कैसे लिखूं
कलम पड़ी है सुस्त मेरी
कागज हो गये हैं बेजान
भाव न जाने हो गये लोप कहॉं
कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान
उमड़ घुमड़ रहे भीतर भीतर
कथ्यों के कितने बवंडर
कह ना सकूं जिसे जता सकूं ना
बस भरूं दृगों में समंदर
किससे घायल मन की पीर कहूॅं
कैसे दिखाऊं अन्तर्मन का टूटा दर्पण
व्यथा की मथनी से मथ मथ कर
पी रही छाछ सा अंदर का तूफ़ान
भाव न जाने हो गये लोप कहॉं
कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान ।
रूठ गई शब्दों की माला
कैसे दूं वाक्यों को आकार
रूह उकेरना चाह रही पर
मुंह बिसूर रहे उद्गार
मूक उक्तियों की सिसकी
अनदेखी चीखों की दास्तान
विलापतीं अनकही अभिव्यक्तियां
कहां सहेजूं वृतान्तों का आसमान
भाव न जाने हो गये लोप कहॉं
कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान ।
करूणा कलप रही है
देख समाज का विकृत मंजर
आहत, द्रवित,अचंभित,विस्मित हूं
कितना कोलाहल है अंदर
कलम की भोथरी धार पड़ी है
कैसे अनन्त क्रंदन करूं बयान
धधक रही इक आह हृदय में
सूझ रहा ना कुछ समाधान
भाव न जाने हो गये लोप कहॉं
कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान ।
शैल सिंह
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