मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता
मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,
जब अंतस् का भाव जगे
और हृदय आकुल हो जाये
भींच अंक में सकल वेदना
पंख पे कलम बिठा लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,
भर जाये कोरी छाती जब
मुझको बस इतना दे देना
काग़ज़ का थोड़ा सा कोना
प्रिय मेरे लिए बचा लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,
जब पीड़ा वश से बाहर हो
और उसे मैं भूल ना पाऊँ
जिसे बाँट सके ना कोई अपना
तब भागीदार बना लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,
भीगे दामन में इतना ऋण देना
शब्दों की ऊर्जा बाढ़ रोक ले
मन का मीत मैं तुझमें ढूँढूँ
अपनी प्रेयसी मुझे बना लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ,
सहना मुश्किल हो जाये जब
और मैं शिथिल विकल हो जाऊँ
जीवन से उकता जाऊँ जब
जीने की राह दिखा देना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छिपा लेना ,
प्यार भरी अतलांत नदी में
मन पलाश जब डूबना चाहे
ऐ कविता मेरी प्रिय सहचरी
अपनी कड़ियों में उलझा लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छिपा लेना ,
जग बैरी जब तुझको बाँचे
उसके पाषाणी सीने पर
ऐ शब्द नीर की बनकर धार
शिकवे की बूँद गिरा देना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छिपा लेना ,
मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता
कहीं सूख न जाये अन्तर में हीस्र
ऐ कविता मुझे सहचरी बनाकर
उसे कड़ियों में पिरो लेना
ऐ कविता शब्दों की तह में
मेरे सारे दर्द छुपा लेना ।
सोता—स्त्रोत,धार
शैल सिंह
सर्वाधिकार सुरक्षित
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