Sunday, 3 January 2016

चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का

जाने किसने शरारत में गुगली है की
बदनाम करने पर तूला रिश्ता पाक का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ,

अभी आँखों में बस था बसाया तुझे
दिल की किताबों में था छुपाया तुझे
अभी पन्ने पलटकर भी देखा नहीं
अभी अलकें ना खोलीं कहीं राज की
तुझे पलकों की छत पर भी रखा नहीं
जाने किसने फैलाया धुवाँ आग का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

बस शराफत के तेरे थे कलमें पढ़े
तेरी चर्चा पे थे कुछ कसीदे काढ़े
भींड में भी नजर का तुझे ढूंढ़ना
जिक्र पर तेरे लब का महज़ खोलना
धड़कनों की ग़दर ही खबर बन गई
जाने किस गंध ने दी पता हाल का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

कोंपलों ने अभी पांख खोला ना था
गुप्त तहखाने का राज डोला न था
लफ़्ज़ निर्लज्ज हो कुछ भी बोले न थे
ख़्वाब के पांव बाँधी थीं पायल तरंगें
थीं स्वप्न के माथ चूमीं निगोड़ी उमंगें
जाने क्या हश्र होगा इस तूफान का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

सुलगती चिलम सी सीने में अगन
इश्क़ की आग तपता भट्ठी सा वदन
क्या तुझको भी ऐसे ज्वर की ताप है
तेरे दिल का भी द्वार खटखटाता कोई
तेरी कनपटियों पर गुनगुनाता भी है
कैसे ज़माने को हुआ भान उफान का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

हवा गलियों में यूँ ही भटकती रहेगी
सूंघकर गंध जमाना कुछ कहता रहेगा
चलो बोयें हम तुम सितारों की फसल
दिल के गोदाम भर लें प्रीत की हर नसल
क्यूँ ना बाँधें कलावा हम उड़ती गर्द को
जाने कैसे खुला सांकल अहसास का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

मन में तेरे नाम की काती पुनी थी मैं
क्या तेरे मन भी रमी धूनी मेरे नाम की
इल्म हो जाता थोड़ा गर इस बात का
हो जाती दवा, हवा की हर बात का
खत लिखने को थोड़ा कलम थाम लो
जल उठे गुलमुहर तले दीप जज्बात का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

गर्म हवाओं ने और आग भड़का दी हैं
ये अफवाहें हकीकत सी लगने लगी हैं
रेशमी दस्तावेज अब मुलाक़ातों का
जो निग़ाहों से हुई गुफ़्तगू अब तलक
तुम भी जुबां के मुंडेरों तनिक लाओ ना
तोड़ें ख़ामोशियाँ भी कलई हालात का
चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का ।

कलई--राज


                                         शैल सिंह