Tuesday, 6 February 2018

'' ग़ज़ल '' '' बची अबभी मुझमें शराफ़त बहुत है ''

'' ग़ज़ल ''

'' बची अबभी मुझमें शराफ़त बहुत है ''

मिलीं नेकी करने के बदले हैं रुसवाईयां 
ख़ुद मुझसे ही मुझको शिकायत बहुत है।

वक्त जाया क्यों करना कभी बेग़ैरतों पर
सख़्त मुझसे ही मुझको हिदायत बहुत है।

कैसे एहसान फ़रामोश होते मौका परस्त
पेश अज़नबी से आते मन आहत बहुत है।

जिनके लिए सबको छोड़ आज़ तन्हा हुए
ख़ेद वे करते अब मुझसे कवायद बहुत हैं।

परख से मिली सीख गर कुछ मेरी आदतों
वक़्त की करना ख़ुद के हिफ़ाज़त बहुत है।

मुश्क़िल घड़ी में सदा साथ जिनके खड़े थे
स्वार्थसिद्ध होते वे करते सियासत बहुत हैं।

करे तौहीन,मानभंग जो भलमनसाहत की
ऐसे ख़ुदग़र्ज़ों से मुझको हिक़ारत बहुत है।

ज़रुरतमंदों को अब जरा अनदेखा करना
होती चूक थोड़ी मिलती जलालत बहुत है।

बह जज्बातों की रौ में ग़म बाँटे थे जिनके
बदले सुर उनके मुझको मलानत बहुत है। 

अब अजनबी हो गए हम जैसे उनके लिए 
भीड़ संग क्या चले आई नफ़ासत बहुत है।

जज़्ब दामन किये मैंने जिनके हर राज़ थे  
यारों संग नये दिखाते वे नज़ाक़त बहुत हैं।

चोट खाकर सीख शैल अपनी कद्र करना
तवज्ज़ो देने में वे करते किफ़ायत बहुत हैं।

उनको कर दूँ मैं नंगा सरेराह गर चाहूँ तो   
मगर बची अबभी मुझमें शराफ़त बहुत है।


                                       शैल सिंह