Tuesday, 6 February 2018

देशभक्ति कविता " सबर का हमारे वो इम्तहान ले रहे हैं "

ख़त में लिखा था घर आने का
मंसूबें गिनाया था छुट्टियां मनाने का
मन पसंद की सूची व्यंजन पकवान की
बनी रह गई खबर आई प्रिये के बलिदान की।

पलक पांवड़े थी विछाई डगर पर
संग लाव-लश्कर तिरंगा तन ओढ़कर
अर्थी आई पिया की दर लुटा संसार मेरा 
हुई बात कल अभी थी अवाक इस खबर पर।

सबर का हमारे वो इम्तहान ले रहे हैं
सबर पे सबर हम हैं कि किये जा रहे हैं
जिस दिन ठनेगी सबर से सबर की हमारी
कहर ढायेंगे सबर ही सबर जो किये जा रहे हैं।

धूर्तों हमारी है तुम्हें आख़री चेतावनी
हम अतिशय तुम्हारी जो सहे जा रहे हैं
फिर देखना तुम्हारी तुम तबाही का मंजर
है भड़काया ज्वार आज कबसे सहे जा रहे हैं।

समझते हैं सुस्त मूर्ख जवालामुखी है
यहाँ पाठ हम अहिंसा के पढ़े जा रहे हैं
कर दीं असहनीय करतूतों ने शान्त बैठना
इन्हें किस तरह बेंधना तिलिस्म गढ़े जा रहे हैं।

हमें प्राण प्यारे हैं रखवाले वतन के
लपेटे तन तिरंगा रतन चले जा रहे हैं
देशवासियों सौगन्ध तुम्हें वन्देमातरम् की
बदले का विगुल बजादो योद्धा कहे जा रहे हैं।

                                          शैल सिंह