Tuesday, 29 December 2015

हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की


भटकता हुआ कहां आया तूं अजनबी 
हूर का दीदार करने हीर की इस गली ।

तेरी निग़ाहों ने ऐसा क़तल क्यों किया
कि जिबह होते गए दिल के रुतबे मेरे
हाथ खड़े कर दिए रसूखी प्रहरी सभी 
टूटते गए इख़्तियार के सभी क़ब्ज़े मेरे ।

तुमने दीदा से दिल का हरफ़ पढ़ लिया
नाम अपने वसीयत ज़िगर की लिखाई
जादूई रंग भर दिया खाली कैनवास में
कि हाथ मैंने मोहब्बत की मेंहदी रचाई ।

कोई इबारत पढ़े आँखों में महबूब की
दुनिया से कटकर फ़र्लांग भरने लगी हूँ
जमीं पर चांद गगन से उत्तर आया लगे
सूत हसरतों के दिन-रात बुनने लगी हूँ ।

चुपके आके पवन कान कुछ कह गई
हरी लगने लगी मुरझाई लता द्वार की
भर लिया फाग का रंग ओढनी में सब
छू रहा अम्बर चरन पूछ पता प्यार की ।

ज़माने की परवाह पीछा ना करती रहे
तोड़ आई रिश्ते सभी पाषाणी नगर से
छोड़कर दास्ताँ किस्मत की लकीरों पे
अस्त सूरज के पहले चली आई घर से ।

चोरी के अब तक पड़े हैं जालिम निशां
तूने सेंध सीने में आंखों से लगवाई जो
देख वदन की उधेड़कर के चिन्गारियाँ
जिस्म की हंडियां अदहन खदकाई जो ।

उन टहनियों जिनपे नैनों की आरी चली
खैर-ख़ैरियत से बौर और पत्ते खिला दो
समेट बांहों में जमाने की तोहमतें सनम
चरमराती पसलियों की दुनिया बसा दो ।

                                    शैल सिंह