Saturday, 28 July 2018

कविता, विरह श्रृंगार पर, '' किस प्रवास भूले सुधि तुम मेरी प्रिये ''

कविता,  विरह श्रृंगार पर,
 '' किस प्रवास भूले सुधि तुम मेरी प्रिये ''


पवन के प्रवाह से पट खुले यूं द्वार के
झट मैं चौखट पे आकर खड़ी हो गई
बढ़ गईं बेतहाशा हृदय की धड़कनें 
निगोड़ी पागल पांव की कड़ी हो गई ,

हर खटक तेरी आहट का आभास दे
तुम आये लगा,भरम भी छली हो गई
जो पथ निहारा किये बावरे नित नयन 
आस की निराश झट वह घड़ी हो गई ,

उर के उठते हिलोर की तरंगें भांपके 
चपल पछुवा छिनाल चुलबूली हो गई 
किस प्रवास भूले सुधि तुम मेरी प्रिये
घर पता ना या अनजान गली हो गई ,


गंध गजरे की खोई दमक श्रृंगार की
आँखें कजरारी मेंह की झड़ी हो गईं 
दृग जले दीप सा तन जली बाती सी
नैनों में अकाल नींद की लड़ी हो गई ,

हुक हिय में उठे कुके वनप्रिया कहीं   
तृषा चातक सी और मनचली हो गई
सुन कानन में पी-पी पपीहे की पिक   
मधुयामिनी स्मृति पिय संदली हो गई ,

मन का हंसा विकल है दरश को तेरे
विरह में अधीर देह अधजली हो गई
प्रीत की धूप से सोख लेते गिला मन
खाक़ कचनार की यह कली हो गई ,

करें अभिसार नित करवटें पीर संग
बही सर्द हवा सुध फुलझड़ी हो गई
जी लगाने के लाखों जतन कर लिये
यादें पथ रोक राहों पर खड़ी हो गईं । 

प्रवाह--झोंका, चपल-चंचल 
कानन--वन,जंगल, वनप्रिया--कोयल
मधुयामिनी--वरवधू के प्रथम मिलन की रात ,

                                       शैल सिंह
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