Wednesday, 31 January 2018

वसंत पर कविता " मन पांखी हो देख आवारा "


 " मन पांखी हो देख आवारा "


कोयल कूंके पंचम सुर में
नवविकसित कलियाँ लें अंगड़ाई
भृंगों का गुंजन उपवन गूंजे
बहुरंगी तितलियाँ थिरकें अमराई ,

दें तन-मन को सुखानुभूति तरावट
घासों पर पड़ी ओस की बूंदें
वसंत के मादक सौंदर्य से
विरहिनियों की जाग उठी उम्मीदें ,

ऋतुराज पाहुन ने दर्शन देकर
अद्द्भुत उत्साह,आनन्द बढ़ाया है
वृक्षों की मर्मर ध्वनि से आह्लादित 
वासंती वैभव रोम-रोम भरमाया है ,

मन पांखी हो देख आवारा 
हर्षित क्रिड़ायें करते कानन की
झकझोरें सुरभित पवन देव
चहुंओर आगाज़ करायें फागुन की ,

तरूवर नव पल्लव पा हुलसें
डूबी हर्षोल्लास में दशों दिशाएं
स्नेहिल वसन्त अमृतरस घोलें
चहकें चहुंदिशा कलिकाएं ,

लगे रमणीय धरा का आँचल 
छवि नील गगन की न्यारी
मस्त पवन का झोंका भरता
हृदय में रंग-विरंगी खुमारी ,

बूढ़ों,बच्चों,नौजवानों के
रोम-रोम नवोत्कर्ष है छाया
होली का हुड़दंग चमन में
मधुमासी गंध अलौकिक भाया ,

पनघट पनिहारन डगर निरेखें
छलिया ने कैसी प्रीत निभाई
फागुन परिणय का दो संदेशा
बेला सुमिलन की प्रितम से आई ।

                            शैल सिंह