मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं
खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य
ना पहले सी मिट्टी में ख़ुशबू रही ना वो पहले सी रीति ।
जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था
पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का बीता जमाना था
नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप
रंगों,सांसों में गांव बसा यादों में आंगन की सुहानी धूप ।
छूट गई खेतों की मेढ़ें,पगडंडी,छूटी बावड़ी,बाग,बगीचे
कहॉं गए वे दिन सुनहरे खाटें बिछी नीम गाछ के नीचे
गांव की छोड़ हवेली आये शहर के दो कमरों में बसेरा
ना आंगन दालान कहीं ना धूप लगे,लगे कब हो सवेरा ।
सूना पड़ा जगत कुएं का सूना दंगल,सूनी पड़ी चौपाल
छूटा गांव का पनघट,मजमा मेले का साले यही मलाल
कैसे भूलें प्राकृतिक आकर्षण या सुबह सांझ अनमोल
यहॉं परदेश में ना कोई पूछता कुशल,क्षेम प्रेम से बोल ।
भले आ बस गये शहर में अंदर खालीपन सा लगता है
क्या कभी लौट पायेंगे गांव शहर प्रताड़न सा लगता है
ना गांव सी ताजी हवा की आहट ना कूजन विहंगों का
लोक लुभावन शहर प्रदूषित मंज़र मनभावन गांवों का ।
जो सुकून, आराम गांव में शहरों की हलचल में है कहॉं
यहां बनजारे सा जीवन मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं
शहरों की चकाचौंध में विस्मृत चॉंदनी रातों का नज़ारा
सारा संसाधन है फिर भी यहॉं नहीं लगता चित्त हमारा ।
शैल सिंह
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