । कभी अंगारों सी सुलगाती यह  कभी नागिन सी डंसती तन्हाई  मन का अवसाद पढ़ सिखा दी  तन्हा भी जीने का हुनर तन्हाई । अनुभ...